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Monday 14 March 2011

नामवर सिंह भारतीय आलोचना के केंद्र में हैं,विभिन्‍न विवादों के बावजूद उनके किताबों,लेखों व भाषणों ने सर्जनात्‍मक उत्‍तेजना पैदा किया है ।उनके कहे गए एक एक शब्‍द के पक्ष व विपक्ष में आपको हथियारबंद आलोचकों का समुदाय मिल जाएगा ।उनकी केन्‍द्रीयता को स्‍वीकार करते हुए एक मैथिली में हास्‍य कविता लिखी गई है ,जिसमें एक हिंदी आलोचक उनको मिल रहे सम्‍मान से क्षुब्‍ध है ।यह कविता होली के अवसर पर मैथिली पाक्षिक विदेह के 78 वें अंक में प्रकाशित हुई है ।
ई नामवर बहुत सताबइ
ई नामवरबा बहुत सताबइ
कखनो टीवी,कबहु रेडियो
ब्‍लॉग,न्‍यूज पर आबइ
तुरते मम्‍मट,तुरत लोंजाइनस
मुक्तिबोध बताबइ । ई नामवरबा 0000
कविता नाटक उपन्‍यास पर
अजबे गजब सुनाबइ
नागार्जुन अपभ्रंश हजारी
सबहक सत्‍व दिखाबइ
लिख मारलक दू चारि किताब बस
बाजि बाजि घोलटाबइ । ई नामवरबा 0000
आब रमत नहि लिखत पढत मे
बात से बात निकालइ
बाज बाज वौआ दिन तोहर
शणियो सुघड,मंगलबो गाबइ । ई नामवरबा 0000
की खाइ छें,कोन पानि पिबइ छें
घाट घाट के वानि बजइ छें
हमरो दे किछु जंतर मंतर
बाजी कम ,गुण अधिक सुनाबइ ।
ई नामवरबा बहुत सताबइ ।
ई नामवरबा बहुत सताबइ ।

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