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Wednesday 18 December 2013

साहित्‍य के पिचकू

मुझको अपनी बात कहने तो दीजिए ,मुझे डराइए मत ,मुझे उनका कद,वजन,प्रतिष्‍ठा ,प्रभाव से परिचय मत कराइए ,थोड़ा बहुत हम भी जानते हैं ,निस्‍संदेह वे प्रभावशाली लोग हैं ,उनकी एक टिप्‍पणी से हम जैसे लोगों का जीवन(लेखन नहीं) आरामदेह हो सकता है ।उनका एक संकेत ,सिफारिशी चिट्ठी हमारा भाग्‍योदय कर सकता है ,परंतु जब हम इस लाभ-लोभ की ओर झुकने की बजाय अपेक्षाकृत ईमानदार रूख अपनाते हैं ,तो आप समर्थन की बजाय हमें धमकाते हैं ,और हिंदी के उन महापुरूषों के कुकृत्‍यों पर ईमानदारी पूर्वक चर्चा करने की बजाय उनके पहले के रिकार्ड पर बात करना पसंद करते हैं ।


                                              मुझे जानकारी है कि आप में से बहुतों के एकाधिक किताबें छप चुकी है , आप में से कुछेक पुरस्‍कृत भी चुके हैं ,आप में से कई इस पुरस्‍कार और सम्‍मान के वाकई हकदार हैं ,परंतु इसका मतलब ये नहीं है कि रास्‍तों का विकल्‍प समाप्‍त हो गया है । हमें उनसे लड़ते-झगड़ते आगे बढ़ने दीजिए ,पाद-सेवन ,अर्चन-पूजन की बजाय नए रास्‍तों को सामने आने दीजिए ,ऐसे राहियों को चना-चबेना भले न दीजिए ,थोड़ा आंख तो मूंद सकते हैं  । व्‍यभिचारियों के बिस्‍तर बनने से खुद को बचाईए ।हम समझते हैं आपकी आदत हो चुकी है ,परंतु कभी-कभी परहेज भी दवा होती है ।


                                                          हम किसको कोसें ,सरसो पैदा करने वाले किसान को ,तेल पेरने वाले तेली को ,बोतल,रैपर,पिचकू,स्‍प्रे में उपलब्‍ध कराने वाले बनिये को या आपके उस एप्रोच को ।आपके पूज्‍य को भी शायद यह इतना बुरा लगे ,जितना कि आपको लगता है । 

Sunday 15 December 2013

नागार्जुन और त्रिलोचन पर अष्‍टभुजा शुक्‍ल

त्रिलोचन की अवधी कविता संग्रह 'अमोला' पर लिखते हुए अष्‍टभुजा शुक्‍ल  का ध्‍यान बरबस ही नागार्जुन पर जाता है ,तथा वे दोनों मित्र कवियों की तुलना करने लगते हैं ।'आलोचना' के पचासवें अंक में प्रकाशित एक लेख'बरवै में बिरवा(अमोला)' से एक अंश आभार सहित---
''कविद्वय -नागार्जुन और त्रिलोचन न तो लोकान्‍ध हैं और न ही लोक-विक्रेता बल्कि दोनों लोक-सम्‍बद्ध और लोक-प्रतिबद्ध हैं। इसी प्रतिबद्धता और सम्‍बद्धता की कीमत पर कभी-कभी दोनों प्रतिरोध को भी किनारे रख देते हैं पर उसका वाणिज्यिक इस्‍तेमाल नहीं करते ।दोनों लोक की आधुनिकता का साथ देते हुए और आरोपित आधुनिकता को नकारते हुए प्रगतिशील मूल्‍यों का निरन्‍तर प्रतिपादन करने वाले कवि हैं ......नागार्जुन की कारयित्री ऊर्ध्‍वाधार है तो त्रिलोचन की क्षैतिज ।नागार्जुन की हँसी में गूंज है तो त्रिलोचन में खनक ।नागार्जुन का व्‍यंग्‍य फट्ठा-पीठ है तो त्रिलोचन का कैंचीदार ।नागार्जुन में विक्षोभ और प्रखरता है तो त्रिलोचन में गहरी टीस और नुकीला कटाक्ष ।पहले की कविता की खूबी ज्‍यादातर असंयम में है तो दूसरे की ज्‍यादातर संयम में ।पहला करारी चोट करने वाला कवि है जबकि दूसरा करारी चोट सहने वाला ।



                                                                             नागार्जुन में हिन्‍दी जाति का साहस एवं स्‍वाभिमान है तो त्रिलोचन में उसकी ऋजुता और निरहंकार । एक के प्रतिकार में जनता की सामूहिक चेतना है तो दूसरे की सहनशीलता में तिर्यक् अवज्ञा ।प्रतिकार एवं सहनशीलता- दोनों ही हिन्‍दी जाति,जीवन और कविता के स्‍वभाव हैं ।नागार्जुन प्रकृत्‍या काव्‍यानुशासन तोड़ने वाले कवि हैं जबकि त्रिलोचन प्राय: उसकी मर्यादा में रहने वाले ।इस लिहाज से एक ही अनुभूति ,अभिव्‍यक्ति की निजता और काव्‍यशैली अलग प्रकार की प्रतीत होती है तो दूसरे की उससे सर्वथा भिन्‍न ।बल्कि इन दोनों की काव्‍य-शैलियां निजी पृथगर्थता और सामूहिक एकार्थता का ऐसा सम्‍पूरक निर्मित करती हैं जिनमें हिन्‍दी कविता का पूर्वकृत एवं नवीकृत आवाजों के अनुवाद अपने-अपने आश्‍चर्यों के साथ झंकृत होते हैं ।दोनों की भूमिज संवेदना के उभयनिष्‍ठ तन्‍तु जहां उन्‍हें कविता के सामान्‍य धरातल पर एक साथ खड़ा करते हैं वहीं उनके सरोकार भारतीय जीवन-बोध के घनिष्‍ठ सम्‍पर्क में हैं ।दोनों के विश्‍वबोध की प्राथमिक ,द्वितीयक या तृतीयक मूल मिट्टी की देसजता और जनपदीयता में गहरे पैठी हुई है जहां उनके मूलगोप जीवन के खनिज संचित करते रहते हैं ।दोनों की कविता का मर्म और साधारण प्रतिज्ञा जनजीवन के मौलिक  अनुताप उल्‍लास तक ही असमंजस प्रतिरोध संघर्ष और राग-विराग में घटित होती है ।ध्‍यान देने की बात यह भी है कि नागार्जुन मिथिलांचल के हैं तो त्रिलोचन अवध क्षेत्र के ।अपनी इन्‍हीं प्रतिबद्धताओं के चलते एक ने मैथिली में 'पत्रहीन नग्‍न गाछ' की रचना की तो दूसरे ने अवधी में 'अमोला' की ।''
(साभार 'आलोचना' ,जुलाई-सितम्‍बर ,2013)

Sunday 8 December 2013

पुरानी पत्रिका से: मल्लिकार्जुन मंसूर(आजकल ,सितंबर 2011)

पुरानी पत्रिकाओं से की दूसरी किश्‍त में आजकल का सितंबर 2011 इस मायने में विशिष्‍ट है कि मल्लिकार्जुन मंसूर को जन्‍म शताब्‍दी वर्ष के अवसर पर याद करती है ,साथ ही यह पं0 भीमसेन जोशी एवं गिर्दा के महाप्रस्‍थान को भी समेटती है ,परंतु अशोक वाजपेयी की कविता एवं यतींद्र मिश्र की कविता एवं स्‍मृतिलेख के कारण यह अंक संग्रहणीय है ।

                    यतींद्र मिश्र अपने प्रिय गायक को याद करते हुए कहते हैं--

यह कहने में मुझे तनिक भी झिझक नहीं कि अपने समकालीनों एवं परवर्ती गायको ,फनकारों....का संगीत जितना श्रद्धास्‍पद ,अद्भुत,मनोग्राही और महान था-उसमें थोड़ी अतिरिक्‍त आस्‍था ,रहस्‍य ,मनोग्रह्यता और महानता का योग कराने के बाद बनने वाला संगीत ही मल्लिकार्जुन मंसूर का संगीत हो सकता था ।पंडित जी के गायन के लिए कम से कम कोई साधारण उत्‍प्रेक्षा ,उपमा या रूपक तलाशना भी उनका एक स्‍तर पर अपमान करना है ।



मल्लिकार्जुन मंसूर पर अशोक वाजपेयी की कुछ कविताएं


मल्लिकार्जुन मंसूर


(1)
काल के खुरदरे आंगन में
समय के लंबे गूंजते गलियारों में
वे गाते हैं
अपने होने के जीवट का अनथक गान

वे चहलकदमी करते हुए
किसी प्राचीन कथा के
बिसरा दिए गए नायक से
पूछ आते हैं उसका हालचाल

वे बीड़ी सुलगाए हुए
देखते हैं
अपने सामने झिलमिल
बनते-मिटते संसार का दृश्‍य

देवताओं और गंधर्वों के चेहरे
उन्‍हें ठीक से दीख नहीं पड़ते
अपनी शैव चट्टान पर बैठकर
वे गाते हैं
अपने सुरों से
उतारते हुए आरती संसार की -

वे एक जलप्रपात की तरह
गिरते रहते हैं-
स्‍वरों की हरियाली
और राग की चांदनी में
अजस्र-

वे सींचते हैं
वे जतन से आस लगाते हैं
वे खिलने से निश्‍छल प्रसन्‍न होते हैं
वे समूचे संसार को एक फूल की तरह चुनकर
कालदेवता के पास
फिर प्रफुल्‍लता पर लौटने के लिए
रख आते हैं-

वे बूढ़े ईश्‍वर की तरह सयाने-पवित्र
एक बच्‍चे की फुरती से
आते हैं-
ऊंगली पकड़
हमें अनश्‍वरता के पड़ोस में ले जाते हैं

(2)

अपनी रफ्तार से चलते हुए
बहुत बाद में
आते हैं
मल्लिकार्जुन मंसूर
और समय से आगे निकल जाते हैं

उलझनों-भरे घावों-खरोचों से लथपथ
टुच्‍चे होते जाते समय से
आगे
उनके पीछे आता है
गिड़गिड़ाता हुआ समय दरिद्र और अपंग
भीख मांगता हाथ फैलाए समय-
हांफता हुआ

मल्लिकार्जुन मंसूर
अपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में
हलका -सा झुककर
रखते हैं
कल के कंधे पर पर अपना हाथ
ठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ी
चल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्‍याशित
पड़ाव की ओर

अपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथ
सिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछ
गुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसार

ईश्‍वर आ रहा होता
घूमने इसी रास्‍ते
तो पहचान न पाता कि वह स्‍वयं है
या मल्लिकार्जुन मंसूर


(3)

राग के अदृश्‍य घर का दरवाजा खोलकर
अकस्‍मात् वे बाहर आते हैं
बूढ़े सरल-सयाने

राग की भूलभुलैया में
न जाने कहां
वे बिला जाते हैं
और फिर एक हैरान बच्‍चे की तरह
न जाने कहां से निकल आ जाते हैं
वे फूल की तरह
पवित्र जल की तरह
राग को रखते हैं
करते हैं आराधना
होने के आश्‍चर्य और रहस्‍य की ,
वे ख़याल में डूबते हैं
वचन में उतरते हैं

वे गाते हैं
जो कुछ बहुत प्राचीन हममें जागता है
गूंजता है ऐसे जैसे कि
सब कुछ सुरों से ही उपजता है
सुरों में ही निमजता है
सुरों में ही निवसता और मरता है ।

(अशोक वाजपेयी)


आकाश कुसुम
झरता है
सूर्य के आकाश से
चकित और उल्‍लसित

पारिजात की पगडण्‍डी
बनती जाती है
राग की विनम्र धरती
पीताभा में अपनी

घर हो
मन्दिर का कोई कोना हो
दीप्‍त हो उठता है वहां
सुन्‍दर का सपना
जैसे वह सच का सहोदर हो

गाकर
संसार के जिस भेद को
सुर और लय की अठखेली से
कुसुमित करते हैं वे
वह फूल
सूर्य के आकाश से झरता है ।

(यतीन्‍द्र मिश्र)

साभार  'आजकल' ,अशोक वाजपेयी ,यतीन्‍द्र मिश्र

Friday 6 December 2013

आधुनिक हिंदी साहित्‍य पर केदारनाथ सिंह

पुरानी पत्रिकाओं से स्‍तंभ की प‍हली किश्‍त में प्रगतिशील वसुधा के अक्‍तूबर-दिसम्‍बर 2009 अंक में केदारनाथ सिंह से सुधीर रंजन की बातचित को याद किया जा रहा है ।अनौपचारिकता से भरी यह बातचित न केवल लंबाई में बड़ी है ,बल्कि हिंदी साहित्‍य के लंबे सफर की विविधरंगी यादों से भरपूर है ।बातचित में सुधीर रंजन के प्रश्‍न उनके अध्‍ययन एवं चिंतन की गहराई को स्‍पष्‍ट करते हैं ,जिसे केदारनाथ जी ने भी कई बार सराहा है ।बातचित प्रारंभ से ही आधुनिक हिंदी साहित्‍य पर केंद्रित है ,दोनों लोगों ने लेखकों के निजी जीवन पर कम समय खर्च किया है ,सारा संकेंद्रण हिंदी साहित्‍य के प्रस्‍थानविन्‍दु को स्‍पष्‍ट करने में है ।इस प्रस्‍थान-विन्‍दु की खोज में महेश नारायण ,मैथिली शरण गुप्‍त और निराला पर उत्‍तेजक चर्चा होती है ।अतुकांत कविता की प्रासंगिकता ,मैथिली और भोजपुरी की तुलना के साथ ही समकालीन कविता के महारथियों पर भी उल्‍लेखनीय चर्चा होती है ।

          सुधीर रंजन याद दिलाते हैं कि निराला और त्रिलोचन ने अपने आलोचनात्‍मक लेख में मैथिली शरण गुप्‍त को काफी महत्‍व दिया है ।केदारनाथ जी खड़ी बोली हिंदी को बनाने में गुप्‍त जी के महत्‍व को स्‍वीकारते हुए भी यह कहते हैं कि
भारत भारती एक युग का पीस है ,बड़ी कविता नहीं ।बड़ी कविता माने जो बहुत लम्‍बे समय तक मनुष्‍य को संचारित करती रहे । आगे वे नामवर जी को उद्धृत करते हुए कहते है पंचायती कविता है वो ।ये करो ,वो करो ,ये हटाओ ,वो जोड़ो ।ककुल मिलाकर एक रूप बना उसका ।हाली और क़ैफी के मुसद्दस के जवाब में लि‍खी हुई कविता है ।

                   आगे केदारनाथ जी द्विवेदी युग एवं छायावाद के छंद पर विचार करते हैं तथा यह भी जोड़ते हैं कि
आज हिंदी में जो गद्य के लय में कविता लिखी जा रही है ,वो मात्रिक छन्‍द से बचने के लिए लिखी चली आ रही है ।सुधीर जी इस तथ्‍य की दुर्लभता को सिद्ध करते हुए फिर दोहराते हैं कि मात्रिक से बचने के लिए गद्य में कविता ।सुधीर जी यह भी कहते हैं कि उर्दू की तुलना में हिंदी गद्य नया भी था और काव्‍यभाषा की निर्भरता भी उस पर बनी रही ,इसीलिए स्‍वभावत: भारत भारती निबंधात्‍मक है ।


              सुधीर रंजन ऐतिहासिक प्रस्‍थान बिन्‍दु की बात करते हुए महेश नारायण  की
स्‍वप्‍न कविता उल्‍लेख करते हैं ,केदारनाथ जी पहले कविता को उर्दू मानते हैं ,परंतु सुधीर जी के बल देने पर स्‍वीकार करते हैं वो कविता बहुत ही मीनिंगफुल है और एक प्रस्‍थान बिन्‍दु बन सकती है ।हमारे पूरे काव्‍य विकास को ,काव्‍यभाषा के विकास को ,और काव्‍यभाषा के लय और छन्‍द के विकास के संदर्भ में उस कविता को बहुत ही सिग्‍नीफिकेण्‍ट मैं मानता हूं ।

                   सुधीर रंजन आगे बिहार में ब्रजभाषा की अकेंद्रीयता पर बल देते हुए यह भी स्‍पष्‍ट करते हैं कि महेश नारायण अंग्रेजी के आदमी थे ,इसीलिए उनके यहां प्रयोग संभव हुआ ।सुधीर जी आगे बहुमुखी प्रतिभाशाली के रूप में श्रीधर पाठक का उल्‍लेख करते हैं ।दोनों व्‍यक्ति संध्‍या वर्णन वाली कविता को अद्भुत मानते हैं ,साथ ही दोनों व्‍यक्ति आयरिश कवि गोल्‍डस्मिथ की तीन कविताओं के अनुवाद को हिंदी भाषा और कविता के विकास में महत्‍वपूर्ण मानते हैं ।सुधीर रंजन बलपूर्वक प्रसाद के
प्रेम पथिक और राम नरेश त्रिपाठी के पथिक की पृष्‍ठभूमि में श्रीधर पाठक के श्रान्‍त पथिक को रखते हैं ।यही नहीं सुधीर रंजन यह भी मानते हैं कि कामायनी का बीज प्रेम पथिक में पड़ चुका था ।केदारनाथ जी भी इस बात को दमदार मानते हैं ।

          आगे केदारनाथ जी त्रिलोचन के सॉनेटकार रूप को सामने लाने का श्रेय अज्ञेय को देते हैं तथा रेणु के विषय में एक महत्‍वपूर्ण टिप्‍प्‍णी करते हैं-
हमारे जेहन में आजादी के बाद का सबसे बड़ा गद्यकार है ।भाषा की गतिविधियों से ,गलत प्रयोगों से बड़ी भाषा पैदा की जा सकती है ।इसका उदाहरण है रेणु का गद्य ।सुधीर रंजन जी भी विटिंग्‍स्‍टाइन को उद्धृत करते हुए कहते हैं भाषा की अशुद्धि में ताक़त छुपी होती है ।सुधीर रंजन रेणु को याद करते हुए कहते हैं कि रेणु वैसे लेखक हैं जहां गद्य और कविता का भेद मिट जाता है ,केदारनाथ जी इसी संदर्भ में बाणभट्ट को याद करते हैं ।केदारनाथ जी आगे यह भी कहते हैं कि जो परम्‍परा चली आ रही थी लम्‍बे समय से हिन्‍दी गद्य की ,उससे अलग हटकर रेणु थे ।बांग्‍ला ,नेपाली ,मैथिली- उस सबसे मिलकर भाषा बनी थी ।वह आदमी क्रियेट कर रहा था ,जो उसका अपना कमाल था ।केदारनाथ जी नलिन विलोचन शर्मा के विषय में भी स्‍पष्‍ट टिप्‍पणी करते हैं उनसे प्रबुद्ध आदमी हिन्‍दी में- पूरे पश्चिम और भारतीय साहित्‍य को लेकर इतना प्रबुद्ध कौन था यहीं नहीं केदारनाथ जी नामवर जी के उलट नलिन जी की कविताओं को विचारनीय मानते हैं ।


        
केदारनाथ जी प्रयोगवाद को समय सीमा में बांधे जाने का विरोध करते हुए इसे निराला तक ले जाते हैं ,तथा सुधीर रंजन के साथ सहमति जताते हैं कि यह हिंदी कविता का बहुत बड़ा डिपार्चर था ।केदारनाथ जी पुन: कहते हैं –‘ निराला में यह कोशिश थी ।वो छायावाद की खिड़कियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे ।मैं हमेशा कोशिश को भाषा में देखता हूं पहले। क्‍योंकि पहले वो भाषा में तब आयेगी ,जब आपके भीतर बेचैनी हो ...।

         केदारनाथ जी महादेवी की कविताओं के विषय में स्‍पष्‍ट कहते हैं कि
बहुत बड़ा रेंज उनका नहीं हैं ...लेकिन बड़ी ठनी हुई ,कसी हुई । इसके साथ ही पंत के साथ तुलना करते हुए यह भी स्‍पष्‍ट करते हैं उनके यहां टिकाऊ कविताएं ज्‍यादा हैं ,सुमित्रानन्‍दन पन्‍त की तुलना में ।

       साहित्‍य की गांवों में ग्राह्यता के प्रश्‍न को स्‍पष्‍ट करते हुए केदारनाथ जी कहते हैं
मैथिलीशरण गुप्‍त अन्तिम हिन्‍दी कवि हैं ,जो गांव तक पहुंचे थे ।.....थोड़ा-सा संशोधन करूं तो दिनकर अपने गांव तक पहुंचे हैं ।लेकिन व्‍यापक गांव तक नहीं पहुच्‍ा सके ।वो अपने उस इलाके में पहुंचे


        केदारनाथ जी नागार्जुन ,राजकमल और इन दोनों की मातृभाषा पर भी खुलकर कहते हैं- राजकमल अकविता का ही नहीं था ,मैथिली का भी था.....नागार्जुन की बहुत सारी कविताएं मूलत: मैथिली में है ।ये लोग अपनी भाषा में जितना परफेक्‍ट थे ,हिन्‍दी में नहीं थे ।......ये दोनों अपनी भाषा के कवि पहले हैं ।....ये बड़ा महत्‍वपूर्ण निर्णय था उनका ।काश ,मैं मैथिली-भाषी होता।उन दोनों की जो ताकत थी ,उनकी भाषा से आई थी ।भोजपुरी की संभावना को स्‍वीकार करते हुए भी केदारनाथ जी यह निर्णय देते हैं कि मैथिली की समृद्ध परंपरा उसे मूल्‍यवान बनाती है ।


       अज्ञेय जी और नामवर सिंह के संबंधों को याद करते हुए अज्ञेय जी के द्वारा रिल्‍के के अनुवाद की चर्चा होती है तथा केदारनाथ जी एक महत्‍वपूर्ण बात करते हैं कि
अनुवाद हम हमेशा अपने समय के लिए करते हैं ,और अपने समय के लिए करेंगे तो अपनी तरह करेंगे ।

            राजेश जोशी और अरूण कमल पर केदारनाथ जी कहते हैं-
राजेश में एक टिपिकल भोपाल का कवि है ।भोपाल कुछ कविताओं में बोलता है .....हर अच्‍छे कवि की अपनी एक निजी ज़मीन होनी चाहिए.....अरूण का एक अलग रंग है ।उनके यहां बहुत सारे शब्‍द ऐसे हैं ,जो बोलचाल से एकदम ठेठ बिहार के ,अपनी भाषा के आते हैं ।काफी हैं ऐसे ।वहां वह बहुत जेनुइन लगता है ।आलोक धन्‍वा में भी उनको अलग रंग दिखता है ,वे उनको महत्‍वपूर्ण भी मानते हैं ,परंतु शायद वह अपनी कविता को लेकर किन्‍हीं कारणों से एक वृत्‍त में फँसा हुआ है ।उसका विकास और ज्‍यादा होना चाहिए था ।

ज्ञानेन्‍द्रपति की परवर्ती भाषा पर वे ऐतराज जताते हैं ,क्‍योंकि यह थोड़ी विच्‍छृंखलित सी है और उसमें एक अतिरिक्‍त सा‍हित्यिक कोशिश दिखती है ।इसके साथ ही केदारनाथ जी बाद वाले कवियों में उदय प्रकाश ,बद्रीनारायण ,विनोद कुमार शुक्‍ल और विष्‍णु खरे को भी महत्‍वपूर्ण मानते हैं ।


(साभार 'प्रगतिशील वसुधा' ,केदारनाथ सिंह ,सुधीर रंजन)

Sunday 17 November 2013

कविता ,कवि और रचनात्‍मकता

मेरी कुछ कविताएं हिंदी दैनिक 'जनसंदेश टाइम्‍स' के 27 अक्‍तूबर 2013 के साहित्‍य पृष्‍ठ पर प्रकाशित हुई ।सारी कविताएं कविता,कवि और रचनात्‍मकता पर है ।

(साभार 'जन संदेश टाइम्‍स)

Thursday 31 October 2013

काशी और कुटिलता : व्‍योमकेश दरवेश

काशी में विद्वता और कुटिल दबंगई का अद्भुत मेल दिखलाई पड़ता है ।कुटिलता ,कूटनीति ,ओछापन ,स्‍वार्थ आदि का समावेश विद्वता में हो जाता है । काशी में प्रतिभा के साथ परदुखकातरता ,स्‍वाभिमान और अनंत तेजस्विता का भी मेल है जो कबीर ,तुलसी ,प्रसाद और भारतेंदु ,प्रेमचंद आदि में दिखलाई पड़ता है । काशी में प्राय: उत्‍तर भारत ,विशेषत: हिंदी क्षेत्र के सभी तीर्थ स्‍थलों पर परान्‍नभोजी ,पाखंडी पंडों की भी संस्‍कृति है ,जो विदग्‍ध ,चालू ,बुद्धिमान और अवसरवादी कुटिलता की मूर्ति होते हैं । काशी के वातावरण में इस पंडा संस्‍कृति का भी प्रकट प्रभाव है । वह किसी जाति-सम्‍प्रदाय ,मुहल्‍ला तक सीमित नहीं है ।वह ब्रह्म की तरह सर्वत्र व्‍याप्‍त है ।पता नहीं कब किसमें झलक मारने लगे ।

(विश्‍वनाथ त्रिपाठी'व्‍योमकेश दरवेश ' में )

Tuesday 20 August 2013

महाकवि त्रिलोचन की कुछ कविताएँ

महाकवि त्रिलोचन की 96 वीं जयन्ती पर उनकी कुछ कविताएँ
01.
भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिस को समझा था है तो है यह फ़ौलादी
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी
नहीं; झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को; जाकर पूछा
'भिक्षा से क्या मिलता है; 'जीवन' 'क्या इसको
अच्छा आप समझते हैं' 'दुनिया में जिसको
अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं, छूछा

पेट काम तो नहीं करेगा' 'मुझे आप से
ऎसी आशा न थी' 'आप ही कहें, क्या करूँ,
खाली पेट भरूँ, कुछ काम करूं कि चुप मरूँ,
क्या अच्छा है ।' जीवन जीवन है प्रताप से,
स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था,
यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था ।
02.
वही त्रिलोचन है, वह-जिस के तन पर गंदे
कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे-फटे लटे हैं
यह भी फ़ैशन है, फ़ैशन से कटे कटे हैं।
कौन कह सकेगा इसका यह जीवन चंदे
पर अवलम्बित् है। चलना तो देखो इसका-
उठा हुआ सिर, चौड़ी छाती, लम्बी बाहें,
सधे कदम, तेजी, वे टेढ़ी मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं, किस का किस का
ध्यान इस समय खींच रहा है। कौन बताए,
क्या हलचल है इस के रुंधे रुंधाए जी में
कभी नहीं देखा है इसको चलते धीमे।
धुन का पक्का है, जो चेते वही चिताए।
जीवन इसका जो कुछ है पथ पर बिखरा है,
तप तप कर ही भट्ठी में सोना निखरा है।
03.
दर्शन हुए, पुनः दर्शन, फिर मिल कर बोले,
खोला मन का मौन, गान प्राणों का गाया,
एक दूसरे की स्वतन्त्र लहरों को पाया
अपनी अपनी सत्ता में, जैसे पर तोले
दो कपोत दाएँ, बाएँ स्थित उड़ते उड़ते
चले जा रहे दूर, क्षितिज के पार, हवा पर,
उसी तरह हम प्राणों के प्रवाह पर स्वर भर
लिख देते अपनी कांक्षाएँ। मुड़ते मुड़ते
पथ के मोड़ों पर, संतुलित पदों से चलते
और प्राणियों के प्रवेग की मौन परीक्षा
करते हैं इस लब्ध योग की सहज समीक्षा।
शक्ति बढ़ा देती है, नए स्वप्न हैं पलते।
विपुला पृथ्वी और सौर-मंडल यह सारा
आप्लावित है; दो लहरों की जीवन-धारा।
04.
यदि मैं तुम्हारे प्रिय गान नहीं गा सका तो
मुझे तुम एक दिन छोड़ चले जाओगे
एक बात जानता हूँ मैं कि तुम आदमी हो
जैसे हूँ मैं जो कुछ हूँ तुम वैसे वही हो
अन्तर है तो भी बड़ी एकता है
मन यह वह दोनों देखता है
भूख प्यास से जो कभी कही कष्ट पाओगे
तो अपने से आदमी को ढूंढ़ सुना आओगे
प्यार का प्रवाह जब किसी दिन आता है
आदमी समूह में अकेला अकुलाता है
किसी को रहस्य सौंप देता है
उसका रहस्य आप लेता है
ऎसे क्षण प्यार की ही चर्चा करोगे और
अर्चा करोगे और सुनोगे सुनाओगे
विघ्न से विरोध से कदापि नहीं भागोगे
विजय के लिए सुख-सेज तुम त्यागोगे
क्योंकि नाड़ियों में वही रक्त है
जो सदैव जीवनानुरक्त है
तुमको जिजीविषा उठाएगी, चलाएगी,
बढ़ाएगी उसी का गुन गाओगे, गवाओगे
05.
लाशों की चर्चा थी, अथवा सन्नाटा था
राज्यपाल ने दावत दी थी, हा हा ही ही,
चहल-पहल थी, सागर और ज्वार-भाटा था ।
जो सुनता था वही थूकता था, "यह। छी-छी ।
यह क्या रंग-ढंग है। मानवता थोड़ी सी
आज दिखा दी होती ।" "वे साहित्यकार हैं",
कहा किसी ने । औरत बोली झल्लाई सी-
"बादर होइँ, पहाड़ होइँ, आपन कपार हैं ।"
पति ने कहा, "होश में बोलो ।" "धुआँधार हैं
उन के भाषण संस्कृति पर ।" "कोई तो स्याही
जा कर मुँह पर मल देता ।" "ये भूमिहार हैं..."
"कर की कालिख़ आप पोत ली है मनचाही ।"
भय का कंपन आज वायु में भरा-भरा था,
छाती पर जो घाव लगा था, हरा-हरा था।

Saturday 10 August 2013

कलमकार कहानी प्रतियोगिता

कलमकार कहानी प्रतियोगिता

कलमकार एक कहानी प्रतियोगिता का आयोजन कर रहा है । जिसमें भाग लेने के लिए देश भर के रचनाकारों से कहानियां आमंत्रित की जा रही है ।

एक प्रथम पुरस्कार - 21 हजार रुपए
दो द्वितीय पुरस्कार – 11 हजार रुपए
तीन तृतीय पुरस्कार - 5 हजार रुपए
दस सांत्वना पुरस्कार- - ढाई हजार रुपए

निर्णायक- ममता कालिया, अखिलेश और ऋचा अनिरुद्ध

- पुरस्कार वितरण दिल्ली में समारोहपूर्वक किया जाएगा
- एक प्रतियोगी सिर्फ एक कहानी भेज सकते हैं
- कहानी के साथ उसके मौलिक और अप्रकाशित होने का पत्र जरूरी है
- पुरस्कृत कहानी पर कलमकार का कॉपीराइट होगा ।
- पुरस्कृत कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित करने का अधिकार कलमकार का होगा
- पुरस्कृत कहानीकारों को कहानी संग्रह की एक प्रति दी जाएगी
- निर्णायक मंडल का फैसला अंतिम और मान्य होगा
- डाक या कूरियर में कहानी खो जाने की जिम्मेदारी कलमकार की नहीं होगी
- पुरस्कृत कहानी पर कलमकार का कॉपीराइट होगा लेकिन कहानी को उसको किसी भी पत्रिका में छपवाने का हक होगा
- किसी भी तरह के विवाद होने पर उसका निबटारा दिल्ली की सक्षम अदालत में ही होगा

कहानी भेजने की अंतिम तिथि- 30 अगस्त 2013
कहानी भेजने का पता – 4 डी, पॉकेट ए, सिद्धार्थ एक्सटेंशन, नई दिल्ली- 110014

फोन- 08447879744
ईमेल- kalamkarfoundation@gmail.com
मेल से कृपया मंगल फॉंट में कहानी भेजें । साथ ही अपना नाम, पता और फोन नंबर साफ साफ लिखें ताकि आपसे संपर्क करने में दिक्कत ना हो

साभार www.kalamkar.org

Tuesday 16 July 2013

नौंवी नवलेखन प्रतियोगिता

नौंवी नवलेखन प्रतियोगिता

1 नौंवी नवलेखन प्रतियोगिता उपन्‍यास विधा के लिए सुनिश्चित की गई है ।

2 पांडुलिपि की गुणवत्‍ता के अनुसार चयनित पांडुलिपि पर रू एक लाख (100000) का पुरस्‍कार प्रदान किया जाएगा । चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित करेगा ।ज्ञानपीठ केनियमानुसार प्रकाशित पुस्‍तक के लिए लेखक को रॉयल्‍टी दी जाएगी ।अनुशंसित पांडुलिपियां भी ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित होंगी ।

3 इस बार 40 वर्ष की आयु तक के लेखकों से उपन्‍यास की पांडुलिपियां आमन्त्रित है ।

4 लेखक का प्रथम उपन्‍यास होना चाहिए , भले ही लेखक की रचनाएं अन्‍य विधाओं में प्रकाशित हुई हों ।

5उपन्‍यास की पांडुलिपि कम से कम 200 टंकित पृष्‍ठों की होनी चाहिए ।

6 लेखक द्वारा जन्‍मतिथि सहित अपना पूरा परिचय भेजना आवश्‍यक है ।

7 प्रतियोगिता में भेजी जाने वाली पांडुलिपि पर '  नवलेखन प्रतियोगिता के लिए ' जरूर लिखें ।

8 भारतीय ज्ञानपीठ की वेबसाइट पर उपलब्‍ध  नवलेखन प्रतियोगिता फार्म भी साथ में भेजें अथवा कार्यालय से मँगबाऍं ।

9 यदि कोई कृति पुरस्‍कार के योग्‍य नहीं पायी गयी तो इस वर्ष पुरस्‍कार नहीं दिया जाएगा ।

10 निर्णायक मंडल का निर्णय मान्‍य और अन्तिम होगा ।

11 इस वर्ष कार्यालय में पांडुलिपि प्राप्‍त होने की अंतिम तिथि 30 सितम्‍बर , 2013 है ।

कृपया पुरस्‍कार सम्‍बन्‍धी कोई पत्र व्‍यवहार न करें ।
किसी से भी अनुशंसा कराने वाले लेखक को प्रतियोगिता के अयोग्‍य घोषित किया जा सकता है ।


(साभार 'नया ज्ञानोदय' जुलाई 2013)

भारतीय ज्ञानपीठ
18 ,इन्‍सटीट्यूशनल एरिया ,लोदी रोड

पोस्‍ट बॉक्‍स नं0 -3113

नई दिल्‍ली 110033

Saturday 13 July 2013

सरयू की एक उदास सांझ

इतनी उदासी तो मौत के दुआर पर भी नहीं होती है ,और इस शहर के बीचोंबीच हम टहलते रहे ,परंतु शहर ने मानो नोटिस ही नहीं लिया हो ।हम धीरे-धीरे चल रहे थे ,हम हरेक रूकने वाले दुकानों पर रूक रहे थे ,हम जो खरीद सकते थे ,खरीद रहे थे ।हम चुटकुला-कहानी सुन सुना रहे थे ,परंतु शहर ने मानो अफीम के पानी से कुल्‍ला किया हो ।दुकानों में बच्‍चों के खिलौने सजे थे ,वहीं बगल में औरतों के श्रृंगार के सामान बिक रहे थे ,अयोध्‍या नरेश राम के विभिन्‍न मंदिरों के फोटू भी बिक रहे थे ।भजन के कैसेटों का दुकान अलग था ,उसमें विभिन्‍न भजनों के ऑडियो-वीडियो संगीत सुनाए जा रहे थे ।6 दिसंबर 1992 की घटनाओं का भी सचित्र प्रसारण चल रहा था ,कुछ नेतागण भी दिख रहे थे ,जिसे देश ने टुकड़ों में नायक या खलनायक कहा ।कैसेट विक्रेता निर्लिप्‍त भाव से कैसेट बेच रहे थे ।मेरी उदासी या उत्‍साह से उन पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा ,वे जुलाई के पुरवैये से पीडि़त थे ।मारक आलस्‍य उनकी आंखों में था ,वे मशीनी हो गए थे ।वे ऐसे शहर में रहते थे ,जिसका रिमोट बहुत दूर था ,और इस शहर को उस बहुत दूर वाले रिमोट से बांध दिया गया था ।इस शहर की अपनी जिंदगी खतम हो गई थी ,यहां के लोग अब लोग नहीं रह गए हैं ,वे संतों ,नेताओं ,कारसेवकों का बस पोस्‍टर गिनते हैं ।उनकी रोजी पोस्‍टर छापने ,चिपकाने में है ।पोस्‍टर के कंटेंट पर वे बहस नहीं करते ।उनका घर ,उनका पार्क ,उनका सड़क अचानक पोस्‍टरों ,बैनरों से घिर जाता है ।उनकी सांसें इन बैनरों के आर-पार नहीं जाती ,उनका दम घुटता है ,पर वे अपने सूखे होठों पर उदास मुस्‍कुराहट लाने की कोशिश करते हैं ।

                                               और अयोध्‍या की ये उदासी हर कोई पहचानते हुए भी अनसूनी करता है ,कुछ जो पुराने ढ़ंग से सोचते हैं ,उन्‍हें अब भी लगता है कि मंथराऍं साजिश कर रही है ,और बूढ़ा राजा चुप्‍पी मारे हुए है ।उसकी चुप्‍पी उसके पिता ,पति और राजा की भूमिकाओं को और भी तिक्‍त बना देता है ।पति पिता का हाथ पकड़े है ,और पिता पति को मुंह दबाए ।राजा इन सबको देखके परेशान है  ।राजा इसलिए भी परेशान है कि हस्तिनापुर और कुरूक्षेत्र से संजय ,विदुर ,कृष्‍ण भी पहुंच चुके हैं ,और सरयू की शांत धाराओं में पेंच ,तर्क ,नीति की भँवरे पड़ रही है ।अब अवध ही नहीं हस्तिनापुर की गद्दी का भी निर्धारण सरयू ही करेंगी ,पर पता नहीं सरयू को खुशी क्‍यों नहीं है ,उसकी दूधिया रंगें रक्तिम हो रही है ।इन धाराओं में अदृश्‍य हाथें दिख रही है ,ये बलिष्‍ठ हाथे हैं ,जिनकी नसों और मांसपेशियों से खून की लकीरें स्‍पष्‍ट दिख रही है ,ये थामने वाली हाथे नहीं हैं ,ये नाव चलाने वाली हाथें भी नहीं है  ।इन हाथों में रखे सामानों का क्रम अस्‍त-व्‍यस्‍त है ,कभी चाकू ,कभी झंडा ,कभी तलवार ,कभी जमीन का नक्‍शा ,कभी हाथ उठते हैं सिग्‍नल की तरह ,कभी संकेत देते हैं ,धाराओं के दिशा को मोड़ने वाले ,कभी चुटकियों के बजते ही सरयू का पानी खतम हो जाता है ,कभी ईशारों से ही सरयू में उबाल पैदा किया जाता है ।इन हाथों के संकेत दूर तक जाते हैं ,शायद दुनियाभर के घुड़सवार इंतजार कर रहे हैं ।संकेत मिलते ही वे सरयू की तरफ कूच करेंगे ।सरयू के प्राण अब इन्‍हीं हाथों में है ,सरयू इन्‍हीं हाथों के सहारे देश के नदियों से मिल चुकी है ।देश की नदियां आपस में नहीं जुड़ी ,पर सरयू जुड़ चुकी है ,सरयू देश के बाहर की नदियों से भी जुड़ चुकी है ।



अयोध्‍या के राजा अपनी ही राजधानी में अठारह ताला और उन्‍नीस फाटक के अंदर बंद हैं ।जाहिलों की भीड़ उन्‍हें घर देना चाहती थी ,और इक्‍कीस साल के लिए खुले आसमान में कैद कर दिया ।अवधेश जिन्‍हें किराये की बिजली से चमकाया गया है ,कभी गुजराती शामियाना तो कभी सिंधी शामियाना में ठंडा ,गरमी,बरसात गुजार रहे हैं ।पूरे ब्रह्माण्‍ड का पोषण करने वाले पंडों के हाथ से मिश्री ,मूंगफली खा के समय काट रहे हैं ,त्रिलोक की रक्षा करने वाले श्री राम की सुरक्षा में पांच सौ से ज्‍यादा रायफलधारी लगाए गए हैं ,इतना ही नहीं महिला सुरक्षाकर्मी भी विष्‍णु की सुरक्षा में लगे हैं ।ये महिलाएं अपनी सुरक्षा ,सूचिता को बनाए रखकर भगवान की भी रक्षा कर रही हैं ।अपने घर-परिवार से दूर ये महिलाऍं भगवान की सुरक्षा को लेकर चौकस हैं ।चौबीस गुणे सात ही नहीं ,उन तीन दिनों में भी ,जिन दिनों के लिए वे अपवित्र घोषित कर दी गई हैं ,वे सतर्क हैं ।इन महिलाओं ने भगवान ही नहीं उन भक्‍तों को भी माफ कर दिया है ,जो महिलाओं की पवित्रता को लेकर ज्‍यादा चिंतित रहते हैं ।


                       और राम कई बार अयोध्‍या त्‍यागे ।कभी अध्‍ययन के लिए तो कभी पिता के दिए वचन को पूरा करने के लिए ।एक बार बुंदेलखंड के ओरछा भी चले गए ।एक बार सीता को वापस लाने और पता नहीं कब-कब ।उन्‍हें अयोध्‍या से बाहर जाते लोगों ने कई बार देखा है ।बाल्‍मीकि और तुलसी जो भी कहें बहुत ज्‍यादा उत्‍सव उनके लिए कभी भी सगुण नहीं रहा ।1992 ईसवी के मेले में पता नहीं राम ने क्‍या निश्‍चय किया ,परंतु मुझे तो नहीं लगता कि हजारों सुरक्षाकर्मियों से घिरे उस छोटे स्‍थान में भगवान हैं भी ।संगीनों की आमद भगवान को छोटा साबित करने के लिए पर्याप्‍त तो है ही आदमी को  और इतिहास को भी छोटा साबित करता है ।

                                  मुझे पता नहीं अयोध्‍या में इतिहास के साथ रहूं कि विश्‍वास के साथ रहूं । ये महल और मंदिर जो तीन-चार सौ साल से ज्‍यादा पुरानी नहीं है ,पुरातत्‍व के तर्क पर बहुत ज्‍यादा मजबूत नहीं है ,पर सरयू की उपस्थिति इतनी प्रामाणिक और विश्‍वसनीय है कि इतिहास और विश्‍वास दोनों को एकरूप कर देती है ।सीता की रसोई ,लक्ष्‍मण का घर ,मंथरा का निवास आदि कई नामकरण पुरातत्‍व की बजाय पुराण से संदर्भित है ,कुछ -कुछ पु‍रोहितवाद से भी ,परंतु आम भारत की इनके प्रति आस्‍था देखते ही बनती है ।किसी भी इतिहास को निरा तर्क से खंडित करने का साहस इनके प्रति नहीं हो सकता ।यह आस्‍था का इतिहास है ,और यह 'मैटर' को सीमित करता है ।परंतु इन आस्‍थाओं की एक सीमा होनी चाहिए ।आस्‍थाऍं देश ,समाज और मानवता को खंडित करने का प्रयास करें तो इनकी धुलाई-पोछाई और फिर से रँगाई होनी चाहिए,पर कौन रंगेगा इनको ।

                                          और राम जब-जब अयोध्‍या से बाहर गए ,जो सबसे दृढ़ और निर्मल स्‍मरण था वह सरयू से ही संबंधित था ।सरयू की निर्मल और शांत धारा वे कभी भी भुला नहीं पाए ।इसी तट पर उनका शैशव और बचपन था ।मित्र थे ,गुरू थे ,मिथिलानी के साथ के वे समय ,जिन्‍हें धरती के जिस कोण रहे ,ह्रदय में रखे रहे ।अवध के किसानों की सहजता और दृढ़ता हरदम शक्ति के रूप में उनके साथ रही ।राम जब-जब अयोध्‍या में रहे ,सरयू और अवध शांति और समृद्धि के समरूप हो गए ।परंतु सरयू के जीवन में शांति कम ही रही है ।आज फिर सरयू अशांत था ,देश के विभिन्‍न नदियों ,नालों के जल सरयू में आ रहे थे ,सरयू का कछार ,पेटी और फिर छाती भर गया था ।अब पानी छाती से ऊपर बह रहा था ।यह सगुन नहीं था ,अवध के लिए और देश के लिए भी ।

Saturday 6 July 2013

ट्रांसफर वाला सालाना ऊर्स

ये हैं ट्रांसफर के जायरीन ,बढ़ रहे हैं अपना चूड़ा-सत्‍तू बांध के ।कोई बस से ,ट्रेन से ,कोई अपने वाहन से ।यात्रा गांव से तहसील की ओर ,तहसीलों से जिला मुख्‍यालय और जिला मुख्‍यालय से राजधानी की ओर ।ये पचास साल पहले के गंगास्‍नानार्थियों से भी गए गूजरे हैं ,कोई गाय का गोबर छू रहा है ,कोई मोगलाही बाबा को मुर्गा चढ़ा रहा है ,कोई पान और माछ से सगुन बना रहा है ,और जोशी जी को तो ज्‍योतिषी ने कह दिया था कि गिलहरी का गोबर छू के ही यात्रा प्रारंभ करें ,सो वे शहर के जंगल और पार्क में गिलहरी ढ़ूंढ़ रहे हैं ।पहले के दो दिनों में तो सफलता नहीं मिली है ,पर तीसरे दिन पार्क के कर्मचारी गफूर मियां ने खास टिप्‍स दी है कि गिलहरी बस सुबह और शाम को ही दिशा-मैदान पर निकलते हैं ,सो जोशी जी ने भी टार्गेट पर ध्‍यान दिया है ,और आज वे अपने इकलौते बेटे और नौकर के साथ ही आऐंगे और मिशन पूरा करके ही लौटेंगे ।सबसे जो महत्‍वपूर्ण है कि देश की सर्वोत्‍तम नीतियों में से एक धर्मनिरपेक्षता का पालन पूरी तरह से हो रहा है ।डॉ0 ब्रह्मदेव शुक्‍ल मोगलानी बाबा को मुर्गा चढ़ा रहे हैं और मो0 साजिद पैदल वैद्यनाथ धाम जाऐंगे ।वाह रे हिंदुस्‍तान का सेकुलर रिवाज और गंगा-जमुनी तहजीब ।


पूरे प्रदेश में ट्रांसफर खतम होने वाले हैं ,तो हमारे विभाग में अब शुरू होने वाला है ।मतलब औरों के वार्षिक चक्र से अलग है हमारा वार्षिक चक्र ।मानो हमारे बच्‍चों के लिए हाकिमों ने स्‍कूल में स्‍थान सुरक्षित रखबाया है ,मानो हमारी यात्रा बरसात की किच-किच में ही अपने मुकाम पे पहुंचती है ,और हमारी विदाई पे लोग रोते नहीं ,साथी मूंछ पिजाते हैं ,अ‍धीनस्‍थ आश्‍वस्‍त होता है 'स्‍साला नकचढ़ा गया जिला से 'और अधिकारी ये बतियाते छिपाते नहीं कि 'मैं चाहता तो रोक लेता उसे ' ।जो भी हो दलाल जिला से लेकर राजधानी तक फैल गए हैं ।आपके शहर में तो वे हैं ही ,जो पिछले कई महीनों से आपसे पूछ रहे हैं ,फिर आपकी पत्‍नी को भी कनविंस करने का प्रयास कर रहे हैं 'भाभी जी कहां ठीक रहेगा ' ,'बच्‍चों के स्‍कूल के लिए ये ठीक रहेगा '  ।और पता नहीं स्‍टेशन से ही दललबा सब पीछे लगा हुआ है ,विधान सभा मार्ग ,सचिवालय के सामने वाले सड़क पर भी कई सफेदपोश ,कृष्‍णवस्‍त्र धारक ,पॉकेटमार और सिनेमा टिकट का ब्‍लैक मार्केटर अपने अपने अंदाज से आपसे पूछता हुआ फिर आपके जेब को और आपको चेक करता हुआ ।


आप किसी गफलत में नहीं रहे ।ये जरूरी नहीं कि सफेद पोश और वह काला कोट धारी ही आपको मंजिल तक ले जाए ,वह पॉकेटमार भी कम धांसू नहीं और कुछ साहेब लोग पॉकेटमारों को ज्‍यादा पसंद करते हैं ,क्‍योंकि पॉकेटमार आपसे ज्‍यादा मोल-तोल करते हुए उनको ज्‍यादा से ज्‍यादा दिलबाता है ,और सफेदपोश जल्‍दी में रहता है ,और उनका हिस्‍सा भी कम होता है ,वह बात हरदम मुख्‍यमंत्री और मंत्री का ही करेगा ,और आपके सामने भी किसी का फोन आएगा तो एकदम चौकस होके कहेगा 'बाद में बात करिए अभी तो प्रमुख सचिव से बात चल रही है '   ।मूंछ वाला ,बिना मूंछ वाला ,रीढ़ वाला ,बिना रीढ़ वाला ,दिमाग वाला ,बिना दिमाग वाला भी कोई भी हमारा ट्रांसफर करा सकता है ।सबकी अपनी पहुंच है ,अपना रेट है ।सब कोई आश्‍वस्‍त कर रहा है ।अब आपके विवेक पर है ,रहने और जाने के रिस्‍क को तौलते हुए जल्‍दी उन्‍हें बता दीजिए ,और आप भी अपना जेब ,दिल ,जुबान को चेक करते हुए उन्‍हें बता दीजिए ।वे बड़े महत्‍वपूर्ण मिशन पर हैं ,उनका समय मत खाईये ,उनका दिमाग मत खाईए ।वे जो बता रहे ,मूक होकर ग्रहण करें।हमारे एक मित्र 'संशयात्‍मा विनश्‍यति' कहकर उनका दिमाग और चढ़ाते हैं ।लेकिन जब कोई बाजार में है तो क्‍यों न ठोक बजाकर ही खरीदे ।अब वे वाराणसी के नाम पर चंदौली और फैजाबाद के नाम पर अयोध्‍या कर देंगे तो आप कहां कहां मुंह दिखाऐंगे ,किस किस से आपबीती बताऐंगे और बताकर ही क्‍या कुछ कर लेंगे ।एक रस्‍ता ये भी है कि चुपचाप जाके बड़े साहेब की गोद में बैठ जाईए और उनके झोले के निकट अपना पर्स रख दीजिए ,फिर वे जितना मन हो निकाल लेंगे ,और आपके मन की जगह पर आपको दे देंगे ।और जब एक ही जगह पर आपही की तरह दो कंपिटेंट लोग हो ,तब साहेब के दाढ़ी को सहलाईए ,उसमें इत्र लगाइए ,उन दाढि़यों पर कोई शेर कहिए।


                                                                          यदि शेरों से काम नहीं चले तो रोईए,झूठ बोलिए कि पिता की तबियत खराब है ,और जिस अस्‍पताल में ईलाज करानी है ,वह इसी शहर में है ।यदि रोने से भी काम न चले तो साहेब के घर चले जाईए ,साहेब की ही नहीं उनकी बेगम का भी पैर पकड़ लीजिए ,क्‍या पता वहीं काम बन जाए ।ध्‍यान दीजिएगा साहेब के बेगम का पैर पकड़ते वक्‍त नफासत में कोई कमी न हो ,कोई शेर वेर पढ़ने की गलती मत कीजिएगा ,हां जितना मन होगा रोईएगा ,थोड़ा गाकर ,थोड़ा चिल्‍लाकर ,कुछ भर्वल भी आल्‍हा की तरह ।यदि बेगम पसीझ गई तो फिर समझ लीजिए आपका काम सस्‍ता भी होगा और अच्‍छा भी ।फिर अगली मीटिंग आप जब आए तो यह कहते हुए कि मेरे क्षेत्र का प्रसिद्ध आईटम है एक-दो साड़ी जरूर लाईए ।वैसे ये कोई अनिवार्य आईटम नहीं है ,जितनी मैडम उतनी पसंद ।सो अपना सारा ध्‍यान मैडम की पसंद पर एकाग्र करिए ।

अब इधर देखिए सब बुद्धि रंजन की तरह बुद्धिमान तो है नहीं कि जाते हैं राजधानी तो बताते हैं कि जा रहे आजमगढ़ ।सब उनकी तरह धैर्यवान भी नहीं है कि कितना भी हिचकोला लगे डकार तक नहीं निकालेंगे ,हम लोग तो पहली बार बस पर चढ़े यात्री की तरह थे ,जो बस खिसकी और हम लोग लगे आंख-नाक मूनने ।विनय जी आऐंगे और आपकी पेट से सबकुछ निकलबा लेंगे ,वे भी कुछ बोलेंगे ,लेकिन वह आपके काम का नहीं होगा ,वह उनके द्वारा पहले से ही सोचे गए पार्ट और डायलॉग का एक हिस्‍सा होगा ।और वे वहीं करेंगे जो बोलेंगे नहीं ,आज तक यही हुआ है ।वे बड़़े दिमाग वाले आदमी हैं ,सबको अपने ही ग्रूप का मनबाने का नौटंकी करते हुए ,वे कम ही लोगों के हैं ।वे उन सबके हैं ,जिनका कोई विकल्‍प उनके पास नहीं है ,परंतु वे आजकल सबसे पूछ रहे हैं कि ट्रांसफर में इस साल कहां जाना चाहते हैं ।

                                                       काम कराने की कोई मानक विधि नहीं है ,कोई मानक माध्‍यम भी नहीं है ,कोई मानक राशि भी नहीं है ,कोई खास देवता एवं कोई स्‍पेशल मंत्र भी नहीं है ।किसी मंत्री ,विधायक की शरण लीजिए ।वे आपका काम कराऐंगे ,लेकिन चिट्ठी लिखाने की गलती मत कीजिए ।अइसन अइसन दू सौ चिट्ठी ई सचिवालय में डेली आवत हई ।विधायक जी कहेंगे कि 'अपना भाई है ' या फिर 'निकट संबंधी है ' ।अब आपके काम में कुछ वेट है ।अब फिर इतिश्री समझने की गलती मत कराईए ।साहेब से मिलिए तो विधायक की बदतमीजी के लिए गलती मानिए और उनको आश्‍वस्‍त करिए कि 'मेरी चिंता को देखते हुए पिता से नहीं रहा गया और ये गलती हो गई ' ।अब क्षमा मांगने की पूरी नौटंकी करते हुए अपना पर्स खोल दीजिए ।इंशाअल्‍लाह चाहेंगे तो काम जरूर बन जाऐगा 



यदि काम यहां भी नहीं बनता है तो फिर इस मूलमंत्र पर आईए कि साहेबबा का चाहत है
? कोई खास गहना,कोई खास शूट ,किसी खास तरह की कोई बात ।थोड़ा दिमाग पे जोर डालिए ई ससुरा चाहत का है ?
कोई औरत कोई मरद कोई आशीर्वाद कोई जन्‍तर कोई टोना टोटका ।यदि समय मिले तो उसे भालू और हकीम से जरूर फूंकबा दीजिए । कभी-कभी भालू के फूंकने से पतला चीज भी मोटा दिखने लगता है 
!शायद भालू के दांत और मुंह से इतिहास का अंत हो जाता है ,और हकीम के दांत और मुंह की गंदगी से विश्‍वास का रास्‍ता उत्‍तरआधुनिकता का संकेत करता है ।


                                                                             अभी तो हाकिम का कमरा भी सजा होगा ,उन्‍हीं का क्‍यूं रामविजय बाबू और श्‍यामविजय बाबू भी मजे में होंगे ।उनके टेबुल पर ढ़ेर सारी फाईलें ,और टेबुल के नीचे लस्‍सी ,नमकीन के ढ़ेर सारे निशानियां मौजूद होंगे ,जिन्‍हें चपरासी भी साफ नहीं करता होगा ,ताकि कोई भी आनेवाला शऊर न भूले ।रामविजय ट्रांसफर की सूची में हर अनिच्‍छुक का नाम दिखाता होगा ,ज‍बकि ट्रांसफर चाहने वालों से भर मुंह बात भी कैसे कर पाएगा ।चाहने वाले के लिए 'कैसे होगा  ,बड़ा मुश्किल है ,बड़ी ही टाईट सिचुएशन है ,बड़ा लेट कर दिए 'जैसा लतीफा निकालता होगा ,और नहीं चाहनेवालों के लिए भी ऐसे ही वाक्‍यों की महा-श्रृंखलाएं




Tuesday 7 May 2013

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : आलोचना का स्‍वतंत्र मान



 यह तय है कि अपनी -अपनी रूचि और अपने -अपने संस्‍कार लेकर वस्‍तु का यथार्थ स्‍वरूप-निर्णय नहीं हो सकता ।कोई एक सामान्‍य मान-दण्‍ड होना चाहिए ।वह मान-दण्‍ड बुद्धि है अर्थात् किसी वस्‍तु ,धर्म या क्रिया के वास्‍तविक रहस्‍य का पता लगाने के लिए उसे अपने अनुराग-विराग या इच्‍छा -द्वेष के साथ नहीं सान देना चाहिए ,बल्कि देखना चाहिए कि देखनेवाले के बिना भी वस्‍तु अपने-आपमें क्‍या है  ?गीता में इसी बात को नाना भाव से कहा गया है ।कभी द्वन्‍द्वों से अपरिचालित होने को ,कभी बुद्धि की शरण लेने को ,कभी 'अफलाशी' होकर कर्म करने को कहा गया है ।समालेाचना का जो ढर्श्रा चल रहा है ,उसमें द्वंद्वों द्वारा परिचालित होने को दोष का कारण तो माना नहीं जाता ,उल्‍टे कभी-कभी उसके लिए गर्व किया जाता है ।अनुराग-विराग,इच्‍छा-द्वेष आदि के द्वारा निर्णय पर पहुंचने को समालोचक गर्व की वस्‍तु समझता है ।

सम्‍मतियों की इस बहुमुखी विरोधिता का कारण है ,वस्‍तु को मानसिक संस्‍कारों के चश्‍मे से देखना और बुद्धि के द्वारा न देखना ।अत्‍यधिक आधुनिक भाषा में कहें तो सब्‍जेक्‍टीविटी देखना ,और ऑब्‍जेक्‍टीवली देखने का प्रयत्‍न न करना ।पर समालेाचक को अपनी लज्‍जा तो छिपानी ही चाहिए ।कुछ समालोचक तो लज्जित होना जानते ही नहीं ।वे हर गली-कूचे में अपनी विशेष राय और अपने सौप्रतिद्वन्‍द्वियों की बात गर्व के साथ सुनाते रहते हैं ।पर कुछ जो शीलवान हैं ,इस बात से शर्मिंदा भी होते हैं और इसी लज्‍जा से बचने के लिए वेदांत से लेकर कामशास्‍त्र तक का हवाला दिया करते हैा ।इन शर्मिंदा होने वाले शीलवानों के कारण समालोचना की समस्‍या और भी जटिल हो रही है ।इन्‍होंने इतने बहुविध शास्‍त्रीय दृष्टिकोण और लोक-शास्‍त्रादि पक्षों का आविष्‍कार किया है -महज परस्‍पर-विरोधी उक्तियों के समाधान के लिए-कि पाठक का चित्‍त र्विा्रांत हो जाता है । ऐसे ही एक प्रकार के समालोचकों ने एक स्‍वतंत्र रस-लोक की कल्‍पना की है ।इनके पास दर्शनशास्‍त्र की व्‍युत्‍पत्ति है और इसीलिए दर्शन की गम्‍भीरता से आतंकित सह्रदय समाज पर इनका सिक्‍का भी बहुत जम गया है ।ये छूटते ही शरीर के दो हिस्‍से कर डालते हैं -शरीर और आत्‍मा ,जड़ और चेतन ।अब चेतन में आइए तो चेतन भी देा ,लोक पक्षात्‍मक और भाव पक्षात्‍मक ।और लोकपक्ष भी दो ,आदर्शवादी और यथार्थवादी .... इत्‍यादि ।इस प्रकार समालोचना का मेघ-मल्‍हार शुरू होता है आर अनभ्र वज्रपात प्राय: ही होता दिख जाता है ।

साभार 'आलोचना का स्‍वतंत्र मान ' ,लोकभारती प्रकाशन






Sunday 24 March 2013

कबीर की अकथ कहानी(पुरूषोत्‍तम अग्रवाल) पर वागीश शुक्‍ल :साभार 'आलोचना'

चयनित अंश:-
समीक्षाधीन पुस्‍तक की सीमाऍं वही है जो आधुनिक विमर्श की है और जब तक उस आधुनिक विमर्श की जड़ों तक नहीं जाया जाता ,उसकी विसंगतियों की कोई पड़ताल भी सतक के नीचे नहीं जा सकती ।मैं केवल एक उदाहरण दूंगा :यदि कबीर के वर्णाश्रम-विरोध की परख 'ह्यूमन राइट्स' के संदर्भ में की जा सकती है तो उनके जीवहिंसा-विरोध की पड़ताल 'एनिमल राइट्स' के सन्‍दर्भ में क्‍यों नहीं की जा सकती ?यदि इसका कोई और कारण है ,सिवाय इसके कि 'ह्यूमन राइट्स' के लिए कानून बन चुके हैं और 'एनिमल राइट्स' के लिए अभी कानून नहीं बने ,तो वह समझना मेरे लिए सम्‍भव नहीं हुआ ।किन्‍तु कल वे बन भी सकते हैं ।तब ?

प्रारंभिक में कहा गया है कि कबीर यह चेतावनी दे रहे हैं :मेरे ब्रह्मविचार को तुम गीत मत समझ बैठना-'तुम जिन जानौ यह गीत है ,यह तो निज ब्रह्मविचार रे ।' गीत और ब्रह्मविचार में अन्‍तर की यह चेतावनी केवल कबीर ने ही नहीं अश्‍वघोष ने भी दी है ,लेकिन भगवत्‍पाद या कालिदास ने नहीं दी ,और यहीं उस मानसिकता का ,जिसे मैं 'पेगन मानसिकता' कहता हूं ,और उस मानसिकता का ,जिसे मैं 'डि-पेगनाइजेशन की मानसिकता' कहता हूं किन्‍तु जिसका प्रचलित नाम 'दूसरी परम्‍परा' है ,अन्‍तर मौजूद है ।

कालै यास्‍पर्स ने जब यह कहा था कि ईसाइयत के भीतर ट्रैजेडी नहीं लिखी जा सकती और जब फ़ारसी-अरबी के काव्‍यशास्‍त्री लगातार यह घोषणा करते हैं कि इस्‍लाम के भीतर कविता सम्‍भव नहीं है तो वे इस अन्‍तर की ही ओर इशारा कर रहे हैं ।

Saturday 23 March 2013

धाकड़ मजिस्‍ट्रेट




धाकड़ मजिस्‍ट्रेट वो होता है ,जो मेला ,दंगा और परीक्षा ड्यूटियों में डेली हिसाब करता है ।उसे दिहाड़ी कहने-कहाने का भय नहीं है ,बल्कि 'लेते' वक्‍त एक आत्‍मसंतोष का भाव होता है कि 'कोई फ्री का थोड़े ही ले रहा हूं 'वह मेला में दुकान गिनकर ,दंगा में मूड़ी गिनकर और परीक्षा में एडमिट कार्ड गिनकर लेता है ।अब जैसे कि परीक्षा ड्यूटी है तो प्रति पाली प्रति विद्यार्थी मात्र दस रूपये की दर से हिसाब कर दीजिए ।अब आप सोच रहे होंगे कि इससे तो दोहजार -तीन हजार डेली ही मिल पाएगा ,और यदि अंत में लिया जाए तो लेने के कई नाम है -कोपरेशन के लिए ,नॉन आपरेशन केलिए ,होली सेलिब्रेशन के लिए या फिर सॉलिड ठकुरई कि 'भय बिनु ...' या फिर अचूक ब्राह्मणवाद कि राजा ,ब्राह्मण और देवता के यहां लोग खाली हाथ नहीं जाते हैं ,और लेनदेन के तमाम मॉडल इसी वाद में अंर्तभुक्‍त हैं ।अब आप डेली हिसाब नहीं किए और कहीं हाकिम ने ड्यूटी बदल दी ,तो ये पुराना बनिया/स्‍कूल प्रबंधक आपसे मिलेगा ? और आप कुछ ले पाऐंगे ?।इसलिए जो भी हो 'हस्‍तामलक' की तरह हो 'बाद में मिलना है ' या 'किसी दिन देख लेंगे' वालों को आप दिखा दीजिए कि आप कितने बड़े मजिस्‍ट्रेट हैं ,और नियमों ,अधिनिय और आदेशों का इतना धुर्रा उड़ाइए कि ससुर स्‍कूल सहित उड़ जाए ।ये जो पिछले दिन ड्यूटी बदली है तो स्‍कूल प्रबंधक और मजिस्‍ट्रेट बहनों की तरह रोए ,और आने वाले मजिस्‍ट्रेट के लिए ढ़ेर सारी कथाऍं ,घटनाऍं मौजूद रहे कि 'साहब कितने अच्‍छे थे ' , और 'साहब तो गाना भी गाते थे ' ।अब आपके पास दो ही विकल्‍प है या तो दिहाड़ी की तरह डेली वसूलें या फिर अच्‍छे की तरह गाना गाऍं .........

Sunday 17 March 2013

कबीर की अकथ कहानी पर :डेविड लॉरेंजन

कबीर की अकथ कहानी पर :डेविड लॉरेंजन के आलेख का एक अंश::::-------


अपनी अकथ कहानी में अग्रवाल शास्‍त्रोक्‍त भक्ति और काव्‍योक्‍त भक्ति का जो नया वर्गीकरण प्रस्‍तुत करते हैं ,वह सामाजिक और धार्मिक प्रतिमानों को कलात्‍मक कसौटी के साथ जोड़ने का प्रयास प्रतीत होता है ।दूसरे शब्‍दों में ,अग्रवाल कवियों की धार्मिक और सामाजिक विचारधारात्‍मक भिन्‍नताओं के साथ ही काव्‍यात्‍मक भिन्‍नताओं पर भी बल देना चाहते हैं ।लेकिन यह बात हर जगह साफ नहीं हो पाती कि अग्रवाल तुलसीदास और सूरदास को किस वर्ग में रखना चाहते हैं ।एक स्‍थान पर वे केवल कबीर और निर्गुणी कवियों को ही नहीं ,बल्कि बस ,आदिकालीन और केशव जैसे रीतिकालीन कवियों को ही बाहर रखते हुए नामदेव ,मीरां ,तुलसीदास और सूरदास को भी काव्‍योक्‍त-भक्ति के अंतर्गत रखते प्रतीत होते हैं (पृ0 343) ।लेकिन कुछ ही पृष्‍ठों के बाद ,लगता है कि अग्रवाल तुलसीदास और सूरदास को काव्‍योक्‍त-भक्ति से बाहर मानते हैं (पृ 350) ।यह रेखांकित करते हुए कि कबीर अपनी भक्ति को स्‍पष्‍ट शब्‍दों में भगति नारदी कहते हैं ,पुरूषोत्‍तम अग्रवाल काव्‍योक्‍त-शास्‍त्रोक्‍त वर्गीकरण के लिए प्रयुक्‍त धार्मिक विशिष्‍टताओं को क्रमश: नारद-भक्ति-सूत्र और शांडिल्‍य-भक्ति-सूत्र की वैचारिक विशिष्‍टताओं से विश्‍वसनीय रूप से जोड़ते हैं ।उनके द्वारा काव्‍योक्‍त कही गई भक्ति ,प्रेम प्रेरित ,उपलब्‍ध दार्शनिक संप्रदायों से स्‍वायत्‍त ,भागीदारी पर आधारित संवेदना है ,जबकि शास्‍त्रोक्‍त-भक्ति से अग्रवाल का आशय पारंपरिक संस्‍कृत शास्‍त्रों पर निर्भर और पारंपरिक धार्मिक सत्‍ता के समक्ष समर्पण की संवेदना से है ।

इन तीन वर्गीकरणों : सगुण-निर्गुण ,वर्ण-धर्मी और अवर्णधर्मी और शास्‍त्रोक्‍त-भक्ति और काव्‍योक्‍त-भक्ति के बीच की भ्रांतियों और उलट-पुलट से बचने का एक सीधा -सा तरीका यह स्‍वीकार कर लेना हो सकता है कि उत्‍तर भारत के भक्‍त कवियों की रचनाओं में धार्मिक,सामाजिक विचारधारात्‍मक और कलात्‍मक अंतर सदा साथ-साथ ही उपस्थित हों ,यह जरूरी नहीं ।दूसरे शब्‍दों में ,संभवत: यह बेहतर होगा कि इनमें सभी कवियों को समानांतर श्रेणियों में रखने पर जोर न दिया जाए ।इस पद्धति से,कबीरकी कविता को निर्गुणी ,अवर्ण-धर्मी और काव्‍योक्‍त वर्ग में रखा जा सकता है ।इसी तरह, तुलसीदास के काव्‍य को ,या कम से कम कुछ भजनों को ,सगुणी ,अवर्ण-धर्मी और काव्‍योक्‍त वर्ग में रखा जा सकता है ।


जिसे पुरूषोत्‍तम अग्रवाल भारत की आरंभिक आधुनिकता का दौर कहते हैं ,उस दौर में ,यानी मोटे तौर पर सन् 1400 से 1650 ई0 के बीच ,उत्‍तर भारत में विकसित हुई भक्ति-संवेदना की आंतरिक भिन्‍नताओं की रोचक तुलना यूरोपीय इतिहास के 1650 से 1790 के बीच के दौर अर्थात् तथाकथित यूरोपीय नवजागरण के दौर की एक विशेषता से की जा सकती है ।कुछ ही दिन पहले ,जोनाथन इस्राइल ने एक बहुत मजबूत तर्क प्रस्‍तुत किया है कि यूरोप में स्‍पष्‍ट रूप से दो नवजागरण हुए थे :स्पिनोजा ,डेनिस दिदरो ,डि हालबाक और थॉमस पेन जैसे बौद्धिकों के साथ जुड़ा रेडिकल नवजागरण ,और जॉन लाक ,वाल्‍त्‍ेयर ,इमैनुअल कांट और एडमंड बर्क जैसे बौद्धिकों के साथ जुड़ा कंजरवेटिव नवजागरण ।अधिक रेडिकल दिदरो और हालबाक के साथ वाल्‍तेयर की तुलना करते हुए ,इनके बीच वैषम्‍य का रेखांकन करने के लिए इस्राइल लिन शब्‍दों का प्रयोग करते हैं ,उनका उपयोग तुलसीदास और कबीर की तुलना करने के लिए भी ,बिना किसी ज्‍यादा फेरबदल के लिए किया जा सकता है


(आलोचना त्रैमासिक 46 वें अंक से साभार : मूल अंग्रेजी आलेख का अंग्रेजी से अनुवाद सुधांशुभूषण नाथ  तिवारी)



17 मार्च जिंदाबाद

इस शहर ने आज पहली बार औरतों का जुलूस देखा ।वैसे तो औरतों की क्रमबद्ध पंक्तियां विष्‍णु यज्ञ या फिर साईं बाबा के जुलूस में निकलती रही है ,जिसे शोभा यात्रा या और भी सुरूचिपूर्ण नाम दिया जाता रहा है ,पर औरतों का जुलूस देखकर शहर को अच्‍छा नहीं लगा था ।शहर तो लड़कियों को डांस करते देख या फिर बिना बुर्का या घूंघट में औरतों को देख चिढ़ जाता था पर ये तो अति थी ।औरतें जुलूस में नाच रही थी ,और औरतों के जागने की बात कर रही थी ,उन्‍होंने आधी आबादी ,भ्रूण परीक्षण ,लड़कियों के शिक्षा ,महिलाओं के अधिकार जैसे विषय पर मनमोहक नारे बनाए थे ,और शहर की शांति भंग करते हुए 'आवाज दो हम एक हैं ' की नारा लगा रही थी ।मेरे एक मित्र ने उनके साड़ी ,ब्‍लाउज की कीमत लगाते हुए कहा कि वे निम्‍न -मध्‍य वर्ग की महिलाएं थी ,कुछ तो स्‍पष्‍टत: निम्‍न वर्ग की लग रही थी ,जो केवल चिल्‍लाने के लिए किराए पर लाई गई थी ।एक मित्र ने उनके चप्‍पलों पर गौर फरमाया ,निष्‍कर्ष यही था कि ये आम तौर पर निम्‍न वर्ग की महिलाएं है ,तथा जुलूस स्‍वत:स्‍फूर्त न होकर प्रायोजित है ।सड़क किनारे की दुकानों पर तथाकथित उच्‍च वर्ग की महिलाएं शांतिपूर्ण आनंद के साथ खरीदारी करती रही ,कॉलेज की छात्राऍं भी मुंह बिचकाते हुए अपने अपने कामों में मगन रही ।कुछ पुलिसकर्मियों के साथ जुलूस आगे बढ़ती रही ,भ्रूण हत्‍या विरोधी नारे गूंजती रही ,पर शायद डॉक्‍टर लोग जुलूस की आवाज को नजरअंदाज करते हुए गर्भपात कराने में बिजी रहे ।जुलूस का आनंद तो शायद तब आता जब ये महिलाऍं हँसिये ,खुरपी से उन डॉक्‍टरों की अँतडि़या बाहर निकाल लेते ,जो बस पुत्रजन्‍म को मैनेज करने के लिए अल्‍ट्रासाउंड और एबार्शन करबाते हैं..............

Saturday 16 March 2013

डस्‍टबिन

कोई लिखा ,अधलिखा ,कलम से लिखा ,पेंसिल से लिखा ,अपना लिखा ,किसी अधिकारी का आदेश ,अधीनस्‍थों की आख्‍या ,हाईकोर्ट का जजमेंट ,सरकार की रूलिंग ,सहकर्मियों के लूपहोल्‍स के साक्ष्‍य सभी संग्रहित ।फाईल मे ,बिना फाईल किसी डायरी मे ,किसी किताब में ,जो ज्‍यादा पुरानी हो गई तो अटैची में ,जो बहुत पुरानी हो गई तो स्‍टोर रूम में ,और साल दो साल बाद एक दो बंडल गांव में रख दिए ,बाबूजी-मां के पास ।पता नहीं कब किसकी जरूरत हो जाए ,सो किसी कागज को फाड़ते ,कबाड़ी वाले से बेचते ,डस्‍टबिन मे डालते या फिर रद्दी को फेकते वक्‍त हरदम एक डर बना रहा ।एक बार तो पत्‍नी ने डस्‍टबिन में शाम को ही कूड़ा डाल दिया था ,‍पर सुबह को वह एक-एक रद्दी को जोड़ता रहा ।उसकी इस आदत को पत्‍नी भी जान गई थी ,सो हरेक कागज(चाहे कितना भी रद्दी क्‍यों न हो)
को डस्‍टबिन में डालते वक्‍त वह भी पूछ लेती थी 'किसी काम का तो नहीं' ,और यह चिंता ,परेशानी केवल कागजों को लेकर हो ,यह बात नहीं थी ,संबंधों को लेकर भी थी ।घर,परिवार ,किसिम किसिम के दोस्‍त ,दूर-दराज के संबंधी सब कागजों की ही तरह उसके जेहन में ठूसे हुए थे ।बेशक कुछ फेके जाने लायक थे ,पर उसको लगता था कि शायद कुछ काम हो जाए इनका या फिर.............

Friday 15 March 2013

'आलोचना' : अकथ कहानी प्रेम की

'आलोचना' का यह अंक श्री पुरूषोत्‍तम अग्रवाल की पुस्‍तक 'अकथ कहानी प्रेम की ' के बहाने पुन: कबीर के घर में पैठने का प्रयत्‍न है ।हालांकि शीश काटकर भूमि पर रखके अन्‍दर घर में जाने का साहस कोई बिरला ही कर पाता है ।

                                                                    इस पुस्‍तक ने कबीर को ,कवि कबीर को ,और उनके समय-समाज को फिर से और नए सिरे से गुनने समझने के लिए प्रेरित किया है ।वास्‍तव में हम जिस कबीर को जानते हैं वह संत महात्‍मा या पंथ-मठ-सम्‍प्रदाय वाले कबीर नहीं बल्कि कवि कबीर ही हैं ।भारतीय जीवन में अनेक संत-महात्‍मा हुए होंगे ,जैसे अनेक दार्शनिक और ऋषि भी ,लेकिन लोक और साहित्‍य-समाज ने उन्‍हीं को कंठस्‍थ किया जो मुख्‍यत: कवि हैं ,कबीर-सूर-तुलसी-मीरां या ललदद,बसवण्‍णा,तुकाराम और शाह लतीफ ।यह घटना दर्शन और काव्‍य के आन्‍तरिक सम्‍बन्‍ध को भी प्रकाशित करती है ।


                                                          रवीन्‍द्रनाथ भी कवि और कबीर को ही जानते थे ,रहस्‍यवाद आनुषंगिक था और काव्‍य में ही अनुस्‍यूत ।हरिऔध भी उसी काव्‍य से आकृष्‍ट हुए ।प्रेमचन्‍द की कहानी 'कफन' ,'ठगिनी क्‍यों नैना झमकावै' के बगैर अपूर्ण होती ।नागार्जुन ने कबीर के जन्‍मदिन ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा को अपना जन्‍मदिन माना । त्रिलोचन ,मुक्तिबोध ,भीष्‍म साहनी ,रघुवंश सबने कवि कबीर पर लिखा ।तीन दशक पहले भृगुनन्‍दन त्रिपाठी ने जो कविता पत्रिका निकाली असका नाम रखा 'कबीर' ।और ,कबीर की छह सौवीं जयन्‍ती पर सन् 2000 में भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान ,शिमला में कबीर की कविता पर केंद्रित एक संगोष्‍ठी हुई जिसमें गोपेश्‍वर सिंह और मैंने भी लेख पढ़े जो  'कबीर के मस्‍तक पर मोरपंख 'शीष्‍र्ज्ञक से और फिर 'कवि कबीर' शीर्षक से उसी वर्ष ''सम्‍भव' (सं0 सुभाष शर्मा) और अन्‍य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ ।उसी समय नामवर सिंह का एक अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण लेख कबीर की कविता पर 'हंस' में प्रकाशित हुआ था ।लघु पत्रिकाओं ने ,विशेषकर प्रगतिशील धारा की पत्रिकाओं ने ,कबीर पर लगातार सामग्री दी जिसमें आज से पच्‍चीस-तीस साल पहले 'वसुधा' द्वारा जारी एक पुस्तिका  अभी भी याद है 'कबीर और तत्‍कालीन कृषक समाज' ।यह सब कहने -दुहराने की जरूरत इसलिए है कि हम भूलें नहीं कि लोक जीवन तथा कंठ परम्‍परा के साथ-साथ हिन्‍दी साहित्‍य समाज में कबीर की कविता पर लगातार बात होती रही है और यह पुस्‍तक उसी चर्चा-परम्‍परा को समृद्ध करती है ।

                                                           साथ ही साथ यह पुस्‍तक अनेक दूसरे सवालों ,पक्षों पर भी बात करती है  । 'औपनिवेशिक आधुनिकता' बनाम 'देशज आधुनिकता' ऐसा ही एक महत्‍वपूर्ण सवाल है ।हालांकि 'औपनिवेशिक आधुनिकता' स्‍वयं में विरोधाभासी पद है - ऐसी कोई आधुनिकता सम्‍भव ही नहीं जो उपनिवेश की समर्थक या उससे संयुक्‍त हो ।यदि ऐसा होता है तो उसे आधुनिकता का विपर्यय ही कहा जाएगा ।गांधी जी ने 'हिन्‍द स्‍वराज' में यूरोप की आधुनिकता के इसी विपर्यय पर चोट की थी ।इसी सन्‍दर्भ में नेहरू जी ने भी पूछा था : कौन -सा इंग्‍लैंड भारत आया -व्‍यापारियों का या शेक्‍सपीयर-मिल्‍टन का ?  बाकी तो हर समाज की अपनी आधुनिकता होगी या हो सकती है (स्‍वयं जर्मनी ,इटली ,इंग्‍लैंड  या अमेरिका की आधुनिकता एक ही तो नहीं कही जा सकती )जिसमें कुछ तत्‍व जैसे स्‍वतंत्रता ,समानता और बन्‍धुता सर्वनिष्‍ठ भी होंगे ।


                               'धर्मेतर अध्‍यात्‍म' भी इसी तरह का पद है ।पुरूषोत्‍तम अग्रवाल ने इस सन्‍दर्भ में मार्क्‍स की अति चर्चित (लगभग विस्‍मृत नहीं ) 'आर्थिक एवं दार्शनिक पांडुलिपियां 1844 'में व्‍यवहृत स्पिरिचुअलिज्‍म पद का भी उल्‍लेख किया है जो वास्‍तव में चेतना या आत्‍म-तत्‍व को इंगित करता है ,एक नास्तिक की आत्मिकता को (क्‍योंकि मार्क्‍स के आरम्भिक लेख ही नास्तिकता के पक्ष में थे )किसी धर्मगंधी अध्‍यात्‍म को नहीं
।क्‍या धर्महीन या धर्मेतर आध्‍यात्मिकता सम्‍भव है ?(कबीर नास्तिक नहीं थे ) आध्‍यात्मिकता बिना किसी इतर की उपस्थिति की कल्‍पना के सम्‍भव नहीं ।एक ऐसा इतर जो हमसे भिन्‍न ,सुदूर और बृहत्‍तर हो ।व्‍यक्ति की आत्‍मा के सर्वोच्‍च (ब्रह्म की ) आत्‍मा से संयोग अथवा संयोग की आकांक्षा को व्‍यक्‍त करने के लिए प्राय: इस पद का प्रयोग होता आया है ।इसलिए इस पद के साथ धर्म का एक पूरा इतिहास सटा हुआ है ।रिल्‍के ,जो 'आध्‍यात्मिक' भी कहे जाते हैं ,का सबसे प्रिय उपन्‍यास था -डेनिश लेखक याकोब्‍सन का छोटा-सा उपन्‍यास 'नील्‍स लाइम' ।लेकिन 'नील्‍स लाइम' एक नास्तिक की कृति है -मनुष्‍य के इस ब्रह्मांड में निष्‍कवच संघर्ष की गाथा ,'न तो मनुष्‍य का कोई घर इस पृथ्‍वी पर है ,न कोई आसरा कहीं और ' ,'हर आत्‍मा अकेली है ......कोई किसी से कभी न पूरा मिल पाती है न पूरा विलीन .......' ।क्‍या इस भाव को 'धर्मेतर अध्‍यात्‍म' कहा जाना चाहिए  ? नए भाव-रसों को पुराने पद उसी तरह बदल देते हैं जैसे कांसे का बर्तन ताजा दही को ।

श्री पुरूषोत्‍तम अग्रवाल की इस पुस्‍तक पर देश और विदेश के अनेक महत्‍वपूर्ण विद्वानों के निबन्‍ध एवं टिप्‍पणियां यहां एकत्र हैं जो पुस्‍तक के महत्‍व की सूचक तो हैं ही ,कबीर की निरन्‍तर उपस्थिति का भी प्रमाण है ।यह अंक वास्‍तव में एक परिसंवाद है जो आगे भी और अंक के बाहर भी जारी रहेगा ।


मुझ सरीखे मूरतों के लिए कबीर साहेब पहले ही फरमा गए हैं -

अकथ कहानी प्रेम की ,कछू कही ना जाय ।
गूंगे के री सर्करा ,खाए अउ मुसकाय ।
                           -अरूण कमल



(साभार 'आलोचना'त्रैमासिक सहस्राब्‍दी अंक छियालिस)



























रवीन्‍द्रनाथ कवि

Thursday 14 March 2013

(जहां हम रहते हैं)

तभी बरहमदेव के अंदर वाले बरहमदेव ने टोका ‘ ये क्‍या बरहमदेव ,अपना पुराना दिन भूल गये क्‍या ,भूल गए जब साहेब के सामने कुर्सी पर बैठने की क्‍या सजा मिली ,भूल गए उन साहेबों को जिन्‍हें सलाम करते-करते हाथ ,बाजू ,बांह दर्द करते थे ,वे भी जो हाथ से नमस्‍कार करना नहीं पसंद करते थे ,या तो साष्‍टांग या फिर पैर छूकर ‘ भूल गए उन साहेबों को जो कभी भी परिवार को साथ लेके नहीं रहे ,परिवार ईलाहाबाद ,लखनऊ खुद किसी पिछड़े ईलाके में नौकरी करते रहे ,जहां भी रहे भोजन-साजन और रात-बितावन के लिए नया नया परिवार बनाते रहे ,और ये परिवार ये तो गरीब काश्‍तकार के बहू-बेटी थे या फिर निचले स्‍टाफ की पत्नियां ‘

और बरहमदेव चाहते थे कि सबकुछ भूल जाए ,तभी दिख गए मनोहर सरोज सी0ओ0 रहे थे और विभाग के सबसे सज्‍जन अधिकारी माने जाते थे ,पर राजेशबा की औरत को रखे थे ,और यह कोई जोर-जबरदस्‍ती नहीं हुई थी ।पांच हजार देकर राजेश का ट्रांसफर करा दिया ,और फिर इतनी नौटंकी पेली कि राजेशबा उनकी बात में आ गया ,और परिवार को वहीं छोड़कर रायबरेली चला गया । और लोग बताते हैं कि वह बीस दिन महीना दिन पर आता और सी0ओ0 साहब परिवार की सारी आवश्‍यकता पर ध्‍यान दिए रहते .........स्‍साला जाति का भी था ,और हरदम पार्टी की भी बात करता था ।ध्‍यान स्‍साला का कहीं रहता था ,पर देखते ही अंबेडकर और फूले का नाम रटने लगता था ।

Tuesday 12 March 2013

जय पूर्वांचल की जय

गाजीपुर की जय ,बलिया की जय ,मऊ की जय ,पूरे पूर्वांचल की जय ।पूर्वांचल में दिख रहे भारत-प्रेम की जय तथा भारत ही नहीं नेपाल तक में बढ़ रहे पूर्वांचल के प्रति बढ़ रहे जिज्ञासा की जय । पूर्वांचल में फल-फूल रहे ‘डिग्री टूरिज्‍म’ की जय ।वाह रे राहुल सांस्‍कृत्‍यायन की धरती , रूस,चीन,तिब्‍बत तक घूमे विद्या की प्राप्ति के लिए ,तो अब पूरी दुनिया को डिग्री देने का संकल्‍प इसी धरती से ।और संकल्‍प भी बहुत मँहगा नहीं दस हजार से लेकर एक लाख तक के विभिन्‍न पैकेज । अपने पूर्जा से नकल ,स्‍कूल के मास्‍टर से नकल ,परिक्षार्थी के स्‍थान पर किसी और को बैठाना ,दूसरी कॉपी की व्‍यवस्‍था या फिर परीक्षा से हमारा कोई मतलब नहीं ,ये लीजिए दो लाख ,और बस हमको डिग्री दीजिए ।
और किसको सुख नहीं इस व्‍यवस्‍था से ,विद्यार्थी को डिग्री तो मिल ही रही है ,एक महीने तक वसंतवास ।मात्र तीन घंटे तक का ही कष्‍ट है कि परीक्षा हॉल में बैठिए ,फिर शाम से अनंत आनंद की स्थिति ।मास्‍टरों की भी कुछ ज्‍यादा ही पूछ है इस समय ।कुछ तो नकल बनाते हैं ,कुछ चिट पहुंचाते हैं ,और श्री झंडा पांडे जैसे मास्‍टर भी हैं ,जो हैं तो एक छोटे मोटे ठेकेदार ,पर यदि कोई बदमाश अधिकारी और पुलिसजन आते हैं तो पांडे जी उनसे तब तक लोहा लेते हैं ,जब तक कि परीक्षा कक्ष के परिक्षार्थी और छात्र सतर्क न हो जाए ।कुछ स्‍टेटिक मजिस्‍ट्रेट होते हैं ,और उनकी इतनी सेवा हो जाती है कि वे स्‍टेटिक ही बने रहते हैं ,बस प्रधानाचार्य के कक्ष में बैठना ,काजू,किशमिश खाना और अखबार पढ़ना ,इनके साथ लगे पुलिस और चपरासी की भी खूब आव-भगत ।जो मोबाईल मजिस्‍ट्रेट होते हैं ,वे भी कुछ देर के लिए आएंगे ,और बस वसूल कर मोबाईल हो जाएंगे ।शिक्षा विभाग के अधिकारी इस दौरान काफी प‍रेशां दिखेंगे ,क्‍योंकि उन्‍हें व्‍यवस्‍था बनाते हुए ये सब करबाना है ,और सबकुछ करना है ,पर सख्‍त दिखना है ।बेचारे पत्रकार भी कभी-कभी आ धमकते हैं ,पर प्रिंसिपल या कोई मास्‍टर उनका रिश्‍तेदार होता है ,या फिर पत्रकार के भी बच्‍चे उस विद्यालय से परीक्षा दे रहे होते हैं ।अब पूछिए मत साहब
समस्‍त पूर्वांचल इस समय अतिथियों से भरा है ।गांव से लेकर शहर तक ।गांव के स्‍कूल ज्‍यादा मुफीद माने जाते हैं ,क्‍योंकि मोबाईल टीम की पहुंच वहां तक कम होती है ।और फिर वसंत का समय ,बिजली पंखे ,ए0सी0 और फ्रिज की जरूरत वैसे भी कम है ,सो विद्यार्थी और उनके माता-पिता वसंत का गुण-गान कर रहे हैं निराला ,सुभद्रा कुमारी चौहान और केदार नाथ अग्रवाल से भी ज्‍यादा ।और हर तरह के मकान किराए पर है ,पक्‍का ,कच्‍चा ,फूस का ।एक कमरे में दस-दस ,बीस-बीस लोग जमा हैं ।बिना जाति ,धर्म ,प्रांत ,भाषा की पड़ताल किए मकान मालिक किराया वसूल रहे हैं ,और पूर्वांचल भारत-भूमि की विविधता में एकता को फिर से रेखांकित कर रहा है ।
शिक्षा और मनोरंजन का यह अद्वितीय मेला आपको कहीं नहीं मिलेगा ।शाम से ही खेल , फिल्‍म ,गीतगान ,बातचित,भोज-भात का लंबा दौर ,जो देर रात तक चलना है ,और भोजपुरी क्षेत्र में पंजाबी ,बंगाली ,नेपाली व्‍यंजनों की महक फैल जाएगी ।महीने भर की परीक्षा के दौरान कम ही माता-पिता साथ रहते हैं ,और फिर बच्‍चे प्रति‍बंधित सुखों की ओर भी कदम बढ़ाते हैं ।इतना एकांत ,इतना अपरिचय ,इतनी भीड़भाड़ ,इतने खेत जो उन्‍होंने केवल फिल्‍मों में ही देखे हैं......सच सच बताइए किसको दुख है इस व्‍यवस्‍था से ।
दुकानों के माल बिक रहे हैं ,फोटो स्‍टेट वाला बिजी है ,पेट्रोल पंप वाला बिजी है ।डी0एम0 से लेकर एक होमगार्ड तक सब व्‍यवस्‍था बनाने के लिए चाक-चौबंद ।ज्‍यादा नंबर आएंगे ,स्‍कूल का नाम रौशन होगा ,बोर्ड का नाम ,प्रदेश का नाम रौशन होगा ,बच्‍चे अगले क्‍लास में जाएंगे ,उन्‍हें लैपटॉप मिलेगा ,बीस हजार रूपए मिलेंगे ,बच्चियों की शादी हो जाएगी ,परिवार ,समाज ,राष्‍ट्र सब के शिक्षा में बढ़ोत्‍तरी ।सही में कौन नाराज है यहां !!

Thursday 14 February 2013

निराला और वसंत

'  खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम' वसंत और कहां जीर्ण निराला , परंतु हिंदी में वसंत के स्‍मरण के साथ ही निराला का भी चेहरा सामने आता है ।वैसे वसंत पर लिखने वाले बहुत हैं ,परंतु वसंत से गंभीर साम्‍य बैठाने वाले निराला ही हैं ।निराला ने खुद भी वसंत की बहुत ही दृश्‍य-छवियों को सामने लाया है

रंग गयी पग-पग धन्‍य धरा,-
हुई जग जगमग मनोहरा ।

और कभी हुलसकर छायावाद के अन्‍य कवियों के साथ सुर मिलाते हैं

सखि ,वसन्‍त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्‍कर्ष छाया ।

एक जगह वे स्‍वयं ही वसंत की अपूर्णता ,स्थिरता से परेशान हैं ,और 'स्थिर मधु ऋतु कानन' के बाद आवाहन करते हैं

गरजो ,हे मन्‍द्र ,वज्र-स्‍वर
थर्राये   भूधर-भूधर
झरझर-झरझर धारा झर
पल्‍लव-पल्‍लव पर जीवन ।


परंतु उनकी आशाएं अभी भी वसंत से ही है । वसंत की उपस्थिति उनके दुख ,अपमान को कम करती है

अभी न होगा मेरा अन्‍त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्‍त-
अभी न होगा मेरा अन्‍त ।

हिंदी के मठों -गढों को यह कहने को विवश होते हैं निराला

'मैं ही वसन्‍त का अग्रदूत'
और हिंदी समाज ने दशकों बाद जाना कि हिंदी साहित्‍य में जो नए गंध ,नए रस ,नए पल्‍लव हैं ,उसका श्रोत कहां है  ?

निराला के लिए सबसे सही समय'निशा वासंती' है ,और अपने सर्वाधिक प्रिय के लिए भी वे 'मेरे वसंत की प्रथम गीति ' कहते हैं ।ऋतुओं में वसंत ही उनके काव्‍यकर्म को सर्वाधिक उद्बुद्ध करती है ।





Sunday 10 February 2013

रवींद्र वर्मा की कविताएं



शावेज़ की चौथी चुनाव-विजय पर


शावेज ,‍मुबारक हो
तुमसे ज्‍़यादा
वेनेजुएला को
वेनेजुएला से ज्‍़यादा
लातिन अमेरिका को
लातिन अमेरिका से ज्‍़यादा
धरती को जो
घायल
कराह रही है

अपने चारो ओर गोल गोल
घूमती धरती घायल
थकी-सी लगती है
जैसे अमेरिका अचानक
बहुत भारी हो गया हो
उलार गाड़ी की तरह
उलार गाड़ी कब तक
उलार चलेगी


2 अमृत जयंती

यह अमृत जयंती की बात है:
मैंने अ को फोन किया-
उसने बताया कि उसका उपन्‍यास
कालजयी है ।
ब  ने कहा कि उसने
हिंदी कविता को वह दिया है जो
उसके पास नहीं था ।
स आलोचक था -उसने
सनातन फैसले दे दिए थे ।
सब अमर मरेंगे ।


मजा तब आया जब
मैंने पाया कि मैं भी
महान हूं ।फर्क
यही था कि मुझे यह भीतरी
फरेब पता था ।इसीलिए
मुझमें पेड़ की पत्‍ती की तरह
गिरने की उम्‍मीद
बाकी थी ।
(मासिक 'समकालीन सरोकार' जनवरी 2013 में)






(साभार 'समकालीन सरोकार' ,रवींद्र 
वर्मा 






























Friday 25 January 2013

मोती बी0 ए0 और दिनकर

भाई अनिल कुमार त्रिपाठी ने हिन्‍दी और भोजपुरी के प्रसिद्ध कवि-गीतकार मोती बी0ए0 पर विस्‍तार से बताया ।अनिल मानते हैं कि हिंदी फिल्‍मों से लगाव और उन संस्‍कारों को ज्‍यादा महत्‍व देने से कवि की रचनात्‍मकता और उनकी स्‍वीकृति प्रभावित हुई ।बाद में बरहज जैसे छोटे कस्‍बे में आने से उनके जीवन और संघर्ष से वह ताप खतम हो गया ,जो उनके गाने में देखे सुने गए ।


एक बार मोती बी0ए0 ने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियों को आधार बनाते हुए एक कविता लिखी

हटा पंथ के मेघ व्‍योम में स्‍वर्ग लूटने वाले
अकुलाए बच्‍चों के हित में दूध छीनने वाले
कहां गए वो कवि दिनकर राष्‍ट्रीय कहाने वाले
सरकारी ओहदे पाकर गद्दारी करने वाले


अनिल बताते हैं कि यह कविता उन्‍होंने दिनकर के भागलपुर विश्‍वविद्यालय के कुलपति के पद स्‍वीकारने के बाद लिखी थी ।परंतु अनिल जी के पिता जी (श्री वीरेंद्र त्रिपाठी) के आग्रह पर उन्‍होंने दिनकर का नाम हटाकर महान शब्‍द जोड़ दिया ।





 

Wednesday 16 January 2013

प्रभात मिलिंद की कविताएं

मुम्‍बई 2008 :कुछ दृश्‍यांश (श्री रा0 ठा0 के लिए सादर)


1

जिस शहर के बारे में कभी इल्‍म था उनको
कि जहां हर किसी के लिए गुजर-बसर है
कि जो कोई एक बार आया यहां ,फिर लौट कर वापस नहीं गया कभी
कि जहां जिंदगी का एक नाम बेफिक्री और आजादी है
कि जहां प्रेम करना दुनिया में सबसे निरापद है
कि जहां आधी रात को भी सड़कों पर बेखौफ भटकता है जीवन
         
                         कितनी हैरत की बात है
                         एक रोज उसी शहर से मार भगाया गया उनको
                           और वह भी एकदम दिनदहाड़े


2
वे कीड़ों-मकोड़ें की तरह सर्वत्र उपस्थ्‍िात थे
मुंबई से लेकर डिब्रूगढ़ तक ......और दिल्‍ली से कोलकाता तक
इसके बावजूद वे कीड़ों-मकोड़ों की तरह अनुपयोगी और संक्रामक नहीं थे

                         सिर्फ दो वक्‍त की रोटी की गरज में
                        हजारों मील पीछे छोड़ आए थे वे अपनी जमीन और स्‍मृतियां
                        वे माणूस भी नहीं थे ,बस दो अदद हाथ थे
                       जो हमेशा से ही शहर और जिंदगी के हाशिये पर रहे
                      लेकिन उनकी ही बदौलत टिका रहा शहर अपनी धुरी पर
                     और उसमें दौड़ती रही जिंदगी बखूबी

खेतों की मिट्टी में उसके पसीने का नमकीन स्‍वाद था
कारखाने और इमारतों की नींव में उनके रक्‍त की गंध

                     दरअसल वे जन्‍मे ही थे इस्‍तेमाल के लिए
                      और इसीलिए मुंबई से लेकर डिब्रूगढ़ तक
                     और दिल्‍ली से कोलकाता तक सर्वत्र उपस्थित रहे

लेकिन अंतत: वे कीड़े-मकोड़ों की तरह ही घृणित और अवांछित माने गए
और मारे भी गए कीड़े-मकोड़ों की ही तरह

3

वे इस दुनिया में नए वक्‍त के सबसे पुराने खानाबदोश हैं.....
उनके कंधे और माथे पर जो गठरियां और टिन के बक्‍से हैं
दरअसल वही हैं उनका घर-संसार
लिहाजा चाह कर भी आप उनको बेघर या शहरबदर नहीं कर सकते


                      आप उनको एक दिन पृथ्‍वी के कगार से धकेल कर
                     इतिहास के अंतहीन शून्‍य में गिरा देने की जिद में है
                    लेकिन यह फकत आपकी दिमागी खब्‍त है
                   इससे पहले कि आप इस कवायद से थक कर जरा सुस्‍ता सकें,
                  वे इसी इतिहास की सूक्ष्‍म जड़ों के सहारे
                  पृथ्‍वी के पिछले छोर से अचानक दोबारा प्रकट हो जाएंगे


वे इस दुनिया के नए वक्‍त के सबसे पुराने खानाबदोश हैं.......
(प्रभात मिलिंद)
मो0 09435725739


(साभार 'शुक्रवार ,साहित्‍य वार्षिकी 2013)









































Tuesday 15 January 2013



गणमान्‍य तुम्‍हारी........

वह बीस वर्षों से 'दीप प्रज्‍जवलन' की दुनिया में है
और इस दरमियान वह करीब बीस हजार बार दीप प्रज्‍ज्‍वलित कर चुका है
इस एकरसता में एक सरसता अनुभव करता हुआ
वह सुरक्षा कारणों से अब तक टमाटरों ,अंडों ,जूतों ,पत्‍थरों ,थप्‍पड़ों
और गोलियों से तो दूर हैं लेकिन गालियों से नहीं

एक सघन हाशिये से लगातार सुनाई दे रही गालियों के बरअक्‍स
यह है कि दीप पर दीप जलाता जा रहा है
इस 'उत्‍सवरक्षतमदग्रस्‍त' वक्‍त में
इतनी संस्‍कृतियां हैं इतनी समितियां हैं इतनी बदतमीजियां हैं
कि उसे बुलाती ही रहती हैं अवसरानवसर दीप प्रज्‍ज्‍वलन के लिए
और वह भी है कि सब आग्रहों को आश्‍वस्‍त करता हुआ
प्रकट होता ही रहता है
एक प्रदीर्घ और अक्षत तम में ज्‍योतिर्मय बन उतरता हुआ


लेकिन तम है कि कम नहीं होता
और शालें हैं कि इतनी इकट्ठा हो जाती हैं
कि गर करोलबाग का एक व्‍यवसायी 'टच' में न हो
तब वह गोल्‍फ लिंक वाली कोठी देखते-देखते गोडाउन में बदल जाए
गाहे-ब-गाहे उसे बेहद जोर से लगता है
कि वे शालें ही लौट-लौटकर आ रही हैं
जो पहले भी कई बार उसके कंधों पर डाली जा चुकी है

(अविनाश मिश्र)

साभार 'शुक्रवार' साहित्‍य वार्षिकी 2013



Saturday 12 January 2013

लक्ष्‍मी नारायण मिश्र

नाटककार लक्ष्‍मी नारायण मिश्र (1903 -1987)

मिश्र जी की 110 वीं जयंती पर 11 जनवरी 2013 को उनके गृहजनपद मऊ में एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित हुआ ,जिसमें कोई भी प्रसिद्ध साहित्‍यकार शामिल नहीं हुआ ।देश के दूसरे भागों में भी किसी महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम के समाचार से हम अवगत नहीं हैं ।उनके अवदान पर एक महत्‍वपूर्ण लेख डॉ0 बच्‍चन सिंह का :-

 लक्ष्‍मी नारायण मिश्र   डी0 एल0 राय और प्रसाद की स्‍वच्‍छन्‍दतावादिता का विरोध करते हुए नाटक के क्षेत्र में आये ।प्रसाद तथा अन्‍य रोमैंटिक साहित्‍यकारों ने बुद्धिवाद का विरोध किया था तो मिश्र जी ने अपने को स्‍पष्‍ट कहते हुए कहा कि मैं बुद्धिवादी क्‍यों हूं  ? ' इस काल में लिखे प्राय: सभी नाटकों में रोमैंटिक प्रेम के विरोध में भारतीय विवाह संस्‍कारों का समर्थन किया गया है ।इस समस्‍या से संबद्ध नाटक हैं -संन्‍यासी ,राक्षस का मंदिर ,मुक्ति का रहस्‍य ,राजयोग ,सिन्‍दूर की होली और आधी रात ।

                      बुद्धिवाद का दावा करने के बावजूद मिश्र जी शॉ और इब्‍सन के अर्थ में बुद्धिवादी नहीं है ।शॉ रूढि़ विध्‍वंसक नाटककार हैं ।उनकी प्रसिद्धि इसलिए हुई कि उसने जनता को नैतिकता पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्‍य किया किन्‍तु रोमैंटिक प्रेम का विरोध करने पर भी मिश्र जी नैतिता के संबंध में पुनर्विचार करने के लिए बाध्‍य नहीं करते ।बल्कि वे रूढि़यों के समर्थन पर उतर आते हैं ।


           इब्‍सन ने एक स्‍थान पर कहा है कि यदि तुम विवाह करना चाहते हो तो प्रेम में मत पड़ो और यदि प्रेम करते हो तो प्रिय से अलग हो जाओ ।मिश्र जी के 'संन्‍यासी' नाटक की मालती कहती है   -' और फिर विश्‍वकान्‍त प्रेम करने की चीज है ...विवाह करने की नहीं ।प्रेम किसी दिन की ......किसी महीने की ,किसी साल की घड़ी भर के लिए ,जो चाहे जितना दु:ख-सुख दे .....उसमें जितनी बेचैनी हो ....जितनी मस्‍ती हो ....लेकिन वह ठहरता नहीं ।' एक दूसरे स्‍थान पर रोमैंटिक प्रेम की व्‍याख्‍या करती हुई वह पुन: कहती है -‍'जिसे प्रेम करे उसके सामने झुक जाना -बिल्‍कुल मर जाना-उसकी एक-एक बात पर अपने को न्‍योछावर कर देना रोमैंटिक प्रेम होता है ।हम लोग प्रेम नहीं करेंगे ।'  'राक्षस का मंदिर ' की ललिता का स्‍वर भी उससे भिन्‍न नहीं है ।'मुक्ति का रहस्‍य' की आशादेवी अंत में रोमांसविरोधी रूख अपनाती है ।'सिन्‍दूर की होली' की मनोरमा आद्यान्‍त रोमांस-विरोधी बनी रहती है ।


                      'सिन्‍दूर की होली' के दो पात्र मनोरमा और चन्‍द्रकान्‍ता एक-दूसरे के विरोधी हैं ।मनोरमा वैधव्‍य का समर्थन करती है और चन्‍द्रकान्‍ता रोमैंटिक प्रेम का ।मनोरमा का विधवा-विवाह का विरोध स्‍वयं बुद्धिवाद का विरोध करने लगता है और रोमैंटिक चन्‍द्रकान्‍ता का तर्क बुद्धिवाद हो जाता है ।


रोमैंटिक भावुकता और यथार्थवादी बुद्धिवाद की टकराहट मिश्र जी के नाटकों में इस ढ़ंग से चित्रित हुई है कि मिश्र जी भावुकता से मुक्‍त नहीं हो पाते ।प्राय: सभी पात्रों में भावुकता लिपटी हुई है ।मिश्र जी के व्‍यक्तित्‍व में ये दोनों तत्‍व पाये जाते हैं ।वे भीतर से भावुक और बाहर से बुद्धिवादी हैं ।भारतीयता के प्रति उनकी आस्‍था में भी विचित्र भावुकता का सन्निवेश हो गया है ।


               बुद्धिवादी रूख अपनाने के कारण मिश्रजी की भाषा प्रसाद की भाषा से भिन्‍न है ।उसमें तर्क करने की अद्भुत क्षमता है ।  'मुक्ति का रहस्‍य' में उन्‍होंने लिखा है -'शेक्‍सपियर के नाटकों के साथा जब प्रसाद के नाटक रखे जायेंगे त‍ब स्‍वगत का वही अतिरंजना ,वही संवादों की काव्‍यमयी कृत्रिमता ,मनोविज्ञान या लोकवृत्ति के अनुभव का वही अभाव ,संघर्ष और द्वंद्व की वही आंधी ......'कहना न होगा कि मिश्रजी ने उनसे बचने का प्रयास किया है ।संवादों में स्‍फूर्ति ,लघुता और तीव्रता का विशेष ध्‍यान रखा गया है ।वाग्‍वैदग्‍ध्‍य ,हाजिरजबाबी ,तर्कपूर्ण उत्‍तर-प्रत्‍युत्‍तर आदि समस्‍या नाटकों की विशेषताएं हैं ।इसमें संदेह नहीं कि अपनी त्रुटियों के बावजूद मिश्र जी ने हिन्‍दी नाटकों को रूमानियत से बाहर निकालने का प्रयास किया है ।



                              समस्‍या नाटकों के अतिरिक्‍त मिश्र जी ने कई ऐतिहासिक नाटकों की रचना भी की है ।गरूड़ध्‍वज ,नारद की वीणा ,वत्‍सराज ,दशाश्‍वमेघ ,वितस्‍ता की लहरें ,जगद्गुरू ,मृत्‍युंजय ,सरजू की धार आदि ऐतिहासिक नाटक हैं ।


(डॉ0 बच्‍चन सिंह 'आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य का इतिहास' में )

साभार 'लोक भारती प्रकाशन'

Thursday 10 January 2013

इब्‍ने इंशा

इब्‍ने इंशा की कविताओं में निहित प्रभावों को रेखांकित करना कठिन है ,परंतु उनकी जीवन यात्रा से ही कुछ मजबूत रेखाएं स्‍पष्‍ट होती है । जून की पंद्रहवीं ,साल 1927 ईसवी को लुधियाना में जनम और 1949 में कराची और पाकिस्‍तान का वासी बनने की विवशता , यद्यपि जल्‍दी ही लोगों को पता चल गया कि उन्‍होंने जमीनी विभाजन को स्‍वीकारा नहीं था ।विभाजन की वास्‍तविकता और पीड़ा पर न लिखते हुए उन्‍होंने आदमी की पीड़ा पर लिखा ।लंबे समय तक लंदन में रहे ,ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया ।पाकिस्‍तान सरकार और यूनेस्‍को के द्वारा प्रदत्‍त कई सांस्‍कृतिक पदों को स्‍वीकारा ।विद्वानों ने उनके लहजे में मीर की खस्‍तगी और नजीर की फकीरी देखी है ।मनुष्‍य की स्‍वाधीनता और स्‍वाभिमान को सर्वोपरि मानते हुए आजीवन मानवतावादी वृत्तियों के प्रति संकल्पित रहे ।  11 जनवरी 1978 को लंदन में कैंसर से मृत्‍यु ।



                                                          इब्‍ने जी की रचनाएं सुखद आश्‍चर्य से भर देती है कि इस पाकिस्‍तानी साहित्‍यकार में हिंदुस्‍तानी जीवन ,शब्‍दावली और हिंदुस्‍तानी रंग के इतने इन्‍द्रधनुष कैसे हैं । इनकी गजलों में  जोगी ,सजन ,जोत ,मनोहर ,प्रेम ,बिरह ,रूप-सरूप ,सखि ,सांझ ,अंबर ,बरखा ,गोपी ,गोकुल ,मथुरा ,मनमोहन ,जगत ,भगवान संन्‍यास जैसे शब्‍दों का प्रयोग यह बतलाने के लिए पर्याप्‍त है कि उनके रचनात्‍मक संस्‍कार कैसे थे । अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह ने इस संबंध में कहा है कि 'उर्दू शाइरी की केंद्रीय अभिरूचि से यह काव्‍यबोध विलग है ।यह उनका निजी तख़य्युल है और इसीलिए उनकी शाइरी जुते हुए खेत की मानिंद दीख पड़ती है ।'


शायरी करते हुए भी इंशा जी शास्‍त्रीय संकीर्णता की परवाह नहीं करते ।इसीलिए अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह कहते हैं कि ' भाषा की रूपगत संकीर्णता से ऊपर उठकर शाइरी करनेवालों का एक वर्ग पाकिस्‍तान के उर्दू साहित्‍य में अपना अलग स्‍थान रखता है ,जिसमें नासिर काजि़मी ,अहमद फ़राज ,उमील-उद्दीन आली ,परवीन शाकिर आदि के नाम उल्‍लेखनीय है ।यह वर्ग इब्‍ने इंशा का वर्ग है......'


इब्‍ने इंशा ने हरेक दिन को ईद जैसा मनाया ,इसीलिए उनकी कविताओं में रंग-रंग के चांद मौजूद हैं ।उनकी पुण्‍यतिथि   11 जनवरी  पर उनकी कुछ गजलें :-



गोरी अब तू आप समझ ले ,हम साजन या दुश्‍मन हैं
गोरी तू है जिस्‍म हमारा ,हम तेरा पैराहन हैं

नगरी-नगरी घूम रहे हैं ,सखियों अच्‍छा मौका है
रूप-सरूप की भिक्षा दे दो ,हम इक फैला दामन है

तेरे चाकर होकर पाया दर्द बहुत रूस्‍वाई भी
तुझसे थे जो टके कमाए ,आज तुझी को अरपन है

लोगों मैले तन-मन-धन की ,हम को सख्‍त मनाही है
लोगों हम इस छूत से भागें ,हम तो खरे बरहमन हैं

पूछो खेल बनानेवाले ,पूछो खेलनेवाले से
हम क्‍या जानें किसकी बाजी ,हम जो पत्‍ते बावन है


सहरा से जो फूल चुने थे उनसे रूह मुअत्‍तर है
अब जो ख़ार समेटा चाहें ,बस्‍ती -बस्‍ती गुलशन है


दो-दो बूंद को अपनी खेती तरसी है और तरसेगी
कहने को तो दोस्‍त हमारे भादों हैं और सावन है



2

कुछ कहने का वक्‍़त नहीं ये कुछ न कहो ,खामोश रहो
ऐ लोगों खामोश रहो हां ऐ लोगों खामोश रहो

सच अच्‍छा पर उसके जलू में , जहर का है इक प्‍याला भी
पागल हो  ? क्‍यों नाहक को सुक़रात बनो ,खामोश रहो

हक़ अच्‍छा पर उसके लिए कोई और मरे तो और अच्‍छा
तुम भी कोई मंसूर हो जो सूली पर चढ़ो ,खामोश रहो


उनका ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है
सर आंखों पर ,सूरज ही को घूमने दो -खामोश रहो

महबस में कुछ हब्‍स है और जंजीर का आहन चुभता है
फिर सोचो ,हां फिर सोचो ,हां फिर सोचो ,ख़ामोश रहो

गर्म आंसू और ठंडी आहें ,मन में क्‍या क्‍या मौसम है
इस बगिया के भेद न खोलो ,सैर करो ,खामोश रहो

आंखे मूंद किनारे बैठो ,मन के रक्‍खो बंद किवाड़
इंशा जी लो धागा लो और लव सी लो ,खामोश रहो

(साभार राजकमल प्रकाशन)