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Monday 10 December 2012

केदारनाथ सिंह का काव्‍य-संसार

गांव और शहर
 यह कहना काफी नहीं कि केदारनाथ सिंह की काव्‍य-संवेदना का दायरा गांव से शहर तक परिव्‍याप्‍त है या यह कि वे एक साथ गांव के भी कवि हैं तथा शहर के भी । दरअसल केदारनाथ पहले गांव से शहर आते हैं फिर शहर से गांव ,और इस यात्रा के क्रम में गांव के चिह्न शहर में और शहर के चिह्न गांव में ले जाते हैं ।इस आवाजाही के चिह्नों को पहचानना कठिन नहीं हैं ,परंतु प्रारंभिक यात्राओं के सनेस बहुत कुछ नए दुल्‍हन को मिले भेंट की तरह है ,जो उसके बक्‍से में रख दिए गए हैं । परवर्ती यात्राओं के सनेस में यात्री की अभिरूचि स्‍पष्‍ट दिखती है ,इसीलिए 1955 में लिखी गई ‘अनागत’ कविता की बौद्धिकता धीरे-धीरे तिरोहित होती है ,और यह परिवर्तन जितना केदारनाथ सिंह के लिए अच्‍छा रहा ,उतना ही हिंदी साहित्‍य के लिए भी ।


बहुत कुछ नागार्जुन की ही तरह केदारनाथ के कविता की भूमि भी गांव की है ।दोआब के गांव-जवार,नदी-ताल,पगडंडी-मेड़ से बतियाते हुए केदारनाथ न अज्ञेय की तरह बौद्धिक होते हैं न प्रगतिवादियों की तरह भावुक ।केदारनाथ सिंह बीच का या बाद का बना रास्‍ता तय करते हैं ।यह विवेक कवि शहर से लेता है ,परंतु अपने अनुभव की शर्त पर नहीं ,बिल्‍कुल चौकस होकर ।



गंगा तट का यह कवि

छायावाद के बाद संभवत: पहली बार नदियों की इतनी छवियां एकसाथ दिखती है ।1979 में बिहार-उत्‍तरप्रदेश की सीमा पर मांझी गांव में घाघरा नदी पर स्थित पुल पर एक कविता लिखी गई है ।कवि ,उसकी दादी ,चौकीदार ,बंशी मल्‍लाह,लाल मोहर ,जगदीश ,रतन हज्‍जाम और बस्‍ती के लोग ही नहीं झपसी की भेड़ें भी पुल के जनम ,उसके विस्‍तार ,ईंट और बालू पर चर्चा करते हैं । फिर इसके बाद- मछलियां अपनी भाषा में

क्‍या कहती हैं पुल को ?

सूंस और घडि़याल क्‍या सोचते हैं
 कछुओं को कैसा लगता है पुल?

जब वे दोपहर बाद की रेती पर
अपनी पीठ फैलाकर
उसकी मेहराबें सेंकते हैं?
 मैं जानता हूं मेरी बस्‍ती के लोगों के लिए
 यह कितना बड़ा आश्‍वासन है
 कि वहां पूरब के आसमान में
 हर आदमी के बचपन के बहुत पहले से
 चुपचाप टॅंगा है मांझी का पुल

(मांझी का पुल )





उसी प्रकार कवि गंगा को एक लंबे सफर के बाद तब देखता है जब उसे साहस और ताजगी की बेहद जरूरत होती है ।कवि के लिए नदी कोई बाहरी चीज नहीं बिल्‍कुल घरेलू सामान जैसा है : सचाई यह है
 कि तुम कहीं भी रहो
तुम्‍हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
 प्‍यार करती है एक नदी
 नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
 पर होगी जरूर कहीं न कहीं
 किसी चटाई

या फूलदान के नीचे चुपचाप बहती हुई (नदी)

धर्म या अध्‍यात्‍म के किसी भी तत्‍व पर बल दिए बिना केदारनाथ सिंह की कविता में नदी अपने पूरे सामाजिक –जीवमंडल के साथ मौजूद है
 कीचड़ सिवार और जलकुम्भियों से भरी
 वह इसी तरह बह रही है पिछले कई सौ सालों से
 एक नाम की तलाश में
 मेरे गांव की नदी (बिना नाम की नदी)

प्रतिरोध का नया रूप

केदारनाथ सिंह की नदियां ,पहाड़ ,पौधे स्‍वाभाविक तेज से दीप्‍त हैं और कवि ‘पहाड़’ कविता में पहाड़ को सुस्‍ताते ,गहरे ताल में उतरते देखता है :
अन्‍त में
 खड़े-खड़े
विराट आकाश के जड़ वक्षस्‍थल पर
 वे रख देते हैं अपना सिर
 और देर तक सोते हैं
क्‍या आप विश्‍वास करेंगे
 नींद में पहाड़
रात-भर रोते हैं ।

केदारनाथ सिंह की कविता में नदी ,पहाड़ ,नीम ही नहीं गधा और कौआ भी अपनी बात कह लेते हैं ।पर किसी प्रकार का बड़बोलापन यहां नहीं दिखती ।
 जिरह के बीचोबीच एक गधा खड़ा था
खड़ा था और भींग रहा था
पानी उसकी पीठ और गर्दन की
तलाशी ले रहा था
 उसके पास छाता नहीं था
 सिर्फ जबड़े थे जो पूरी ताकत के साथ
 वारिस और सारी दुनिया के खिलाफ
बन्‍द कर लिये गये थे
 यह सामना करने का
 एक ठोस और कारगर तरीका था
 जो मुझे अच्‍छा लगा
 (वारिस)

 इसी प्रकार ‘भरी दोपहरी में बोलता रहा कौआ’ अपनी आवाज से जितना चिढ़ाता है ,चुप रहकर भी उतना ही परेशान करता है ।



व्‍यंग्‍य का नया रूप

 रूलाने वाला व्‍यंग्‍य कम कवियों के पास है ।केदारनाथ सिंह के व्‍यंग्‍य व्‍यवस्‍था या नियति पर चित्‍कार करते हैं

पानी में घिरे हुए लोग
 प्रार्थना नहीं करते

वे पूरे विश्‍वास के साथ देखते हैं पानी को
 .............
मगर पानी में घिरे हुए लोग
 शिकायत नहीं करते
वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में
 कहीं न कहीं बचा रखते हैं
थोड़ी-सी आग

(पानी में घिरे हुए लोग)


लोककथाओं की शैली

केदारनाथ सिंह लोककथाओं का उपयोग करते हुए अपनी कविता को बढ़ाते हैं ।प्राय: पौधों ,जानवरों ,पहाड़ों या नदियों से बात करते हुए ,परंतु वे 'असाध्‍य वीणा' जैसा लंबा रूपक नहीं रचते हैं ।लोककथाओं का भी केवल बतियाने वाला तत्‍व ही उनके दिमाग में आता है ,वे किसी पुराने लोककथा का प्रयोग करने से बचते हैं ,परंतु उनका प्रयोग इतना लोकधर्मी है कि ये कविता किसी पुराने लोककथा की तरह सामाजिक-मनोविज्ञान के अनगिन स्‍नायुओं को स्‍पर्श करते हैं ।


अपने समय की रचनात्‍मकता पर नजर

कोई लेखक कई तरह से अपने समय की रचनात्‍मकता में हस्‍तक्षेप करता है ,केवल लिखकर ,केवल काटकर ,लिखकर और काटकर .............. और केदारनाथ सिंह लिखते हैं भी और काटते हैं ।आलोचनात्‍मक लेख लिखकर ही नहीं कविता में भी वे कई बार काट-खूट करते रहते हैं
दो लोग तुम्‍हारी भाषा में ले आते हैं
कितने शहरों की धूल और उच्‍चारण
क्‍या तुम जानते हो

(दो लोग)

एक साइकिल धूप में खड़ी थी
जो साइकिल से ज्‍यादा एक चुनौती थी
मेरे फेफड़ों के लिए
और मेरी भाषा के पूरे वाक्‍य-विन्‍यास के लिए

(दुश्‍मन)


और भाषा जो मैं बोलना चाहता हूं
मेरी जिह्वा पर नहीं
बल्कि दांतों के बीच की जगहों में
सटी है

(फर्क नहीं पड़ता)

हमारा हर शब्‍द
किसी नये ग्रहलोक में
एक जन्‍मान्‍तर है


यह जन्‍मांतर उनकी हर कविता में दिखता है ,और अपनी बात को अनूठी तरह से रखने वाला यह कवि हमारे समय का बहुत बड़ा कवि है ।विषय ,भाषा और शैली का नवोन्‍मेष उसे बेजोड़ बनाता है ,इस दृष्टि से उनमें और उनकी कविता में नवीनता का अत्‍यंत ही सजग एहसास है ,परंतु नई कविता की घोषणाओं से बहुत कुछ अलग ।

जीवन का अबाध स्‍वीकार

केदारनाथ सिंह की कविताओं में जीवन की स्‍वीकृति है ,परंतु तमाम तरलताओं के साथ यह आस्तिक कविता नहीं है ।

मैं जानता हूं बाहर होना एक ऐसा रास्‍ता है
जो अच्‍छा होने की ओर खुलता है
और मैं देख रहा हूं इस खिड़की के बाहर
एक समूचा शहर है
(बीमारी के बाद)

और केदारनाथ सिंह की इस बेहतर दुनिया में ईश्‍वर नहीं हैं ।यह बैंकों ,ट्रेनों,वायुयानों की दुनिया है ,जहां ईश्‍वर के पास करने के लिए कुछ भी नहीं है


यह कितना अद्भुत है
कि दस बजे हैं
और दुनिया का काम चल ही रहा है
बिना ईश्‍वर के भी
बसें उसी तरह भरी हैं
उसी तरह हड़बड़ी में हैं लोग
डाकिया उसी तरह चला जा रहा है
थैला लटकाये हुए
(बिना ईश्‍वर के भी)

और केदारनाथ सिंह की कविता में कोई ईश्‍वर है भी तो माचिस और लकड़ी  के साथ ही

मेरे ईश्‍वर
क्‍या मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते
कि इस ठंड से अकड़े हुए शहर को बदल दो
एक जलती हुई बोरसी में
(शीतलहरी में एक बूढ़े आदमी की प्रार्थना)



2 comments:

  1. kedar ji mere priy kvi hain yah lekh unki kavitaon ke sundar vyakhya karta hai

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    1. धन्‍यवाद लीना जी

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