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Sunday 24 March 2013

कबीर की अकथ कहानी(पुरूषोत्‍तम अग्रवाल) पर वागीश शुक्‍ल :साभार 'आलोचना'

चयनित अंश:-
समीक्षाधीन पुस्‍तक की सीमाऍं वही है जो आधुनिक विमर्श की है और जब तक उस आधुनिक विमर्श की जड़ों तक नहीं जाया जाता ,उसकी विसंगतियों की कोई पड़ताल भी सतक के नीचे नहीं जा सकती ।मैं केवल एक उदाहरण दूंगा :यदि कबीर के वर्णाश्रम-विरोध की परख 'ह्यूमन राइट्स' के संदर्भ में की जा सकती है तो उनके जीवहिंसा-विरोध की पड़ताल 'एनिमल राइट्स' के सन्‍दर्भ में क्‍यों नहीं की जा सकती ?यदि इसका कोई और कारण है ,सिवाय इसके कि 'ह्यूमन राइट्स' के लिए कानून बन चुके हैं और 'एनिमल राइट्स' के लिए अभी कानून नहीं बने ,तो वह समझना मेरे लिए सम्‍भव नहीं हुआ ।किन्‍तु कल वे बन भी सकते हैं ।तब ?

प्रारंभिक में कहा गया है कि कबीर यह चेतावनी दे रहे हैं :मेरे ब्रह्मविचार को तुम गीत मत समझ बैठना-'तुम जिन जानौ यह गीत है ,यह तो निज ब्रह्मविचार रे ।' गीत और ब्रह्मविचार में अन्‍तर की यह चेतावनी केवल कबीर ने ही नहीं अश्‍वघोष ने भी दी है ,लेकिन भगवत्‍पाद या कालिदास ने नहीं दी ,और यहीं उस मानसिकता का ,जिसे मैं 'पेगन मानसिकता' कहता हूं ,और उस मानसिकता का ,जिसे मैं 'डि-पेगनाइजेशन की मानसिकता' कहता हूं किन्‍तु जिसका प्रचलित नाम 'दूसरी परम्‍परा' है ,अन्‍तर मौजूद है ।

कालै यास्‍पर्स ने जब यह कहा था कि ईसाइयत के भीतर ट्रैजेडी नहीं लिखी जा सकती और जब फ़ारसी-अरबी के काव्‍यशास्‍त्री लगातार यह घोषणा करते हैं कि इस्‍लाम के भीतर कविता सम्‍भव नहीं है तो वे इस अन्‍तर की ही ओर इशारा कर रहे हैं ।

Saturday 23 March 2013

धाकड़ मजिस्‍ट्रेट




धाकड़ मजिस्‍ट्रेट वो होता है ,जो मेला ,दंगा और परीक्षा ड्यूटियों में डेली हिसाब करता है ।उसे दिहाड़ी कहने-कहाने का भय नहीं है ,बल्कि 'लेते' वक्‍त एक आत्‍मसंतोष का भाव होता है कि 'कोई फ्री का थोड़े ही ले रहा हूं 'वह मेला में दुकान गिनकर ,दंगा में मूड़ी गिनकर और परीक्षा में एडमिट कार्ड गिनकर लेता है ।अब जैसे कि परीक्षा ड्यूटी है तो प्रति पाली प्रति विद्यार्थी मात्र दस रूपये की दर से हिसाब कर दीजिए ।अब आप सोच रहे होंगे कि इससे तो दोहजार -तीन हजार डेली ही मिल पाएगा ,और यदि अंत में लिया जाए तो लेने के कई नाम है -कोपरेशन के लिए ,नॉन आपरेशन केलिए ,होली सेलिब्रेशन के लिए या फिर सॉलिड ठकुरई कि 'भय बिनु ...' या फिर अचूक ब्राह्मणवाद कि राजा ,ब्राह्मण और देवता के यहां लोग खाली हाथ नहीं जाते हैं ,और लेनदेन के तमाम मॉडल इसी वाद में अंर्तभुक्‍त हैं ।अब आप डेली हिसाब नहीं किए और कहीं हाकिम ने ड्यूटी बदल दी ,तो ये पुराना बनिया/स्‍कूल प्रबंधक आपसे मिलेगा ? और आप कुछ ले पाऐंगे ?।इसलिए जो भी हो 'हस्‍तामलक' की तरह हो 'बाद में मिलना है ' या 'किसी दिन देख लेंगे' वालों को आप दिखा दीजिए कि आप कितने बड़े मजिस्‍ट्रेट हैं ,और नियमों ,अधिनिय और आदेशों का इतना धुर्रा उड़ाइए कि ससुर स्‍कूल सहित उड़ जाए ।ये जो पिछले दिन ड्यूटी बदली है तो स्‍कूल प्रबंधक और मजिस्‍ट्रेट बहनों की तरह रोए ,और आने वाले मजिस्‍ट्रेट के लिए ढ़ेर सारी कथाऍं ,घटनाऍं मौजूद रहे कि 'साहब कितने अच्‍छे थे ' , और 'साहब तो गाना भी गाते थे ' ।अब आपके पास दो ही विकल्‍प है या तो दिहाड़ी की तरह डेली वसूलें या फिर अच्‍छे की तरह गाना गाऍं .........

Sunday 17 March 2013

कबीर की अकथ कहानी पर :डेविड लॉरेंजन

कबीर की अकथ कहानी पर :डेविड लॉरेंजन के आलेख का एक अंश::::-------


अपनी अकथ कहानी में अग्रवाल शास्‍त्रोक्‍त भक्ति और काव्‍योक्‍त भक्ति का जो नया वर्गीकरण प्रस्‍तुत करते हैं ,वह सामाजिक और धार्मिक प्रतिमानों को कलात्‍मक कसौटी के साथ जोड़ने का प्रयास प्रतीत होता है ।दूसरे शब्‍दों में ,अग्रवाल कवियों की धार्मिक और सामाजिक विचारधारात्‍मक भिन्‍नताओं के साथ ही काव्‍यात्‍मक भिन्‍नताओं पर भी बल देना चाहते हैं ।लेकिन यह बात हर जगह साफ नहीं हो पाती कि अग्रवाल तुलसीदास और सूरदास को किस वर्ग में रखना चाहते हैं ।एक स्‍थान पर वे केवल कबीर और निर्गुणी कवियों को ही नहीं ,बल्कि बस ,आदिकालीन और केशव जैसे रीतिकालीन कवियों को ही बाहर रखते हुए नामदेव ,मीरां ,तुलसीदास और सूरदास को भी काव्‍योक्‍त-भक्ति के अंतर्गत रखते प्रतीत होते हैं (पृ0 343) ।लेकिन कुछ ही पृष्‍ठों के बाद ,लगता है कि अग्रवाल तुलसीदास और सूरदास को काव्‍योक्‍त-भक्ति से बाहर मानते हैं (पृ 350) ।यह रेखांकित करते हुए कि कबीर अपनी भक्ति को स्‍पष्‍ट शब्‍दों में भगति नारदी कहते हैं ,पुरूषोत्‍तम अग्रवाल काव्‍योक्‍त-शास्‍त्रोक्‍त वर्गीकरण के लिए प्रयुक्‍त धार्मिक विशिष्‍टताओं को क्रमश: नारद-भक्ति-सूत्र और शांडिल्‍य-भक्ति-सूत्र की वैचारिक विशिष्‍टताओं से विश्‍वसनीय रूप से जोड़ते हैं ।उनके द्वारा काव्‍योक्‍त कही गई भक्ति ,प्रेम प्रेरित ,उपलब्‍ध दार्शनिक संप्रदायों से स्‍वायत्‍त ,भागीदारी पर आधारित संवेदना है ,जबकि शास्‍त्रोक्‍त-भक्ति से अग्रवाल का आशय पारंपरिक संस्‍कृत शास्‍त्रों पर निर्भर और पारंपरिक धार्मिक सत्‍ता के समक्ष समर्पण की संवेदना से है ।

इन तीन वर्गीकरणों : सगुण-निर्गुण ,वर्ण-धर्मी और अवर्णधर्मी और शास्‍त्रोक्‍त-भक्ति और काव्‍योक्‍त-भक्ति के बीच की भ्रांतियों और उलट-पुलट से बचने का एक सीधा -सा तरीका यह स्‍वीकार कर लेना हो सकता है कि उत्‍तर भारत के भक्‍त कवियों की रचनाओं में धार्मिक,सामाजिक विचारधारात्‍मक और कलात्‍मक अंतर सदा साथ-साथ ही उपस्थित हों ,यह जरूरी नहीं ।दूसरे शब्‍दों में ,संभवत: यह बेहतर होगा कि इनमें सभी कवियों को समानांतर श्रेणियों में रखने पर जोर न दिया जाए ।इस पद्धति से,कबीरकी कविता को निर्गुणी ,अवर्ण-धर्मी और काव्‍योक्‍त वर्ग में रखा जा सकता है ।इसी तरह, तुलसीदास के काव्‍य को ,या कम से कम कुछ भजनों को ,सगुणी ,अवर्ण-धर्मी और काव्‍योक्‍त वर्ग में रखा जा सकता है ।


जिसे पुरूषोत्‍तम अग्रवाल भारत की आरंभिक आधुनिकता का दौर कहते हैं ,उस दौर में ,यानी मोटे तौर पर सन् 1400 से 1650 ई0 के बीच ,उत्‍तर भारत में विकसित हुई भक्ति-संवेदना की आंतरिक भिन्‍नताओं की रोचक तुलना यूरोपीय इतिहास के 1650 से 1790 के बीच के दौर अर्थात् तथाकथित यूरोपीय नवजागरण के दौर की एक विशेषता से की जा सकती है ।कुछ ही दिन पहले ,जोनाथन इस्राइल ने एक बहुत मजबूत तर्क प्रस्‍तुत किया है कि यूरोप में स्‍पष्‍ट रूप से दो नवजागरण हुए थे :स्पिनोजा ,डेनिस दिदरो ,डि हालबाक और थॉमस पेन जैसे बौद्धिकों के साथ जुड़ा रेडिकल नवजागरण ,और जॉन लाक ,वाल्‍त्‍ेयर ,इमैनुअल कांट और एडमंड बर्क जैसे बौद्धिकों के साथ जुड़ा कंजरवेटिव नवजागरण ।अधिक रेडिकल दिदरो और हालबाक के साथ वाल्‍तेयर की तुलना करते हुए ,इनके बीच वैषम्‍य का रेखांकन करने के लिए इस्राइल लिन शब्‍दों का प्रयोग करते हैं ,उनका उपयोग तुलसीदास और कबीर की तुलना करने के लिए भी ,बिना किसी ज्‍यादा फेरबदल के लिए किया जा सकता है


(आलोचना त्रैमासिक 46 वें अंक से साभार : मूल अंग्रेजी आलेख का अंग्रेजी से अनुवाद सुधांशुभूषण नाथ  तिवारी)



17 मार्च जिंदाबाद

इस शहर ने आज पहली बार औरतों का जुलूस देखा ।वैसे तो औरतों की क्रमबद्ध पंक्तियां विष्‍णु यज्ञ या फिर साईं बाबा के जुलूस में निकलती रही है ,जिसे शोभा यात्रा या और भी सुरूचिपूर्ण नाम दिया जाता रहा है ,पर औरतों का जुलूस देखकर शहर को अच्‍छा नहीं लगा था ।शहर तो लड़कियों को डांस करते देख या फिर बिना बुर्का या घूंघट में औरतों को देख चिढ़ जाता था पर ये तो अति थी ।औरतें जुलूस में नाच रही थी ,और औरतों के जागने की बात कर रही थी ,उन्‍होंने आधी आबादी ,भ्रूण परीक्षण ,लड़कियों के शिक्षा ,महिलाओं के अधिकार जैसे विषय पर मनमोहक नारे बनाए थे ,और शहर की शांति भंग करते हुए 'आवाज दो हम एक हैं ' की नारा लगा रही थी ।मेरे एक मित्र ने उनके साड़ी ,ब्‍लाउज की कीमत लगाते हुए कहा कि वे निम्‍न -मध्‍य वर्ग की महिलाएं थी ,कुछ तो स्‍पष्‍टत: निम्‍न वर्ग की लग रही थी ,जो केवल चिल्‍लाने के लिए किराए पर लाई गई थी ।एक मित्र ने उनके चप्‍पलों पर गौर फरमाया ,निष्‍कर्ष यही था कि ये आम तौर पर निम्‍न वर्ग की महिलाएं है ,तथा जुलूस स्‍वत:स्‍फूर्त न होकर प्रायोजित है ।सड़क किनारे की दुकानों पर तथाकथित उच्‍च वर्ग की महिलाएं शांतिपूर्ण आनंद के साथ खरीदारी करती रही ,कॉलेज की छात्राऍं भी मुंह बिचकाते हुए अपने अपने कामों में मगन रही ।कुछ पुलिसकर्मियों के साथ जुलूस आगे बढ़ती रही ,भ्रूण हत्‍या विरोधी नारे गूंजती रही ,पर शायद डॉक्‍टर लोग जुलूस की आवाज को नजरअंदाज करते हुए गर्भपात कराने में बिजी रहे ।जुलूस का आनंद तो शायद तब आता जब ये महिलाऍं हँसिये ,खुरपी से उन डॉक्‍टरों की अँतडि़या बाहर निकाल लेते ,जो बस पुत्रजन्‍म को मैनेज करने के लिए अल्‍ट्रासाउंड और एबार्शन करबाते हैं..............

Saturday 16 March 2013

डस्‍टबिन

कोई लिखा ,अधलिखा ,कलम से लिखा ,पेंसिल से लिखा ,अपना लिखा ,किसी अधिकारी का आदेश ,अधीनस्‍थों की आख्‍या ,हाईकोर्ट का जजमेंट ,सरकार की रूलिंग ,सहकर्मियों के लूपहोल्‍स के साक्ष्‍य सभी संग्रहित ।फाईल मे ,बिना फाईल किसी डायरी मे ,किसी किताब में ,जो ज्‍यादा पुरानी हो गई तो अटैची में ,जो बहुत पुरानी हो गई तो स्‍टोर रूम में ,और साल दो साल बाद एक दो बंडल गांव में रख दिए ,बाबूजी-मां के पास ।पता नहीं कब किसकी जरूरत हो जाए ,सो किसी कागज को फाड़ते ,कबाड़ी वाले से बेचते ,डस्‍टबिन मे डालते या फिर रद्दी को फेकते वक्‍त हरदम एक डर बना रहा ।एक बार तो पत्‍नी ने डस्‍टबिन में शाम को ही कूड़ा डाल दिया था ,‍पर सुबह को वह एक-एक रद्दी को जोड़ता रहा ।उसकी इस आदत को पत्‍नी भी जान गई थी ,सो हरेक कागज(चाहे कितना भी रद्दी क्‍यों न हो)
को डस्‍टबिन में डालते वक्‍त वह भी पूछ लेती थी 'किसी काम का तो नहीं' ,और यह चिंता ,परेशानी केवल कागजों को लेकर हो ,यह बात नहीं थी ,संबंधों को लेकर भी थी ।घर,परिवार ,किसिम किसिम के दोस्‍त ,दूर-दराज के संबंधी सब कागजों की ही तरह उसके जेहन में ठूसे हुए थे ।बेशक कुछ फेके जाने लायक थे ,पर उसको लगता था कि शायद कुछ काम हो जाए इनका या फिर.............

Friday 15 March 2013

'आलोचना' : अकथ कहानी प्रेम की

'आलोचना' का यह अंक श्री पुरूषोत्‍तम अग्रवाल की पुस्‍तक 'अकथ कहानी प्रेम की ' के बहाने पुन: कबीर के घर में पैठने का प्रयत्‍न है ।हालांकि शीश काटकर भूमि पर रखके अन्‍दर घर में जाने का साहस कोई बिरला ही कर पाता है ।

                                                                    इस पुस्‍तक ने कबीर को ,कवि कबीर को ,और उनके समय-समाज को फिर से और नए सिरे से गुनने समझने के लिए प्रेरित किया है ।वास्‍तव में हम जिस कबीर को जानते हैं वह संत महात्‍मा या पंथ-मठ-सम्‍प्रदाय वाले कबीर नहीं बल्कि कवि कबीर ही हैं ।भारतीय जीवन में अनेक संत-महात्‍मा हुए होंगे ,जैसे अनेक दार्शनिक और ऋषि भी ,लेकिन लोक और साहित्‍य-समाज ने उन्‍हीं को कंठस्‍थ किया जो मुख्‍यत: कवि हैं ,कबीर-सूर-तुलसी-मीरां या ललदद,बसवण्‍णा,तुकाराम और शाह लतीफ ।यह घटना दर्शन और काव्‍य के आन्‍तरिक सम्‍बन्‍ध को भी प्रकाशित करती है ।


                                                          रवीन्‍द्रनाथ भी कवि और कबीर को ही जानते थे ,रहस्‍यवाद आनुषंगिक था और काव्‍य में ही अनुस्‍यूत ।हरिऔध भी उसी काव्‍य से आकृष्‍ट हुए ।प्रेमचन्‍द की कहानी 'कफन' ,'ठगिनी क्‍यों नैना झमकावै' के बगैर अपूर्ण होती ।नागार्जुन ने कबीर के जन्‍मदिन ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा को अपना जन्‍मदिन माना । त्रिलोचन ,मुक्तिबोध ,भीष्‍म साहनी ,रघुवंश सबने कवि कबीर पर लिखा ।तीन दशक पहले भृगुनन्‍दन त्रिपाठी ने जो कविता पत्रिका निकाली असका नाम रखा 'कबीर' ।और ,कबीर की छह सौवीं जयन्‍ती पर सन् 2000 में भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान ,शिमला में कबीर की कविता पर केंद्रित एक संगोष्‍ठी हुई जिसमें गोपेश्‍वर सिंह और मैंने भी लेख पढ़े जो  'कबीर के मस्‍तक पर मोरपंख 'शीष्‍र्ज्ञक से और फिर 'कवि कबीर' शीर्षक से उसी वर्ष ''सम्‍भव' (सं0 सुभाष शर्मा) और अन्‍य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ ।उसी समय नामवर सिंह का एक अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण लेख कबीर की कविता पर 'हंस' में प्रकाशित हुआ था ।लघु पत्रिकाओं ने ,विशेषकर प्रगतिशील धारा की पत्रिकाओं ने ,कबीर पर लगातार सामग्री दी जिसमें आज से पच्‍चीस-तीस साल पहले 'वसुधा' द्वारा जारी एक पुस्तिका  अभी भी याद है 'कबीर और तत्‍कालीन कृषक समाज' ।यह सब कहने -दुहराने की जरूरत इसलिए है कि हम भूलें नहीं कि लोक जीवन तथा कंठ परम्‍परा के साथ-साथ हिन्‍दी साहित्‍य समाज में कबीर की कविता पर लगातार बात होती रही है और यह पुस्‍तक उसी चर्चा-परम्‍परा को समृद्ध करती है ।

                                                           साथ ही साथ यह पुस्‍तक अनेक दूसरे सवालों ,पक्षों पर भी बात करती है  । 'औपनिवेशिक आधुनिकता' बनाम 'देशज आधुनिकता' ऐसा ही एक महत्‍वपूर्ण सवाल है ।हालांकि 'औपनिवेशिक आधुनिकता' स्‍वयं में विरोधाभासी पद है - ऐसी कोई आधुनिकता सम्‍भव ही नहीं जो उपनिवेश की समर्थक या उससे संयुक्‍त हो ।यदि ऐसा होता है तो उसे आधुनिकता का विपर्यय ही कहा जाएगा ।गांधी जी ने 'हिन्‍द स्‍वराज' में यूरोप की आधुनिकता के इसी विपर्यय पर चोट की थी ।इसी सन्‍दर्भ में नेहरू जी ने भी पूछा था : कौन -सा इंग्‍लैंड भारत आया -व्‍यापारियों का या शेक्‍सपीयर-मिल्‍टन का ?  बाकी तो हर समाज की अपनी आधुनिकता होगी या हो सकती है (स्‍वयं जर्मनी ,इटली ,इंग्‍लैंड  या अमेरिका की आधुनिकता एक ही तो नहीं कही जा सकती )जिसमें कुछ तत्‍व जैसे स्‍वतंत्रता ,समानता और बन्‍धुता सर्वनिष्‍ठ भी होंगे ।


                               'धर्मेतर अध्‍यात्‍म' भी इसी तरह का पद है ।पुरूषोत्‍तम अग्रवाल ने इस सन्‍दर्भ में मार्क्‍स की अति चर्चित (लगभग विस्‍मृत नहीं ) 'आर्थिक एवं दार्शनिक पांडुलिपियां 1844 'में व्‍यवहृत स्पिरिचुअलिज्‍म पद का भी उल्‍लेख किया है जो वास्‍तव में चेतना या आत्‍म-तत्‍व को इंगित करता है ,एक नास्तिक की आत्मिकता को (क्‍योंकि मार्क्‍स के आरम्भिक लेख ही नास्तिकता के पक्ष में थे )किसी धर्मगंधी अध्‍यात्‍म को नहीं
।क्‍या धर्महीन या धर्मेतर आध्‍यात्मिकता सम्‍भव है ?(कबीर नास्तिक नहीं थे ) आध्‍यात्मिकता बिना किसी इतर की उपस्थिति की कल्‍पना के सम्‍भव नहीं ।एक ऐसा इतर जो हमसे भिन्‍न ,सुदूर और बृहत्‍तर हो ।व्‍यक्ति की आत्‍मा के सर्वोच्‍च (ब्रह्म की ) आत्‍मा से संयोग अथवा संयोग की आकांक्षा को व्‍यक्‍त करने के लिए प्राय: इस पद का प्रयोग होता आया है ।इसलिए इस पद के साथ धर्म का एक पूरा इतिहास सटा हुआ है ।रिल्‍के ,जो 'आध्‍यात्मिक' भी कहे जाते हैं ,का सबसे प्रिय उपन्‍यास था -डेनिश लेखक याकोब्‍सन का छोटा-सा उपन्‍यास 'नील्‍स लाइम' ।लेकिन 'नील्‍स लाइम' एक नास्तिक की कृति है -मनुष्‍य के इस ब्रह्मांड में निष्‍कवच संघर्ष की गाथा ,'न तो मनुष्‍य का कोई घर इस पृथ्‍वी पर है ,न कोई आसरा कहीं और ' ,'हर आत्‍मा अकेली है ......कोई किसी से कभी न पूरा मिल पाती है न पूरा विलीन .......' ।क्‍या इस भाव को 'धर्मेतर अध्‍यात्‍म' कहा जाना चाहिए  ? नए भाव-रसों को पुराने पद उसी तरह बदल देते हैं जैसे कांसे का बर्तन ताजा दही को ।

श्री पुरूषोत्‍तम अग्रवाल की इस पुस्‍तक पर देश और विदेश के अनेक महत्‍वपूर्ण विद्वानों के निबन्‍ध एवं टिप्‍पणियां यहां एकत्र हैं जो पुस्‍तक के महत्‍व की सूचक तो हैं ही ,कबीर की निरन्‍तर उपस्थिति का भी प्रमाण है ।यह अंक वास्‍तव में एक परिसंवाद है जो आगे भी और अंक के बाहर भी जारी रहेगा ।


मुझ सरीखे मूरतों के लिए कबीर साहेब पहले ही फरमा गए हैं -

अकथ कहानी प्रेम की ,कछू कही ना जाय ।
गूंगे के री सर्करा ,खाए अउ मुसकाय ।
                           -अरूण कमल



(साभार 'आलोचना'त्रैमासिक सहस्राब्‍दी अंक छियालिस)



























रवीन्‍द्रनाथ कवि

Thursday 14 March 2013

(जहां हम रहते हैं)

तभी बरहमदेव के अंदर वाले बरहमदेव ने टोका ‘ ये क्‍या बरहमदेव ,अपना पुराना दिन भूल गये क्‍या ,भूल गए जब साहेब के सामने कुर्सी पर बैठने की क्‍या सजा मिली ,भूल गए उन साहेबों को जिन्‍हें सलाम करते-करते हाथ ,बाजू ,बांह दर्द करते थे ,वे भी जो हाथ से नमस्‍कार करना नहीं पसंद करते थे ,या तो साष्‍टांग या फिर पैर छूकर ‘ भूल गए उन साहेबों को जो कभी भी परिवार को साथ लेके नहीं रहे ,परिवार ईलाहाबाद ,लखनऊ खुद किसी पिछड़े ईलाके में नौकरी करते रहे ,जहां भी रहे भोजन-साजन और रात-बितावन के लिए नया नया परिवार बनाते रहे ,और ये परिवार ये तो गरीब काश्‍तकार के बहू-बेटी थे या फिर निचले स्‍टाफ की पत्नियां ‘

और बरहमदेव चाहते थे कि सबकुछ भूल जाए ,तभी दिख गए मनोहर सरोज सी0ओ0 रहे थे और विभाग के सबसे सज्‍जन अधिकारी माने जाते थे ,पर राजेशबा की औरत को रखे थे ,और यह कोई जोर-जबरदस्‍ती नहीं हुई थी ।पांच हजार देकर राजेश का ट्रांसफर करा दिया ,और फिर इतनी नौटंकी पेली कि राजेशबा उनकी बात में आ गया ,और परिवार को वहीं छोड़कर रायबरेली चला गया । और लोग बताते हैं कि वह बीस दिन महीना दिन पर आता और सी0ओ0 साहब परिवार की सारी आवश्‍यकता पर ध्‍यान दिए रहते .........स्‍साला जाति का भी था ,और हरदम पार्टी की भी बात करता था ।ध्‍यान स्‍साला का कहीं रहता था ,पर देखते ही अंबेडकर और फूले का नाम रटने लगता था ।

Tuesday 12 March 2013

जय पूर्वांचल की जय

गाजीपुर की जय ,बलिया की जय ,मऊ की जय ,पूरे पूर्वांचल की जय ।पूर्वांचल में दिख रहे भारत-प्रेम की जय तथा भारत ही नहीं नेपाल तक में बढ़ रहे पूर्वांचल के प्रति बढ़ रहे जिज्ञासा की जय । पूर्वांचल में फल-फूल रहे ‘डिग्री टूरिज्‍म’ की जय ।वाह रे राहुल सांस्‍कृत्‍यायन की धरती , रूस,चीन,तिब्‍बत तक घूमे विद्या की प्राप्ति के लिए ,तो अब पूरी दुनिया को डिग्री देने का संकल्‍प इसी धरती से ।और संकल्‍प भी बहुत मँहगा नहीं दस हजार से लेकर एक लाख तक के विभिन्‍न पैकेज । अपने पूर्जा से नकल ,स्‍कूल के मास्‍टर से नकल ,परिक्षार्थी के स्‍थान पर किसी और को बैठाना ,दूसरी कॉपी की व्‍यवस्‍था या फिर परीक्षा से हमारा कोई मतलब नहीं ,ये लीजिए दो लाख ,और बस हमको डिग्री दीजिए ।
और किसको सुख नहीं इस व्‍यवस्‍था से ,विद्यार्थी को डिग्री तो मिल ही रही है ,एक महीने तक वसंतवास ।मात्र तीन घंटे तक का ही कष्‍ट है कि परीक्षा हॉल में बैठिए ,फिर शाम से अनंत आनंद की स्थिति ।मास्‍टरों की भी कुछ ज्‍यादा ही पूछ है इस समय ।कुछ तो नकल बनाते हैं ,कुछ चिट पहुंचाते हैं ,और श्री झंडा पांडे जैसे मास्‍टर भी हैं ,जो हैं तो एक छोटे मोटे ठेकेदार ,पर यदि कोई बदमाश अधिकारी और पुलिसजन आते हैं तो पांडे जी उनसे तब तक लोहा लेते हैं ,जब तक कि परीक्षा कक्ष के परिक्षार्थी और छात्र सतर्क न हो जाए ।कुछ स्‍टेटिक मजिस्‍ट्रेट होते हैं ,और उनकी इतनी सेवा हो जाती है कि वे स्‍टेटिक ही बने रहते हैं ,बस प्रधानाचार्य के कक्ष में बैठना ,काजू,किशमिश खाना और अखबार पढ़ना ,इनके साथ लगे पुलिस और चपरासी की भी खूब आव-भगत ।जो मोबाईल मजिस्‍ट्रेट होते हैं ,वे भी कुछ देर के लिए आएंगे ,और बस वसूल कर मोबाईल हो जाएंगे ।शिक्षा विभाग के अधिकारी इस दौरान काफी प‍रेशां दिखेंगे ,क्‍योंकि उन्‍हें व्‍यवस्‍था बनाते हुए ये सब करबाना है ,और सबकुछ करना है ,पर सख्‍त दिखना है ।बेचारे पत्रकार भी कभी-कभी आ धमकते हैं ,पर प्रिंसिपल या कोई मास्‍टर उनका रिश्‍तेदार होता है ,या फिर पत्रकार के भी बच्‍चे उस विद्यालय से परीक्षा दे रहे होते हैं ।अब पूछिए मत साहब
समस्‍त पूर्वांचल इस समय अतिथियों से भरा है ।गांव से लेकर शहर तक ।गांव के स्‍कूल ज्‍यादा मुफीद माने जाते हैं ,क्‍योंकि मोबाईल टीम की पहुंच वहां तक कम होती है ।और फिर वसंत का समय ,बिजली पंखे ,ए0सी0 और फ्रिज की जरूरत वैसे भी कम है ,सो विद्यार्थी और उनके माता-पिता वसंत का गुण-गान कर रहे हैं निराला ,सुभद्रा कुमारी चौहान और केदार नाथ अग्रवाल से भी ज्‍यादा ।और हर तरह के मकान किराए पर है ,पक्‍का ,कच्‍चा ,फूस का ।एक कमरे में दस-दस ,बीस-बीस लोग जमा हैं ।बिना जाति ,धर्म ,प्रांत ,भाषा की पड़ताल किए मकान मालिक किराया वसूल रहे हैं ,और पूर्वांचल भारत-भूमि की विविधता में एकता को फिर से रेखांकित कर रहा है ।
शिक्षा और मनोरंजन का यह अद्वितीय मेला आपको कहीं नहीं मिलेगा ।शाम से ही खेल , फिल्‍म ,गीतगान ,बातचित,भोज-भात का लंबा दौर ,जो देर रात तक चलना है ,और भोजपुरी क्षेत्र में पंजाबी ,बंगाली ,नेपाली व्‍यंजनों की महक फैल जाएगी ।महीने भर की परीक्षा के दौरान कम ही माता-पिता साथ रहते हैं ,और फिर बच्‍चे प्रति‍बंधित सुखों की ओर भी कदम बढ़ाते हैं ।इतना एकांत ,इतना अपरिचय ,इतनी भीड़भाड़ ,इतने खेत जो उन्‍होंने केवल फिल्‍मों में ही देखे हैं......सच सच बताइए किसको दुख है इस व्‍यवस्‍था से ।
दुकानों के माल बिक रहे हैं ,फोटो स्‍टेट वाला बिजी है ,पेट्रोल पंप वाला बिजी है ।डी0एम0 से लेकर एक होमगार्ड तक सब व्‍यवस्‍था बनाने के लिए चाक-चौबंद ।ज्‍यादा नंबर आएंगे ,स्‍कूल का नाम रौशन होगा ,बोर्ड का नाम ,प्रदेश का नाम रौशन होगा ,बच्‍चे अगले क्‍लास में जाएंगे ,उन्‍हें लैपटॉप मिलेगा ,बीस हजार रूपए मिलेंगे ,बच्चियों की शादी हो जाएगी ,परिवार ,समाज ,राष्‍ट्र सब के शिक्षा में बढ़ोत्‍तरी ।सही में कौन नाराज है यहां !!