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Tuesday 27 December 2011

उदयनाचार्य मिथिला पुस्‍तकालय और सूरज प्रकाश



फेसबुक से बाहर इनको मैं कम जानता हँ ,तथा इनके लिए तो मैं लगभग अज्ञात ही हूं ।घर में लंबे समय से एकत्र पुस्‍तकों को दान दिए जाने संबंधी लेख पढ़कर मैंने इनसे संपर्क किया ,और इनके माध्‍यम से मेरे गांव के पुस्‍तकालय 'उदयनाचार्य मिथिला पुस्‍तकालय'के लिए दो सौ से ज्‍यादा पुस्‍तकें आ रही है ।ये हैं सूरज प्रकाश जी ,फेसबुक प्रोफाईल के हिसाब से देहरादून के हैं ,तथा पुणे में रहते हैं ,इन्‍होंने करियन गांव का तो नाम भी नहीं सुना है ,हो सकता है समस्‍तीपुर का सुना हो ।वैसे करियन समस्‍तीपुर के उन पुराने गांवों में है ,जिनका संदर्भ इतिहास ,पुराण और दर्शन में है ।'नव्‍यन्‍याय' के प्रतिष्‍ठापक आचार्य उदयनाचार्य का गांव ।'न्‍याय कुसुमांजलि' ,'किरणावलि'प्रभृत कई युगांतरकारी दर्शन की पुस्‍तकों के लेखक । संस्‍कृत विद्यालय के उधार के भवन में चल रहा पुस्‍तकालय ।कुछ लोगों के लिए पुस्‍तकालय ,कुछ के लिए अजायबघर ।दो तीन साल की सीमित सफलता ।वैसे कुछ लोगों के प्रयास के बावजूद राजनीति का अड्डा नहीं बना है ।कुछ लोगों को पुस्‍तकालय की स्‍थापना में राजनीतिक एवं सामाजिक निहितार्थ दिखते हैं ।कुछ लोग ये भी मानते हैं कि सारे बच्‍चे तो गांव के बाहर ही पढ़ते हैं ।अत: गांव में पुस्‍तकालय की कोई जरूरत नहीं है ।इन बातों के बावजूद यह छोटा सा पुस्‍तकालय मौजूद है ,तथा गांव के लोग जिस गति से पुस्‍तकालय पर हँसते है ,पुस्‍तकालय उससे तीव्र गति से गांव पर हँसता है ।
इस पुस्‍तकालय की जिंदगी में एक अच्‍छी खबर है ।सूरज प्रकाश जी दो सौ से ज्‍यादा पुस्‍तक भेज रहे हैं ।उन्‍होंने जब अपनी च्‍वाईश पूछी थी ,तो मैंने संक्षेप में अपनी जरूरत बता दी


आदरनीय सूरज प्रकाश जी
नमस्‍कार
आपकी सदाशयता ने हमें इतना
ढ़ीठ बना दिया कि हम मॉंगे भी और चुनाव भी करें ।मैंने अपने गांव के
पुस्‍तकालय के लिए किताबों की बात की थी ।यह गांव उत्‍तरी भारत के उस
क्षेत्र में है ,जहॉ हिन्‍दी और मैथिली बोली जाती है ,तथा शिक्षा का
माध्‍यम पहले संस्‍कृत था ,अब हिंदी हो गया है ।यहॉ मैं केवल हिंदी
साहित्‍य के किताबों की चर्चा कर रहा हूं ।मेरे पुस्‍तकालय में प्रेमचंद
की किताबें हैं ।प्रेमचंद के समकालीनों में प्रसाद का उपन्‍यास कंकाल और
तितली नहीं है ।उग्र की किताबें नहीं है ।निराला का भी उपन्‍यास कुल्‍ली
भाट नहीं है ।प्रेमचंद के बाद यशपाल का केवल झूठासच और दिव्‍या है ,अत:
उनकी शेष किताबें उपयोगी रहेगी ।राहुल सांस्‍कृत्‍यायन का दिवा स्‍वप्‍न
,रांगेय राघव का उपन्‍यास भैरव प्रसाद गुप्‍त का गंगा मैया ,राजेन्‍द्र
यादव का सारा आकाश पुस्‍तकालय में नहीं है ।अज्ञेय का शेखर एक जीवनी फट
चुका है ।नागार्जुन का बलचनमा एवं वरूण के बेटे है । रेणु का मैला आंचल
है ।अत: इन दोनों का शेष किताब भी उपयोगी रहेगा ।हजारी प्रसाद द्विवेदी
का मात्र एक उपन्‍यास 'वाणभट्ट की आत्‍मकथा' एवं कबीर पर आलोचना है
।द्विवेदी जी के अन्‍य उपन्‍यास मेरे पास नहीं है ।नागर जी एवं भगवती चरण
वर्मा का भी कोई उपन्‍यास पुस्‍तकालय में नहीं है ।कमलेश्‍वर का 'कितने
पाकिस्‍तान' भी पुस्‍तकालय में नहीं है ।
नाटक ,कहानी संग्रह ,कविता संग्रह भी हमारे पुस्‍तकालय के लिए उपयोगी
रहेगा ।इसके अलावा यूरोप का अनूदित साहित्‍य ,संस्‍कृत साहित्‍य भी हो तो
अति उत्‍तम ।
इतिहास की
किताबों में विपिन चन्‍द्र , राम शरण शर्मा ,रजनी पाम दत्‍त ,सत्‍या राय
,सतीश चन्‍द्र की किताबों के अतिरिक्‍त अन्‍य किताबें भी उपयोगी रहेगी ।
आपका
रवि भूषण पाठक
09208490261

रवि भूषण पाठक
द्वारा अजय सिंह एडवोकेट
258/एफ ,बुनाई विद्यालय के पीछे
मउनाथ भंजन ,जनपद मउनाथभंजन(उत्‍तर प्रदेश)
पिन 275101



सूरज प्रकाश जी की सदाशयता से हम सब चकित हैं ।शायद ज्ञान पहले की तुलना में कुछ ज्‍यादा ही प्रकाश के गुणों को धारण कर रही है ।विसरण ,परावर्तन ,विवर्तण ,प्रकीर्णन जैसे तमाम गुण ज्ञान में पहली बार दिखा है ।किताब मिलते ही मैं गांव के लिए रवाना हो जाउंगा ।लाल कपड़े में सजे किताबों के लिए कुछ लोग गांव में प्रतीक्षा कर रहे होंगे ।उदयनाचार्य के गांव में पंडित और चमार एक ही टाट पर बैठ साहित्‍य का आनंद लेंगे ।इस दृश्‍य को शायद आप नहीं देखेंगे ,पर किताबों की यह यात्रा वाकई मजेदार है ।वातानुकूलित कक्ष से गंवई मचान की यात्रा ,परंतु सूरज प्रकाश जी ,मैं आपको आश्‍वस्‍त करता हूं कि आपके किताबों को यहॉं भी अच्‍छे मित्र मिलेंगे ।

Sunday 18 December 2011

देश के विद्यालय ,देश के बच्‍चे


यह कोई खास कार्यक्रम नहीं था ।उत्‍तर भारत के कस्‍बों में निजी विद्यालय अपना वार्षिक कार्यक्रम लगभग एक ही रस्‍मों के साथ मनाते हैं ।सी0 रामचंद्र से लेकर ए आर रहमान तक के लोकप्रिय गीतों की धमक में कार्यक्रम की कमियॉ प्राय: छिप जाती है ।वैसे भी अपने बच्‍चे थे ,और अपना कार्यक्रम था ।अत: हम लोगों ने हाथ दुखने तक ताली पीटने का रस्‍म पूरा किया ।उत्‍तर प्रदेश में सरकारी विद्यालयों में प्राय: मुख्‍य अतिथि के रूप में मंत्री और बड़े अधिकारी को सम्मिलित कर लिया जाता है ,और बिना मौसम एवं समय की परवाह किये बच्‍चों से काम लिया जाता है ।आज के कार्यक्रम का सबसे खूबसूरत पहलू यही था कि कार्यक्रम की मुख्‍य अतिथि लोक सेवी डाक्‍टर जूड को बनाया गया ,और विद्यालय प्रबंधन को इस कार्य के लिए मूल्‍यवान धन्‍यवाद प्राप्‍त होना चाहिए ।इस विद्यालय की दूसरी महत्‍वपूर्ण बात प्रधानाचार्य के रूप में एक मुस्लिम महिला का चयन है ,और शहर के सांप्रदायिक मिजाज़ के बावजूद विद्यालय से उनका जुड़ना और प्रबंधन के द्वारा उनको महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेवारी सौंपा जाना आश्‍वस्‍त करता है ।
हम लोग लगभग समय से ही कार्यक्रम में पहुंच गए थे ,परंतु सारे सीट पहले से ही भरे हुए थे और हमने कस्‍बोचित चालाकी दिखाते हुए शहर के मुख्‍य नाले के उपर ही अपनी कुर्सी रख दी ,ठंडा ज्‍यादा था ,अत: नाले के नीचे के 'सकल पदारथ' ने ज्‍यादा डिस्‍टर्ब नहीं किया ,और सीट के लिए मशक्‍कत करने की बात दिमाग में ही नहीं आई ।शायद आमंत्रित लोगों की संख्‍या का अनुमान नहीं लगाया गया था ,परंतु हम लोग नन्‍हे जानों की कलाकारी देखने के लिए इतना सहने को तैयार थे ।
पहला या दूसरा गीत 'शुभम स्‍वागतम'था ,और बच्‍चों के लय एवं वादकों के ताल में पूरी खींचतान चलती रही ,जब लय एवं ताल एक होने लगे तब तक यह गीत समाप्‍त ही हो गया । विशाल भारद्वाज के गाने ' सबसे बड़े लड़ैया 'पर बच्‍चों ने अच्‍छा परफार्म किया ,परंतु एक बच्‍चे के तलवार से पीछे का परदा गिर गया ।'जिंगल बेल ' के मंचन के समय एक छोटे से बच्‍चे का पाजामा खुल गया ,और एक अनचाही हंसी फैल गई । सबसे बुरी बात यह हुई कि भोजपुरी के इस ह्रदय जनपद में कोई भी प्रस्‍तुति भोजपुरी में नहीं थी ।कार्यक्रम के दौरान कभी कभार कॉफी और पानी बॉटने वाला भी दिखा ,पर शायद यह लंठों के लिए था ।
कार्यक्रम पूरी तरह से वयस्‍कों के लिए बन गया था ,क्‍योंकि लगभग सारे बच्‍चे कलाकार बन गए थे ,और परिजन कलाकारों के मुखौटे ,भड़कीले परिधान ,नकली दाढि़यों के पीछे अपने प्रिय को खोज रहे थे ,किसी को मंच पर कोई दिखा ,किसी को नहीं ।ज्‍यादा बच्‍च्‍ेा अपना स्‍टेप भूल गए थे ।चकबन्‍दी अधिकारी सुधीर राय की बेटी ईसा(वर्तिका) सामने बैठे अपनी मॉं को ही देखे जा रही थी ,मेरे मित्र अरविंद सिंह के बच्‍चे शुभ(उम्र 6 साल)ने अपनी डांस पार्टनर को खास हिदायत देते हुए कहा कि यदि वह नृत्‍य के समय उसका उंगली जोड़ से पकड़ेगी ,तो उसकी ख़ैर नहीं ।मेरा बेटा भी एक बूढ़े के रोल में था ।ऐसा लगता था कि रोल घुसाया गया हो ,क्‍योंकि दो बूढ़े पहले से ही थे ,तथा एक्‍ट में मेरे विचार से केवल एक बूढ़े की ही जरूरत थी ।
कार्यक्रम प्रारंभ होने के एक दिन पहले मेरी पत्‍नी विद्यालय में मौसम के ठ़डा होने और बच्‍चों के लिए इस कार्यक्रम में कपड़ों के संबंध में बात करने गई ,तो इनको आश्‍वस्‍त किया गया कि आपसे ज्‍यादा हमें बच्‍चों को लेकर चिंता है 'आप निश्चिंत रहिए ,कमरा हीटर एवं ब्‍लोअर से गर्म रहेगा '।परंतु कार्यक्रम के बाद जब मेरी पत्‍नी बच्‍चों को लेने गई ,तो पॉच डिग्री सेल्सियस तापमान वाले शहर में वह एक गंजी व कुर्ता पहने कमरे में रो रहा था ।यदि उस रोने की ही एक्टिंग मंच पर करायी जाती ,तो मेरा बच्‍चा ज्‍यादा सफल होता । न ही वह लंच खाया था ,ना ही बॉक्‍स अपने पास रखा था ,विद्यालय की शिक्षिका ने बच्‍चे को ड्रेस पहनाने का प्रयास किया और मेरा बच्‍चा रोनी सूरत बनाए अपनी मॉ के साथ लौट रहा था ।उसने साबित कर दिया कि उसकी भी प्रतिभा पिता की ही तरह महान और घरेलू ही है ।बाहरीपन उसे सूट नहीं करता ।
भव्‍य कार्यक्रम के अवश्‍यंभावी नुक्‍तों बिंदियों की तरह इसे भूलने का प्रयास कर रहा हूं ,हिंदुस्‍तान में ए0 आर0 रहमान ऐसे ही पैदा होते हैं ।वैसे रात में कुमार संभवम (उम्र 6 साल)ने बताया कि भावेश से उसकी मिट्ठी हो गई है ।

Friday 16 December 2011

बिजनौर शहर :साहित्‍य ,भूगोल एवं इतिहास के बीच

बिजनौर अनेक विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है। इसने देश को नाम दिया है, अनेक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभायें दी हैं। यहां की धरती उर्वरक ही उर्वरक है। बिजनौर का उत्तरी, उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी भाग महाभारत काल तक सघन वनों से आच्छादित था। इस वन प्रांत में, अनेक ज्ञात और अज्ञात ऋषि-मुनियों के निवास एवं आश्रम हुआ करते थे। सघन वन और गंगा तट होने के कारण, यहां ऋषि-मुनियों ने घोर तप किये, इसीलिए बिजनौर की धरती देवभूमि और तपोभूमि भी कहलाती है। सघन वन तो यहां तीन दशक पूर्व तक देखने को मिले हैं। लेकिन वन माफियाओं से यह देवभूमि-तपोभूमि भी नहीं बच सकी है। प्रारंभ में इस जनपद का नाम वेन नगर था। राजा वेन के नाम पर इसका नाम वेन नगर पड़ा। बोलचाल की भाषा में आते गए परिवर्तन के कारण कुछ काल के बाद यह नाम विजनगर हुआ, और अब बिजनौर है। वेन नगर के साक्ष्य आज भी बिजनौर से दो किलोमीटर दूर, दक्षिण-पश्चिम में खेतों में और खंडहरों के रूप में मिलते हैं। तत्कालीन वेन नगर की दीवारें, मूर्तियां एवं खिलौने आज भी यहां मिलते हैं। लगता है, यह नगर थोड़ी ही दूर से गुजरती गंगा की बाढ़ में काल कल्वित हो गया। अगर यह कहा जाए कि बिजनौर को दुनिया जानती है तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। देश के किसी राज्य में या देश के बाहर बिजनौर का नाम आने पर आपसे प्रश्न किया जा सकता है कि वही बिजनौर जहां का सुल्ताना डाकू था। प्रश्नकर्ता को यह बताकर उसका अतिरिक्त ज्ञान बढ़ाया जा सकता है कि भारतवर्ष को नाम देने वाला भी बिजनौर का ही था। जी हां! हम भरत के बारे में बोल रहे हैं। सुल्ताना भी बिजनौर का ही था, यहां हम उसका जिक्र भी करेंगे। पहले संक्षेप में भरत के बारे में बता दें। भरत बिजनौर के ही थे शकुंतला और राजा दुष्यंत के पुत्र। जो बचपन में शेर के शावकों को पकड़कर उनके दांत गिनने के लिए विख्यात हुए। संस्कृत के महान कवि कालीदास के प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका शकुंतला बिजनौर की धरती पर ही पैदा हुई थीं। जिनका लालन-पोषण कण्व ऋषि ने किया था। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत एक बार इस वन प्रांत में आखेट करते हुए पहुंचे और मालिन नदी के किनारे कण्वऋषि के आश्रम के बाहर पुष्प वाटिका में सौंदर्य की प्रतीक शकुंतला से उनका प्रथम प्रणय दर्शन हुआ। इससे उनके विश्वप्रसिद्ध पुत्र भरत पैदा हुए, जिनके नाम पर आज भारत का नाम भारत वर्ष है। कहते हैं कि शकुंतला से प्रणय संबंध स्थापित करने के बाद महाराज दुष्यंत अपनी राजधानी हस्तिनापुर तो लौट गए, किंतु किसी टोटके के प्रभाव में अपनी राजधानी हस्तिनापुर में प्रवेष करते ही यह सारा घटनाक्रम भूल गए। शकुंतला से जो संतान पैदा हुई वह दुष्यंत के पुत्र भरत थे। कण्वऋषि ने भरत की एक बाह में एक ऐसा रक्षा ताबीज़ बांध दिया था जिसकी विशेषता यह थी कि उसे केवल पिता ही छू सकता है। दुष्यंत ने शकुंतला को निशानी के लिए एक अंगूठी दी थी। कहा जाता है कि महाराज दुष्यंत के लिए टोटका था कि वह बिजनौर वन प्रांत के बाहर जाकर अर्थात अपनी राजधानी की सीमा में प्रवेश करते ही शकुंतला को भूल जाएंगे और वही हुआ। यह सारा घटनाक्रम मालिन नदी के तट और उसके आसपास का माना जाता है। मालिन नदी बिजनौर में ही बहती है। कहते हैं कि शकुंतला की अंगूठी मालिन नदी में गिर गई थी जिसे एक मछली ने निगल लिया था, संयोग हुआ कि वह मछली एक मछुवारे के हाथ लगी, जिसे चीरने पर उसके पेट से वह अंगूठी निकली जो दुष्यंत ने शकुंतला को दी थी। जब वह अंगूठी राजा दुष्यंत के पास पहुंचाई गई तब उन्हें अंगूठी देखकर संपूर्ण दृष्टांत और दृश्य सामने आ गए जो वह एक टोटके के कारण भूले हुए थे। इसके बाद उन्होंने शकुंतला को अपनी पत्नी और भरत को पुत्र के रूप में स्वीकार किया। कहते हैं कि मालिन नदी के तट पर महाकवि कालीदास ने अपने प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलतम् को विस्तार दिया था। करीब दस किलोमीटर दूर गंगा के तट पर आध्यात्म और वानप्रस्थ का रमणीक स्थान है, जिसे विदुर कुटी के नाम से जाना जाता है। दुनियां के सर्वाधिक बुद्घिमानों में से एक महात्मा विदुर की यह पावन आश्रम स्थली है। महाभारत और उसके पात्रों का बिजनौर जनपद से गहरा संबंध है। इस जनपद में महाभारत काल की अनेक घटनाओं के साक्ष्य पाए जाते हैं। महाभारत के प्रमुख पात्र और सर्वाधिक बुद्धिमान महात्मा विदुर का नाम कौन नहीं जानता। देश विदेश के लोग विदुर कुटी आते हैं और इस आश्रम में वानप्रस्थी के रूप में अपना समय बिताते हैं। कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण भी विदुरजी के आश्रम में आए थे और उन्होंने अपना काफी वक्त उनके साथ बिताया। श्रीकृष्ण ने महात्मा विदुर जी के यहां बथुए का साग खाया था। इसलिए इस संबंध में कहा करते हैं कि दुर्योधन घर मेवा त्यागी, साग विदुर घर खायो। विदुर कुटी पर बारह महीने आज भी बथुवा पैदा होता है। महाभारत में वीरगति को प्राप्त बहुत सारे सैनिकों की विधवाओं को विदुरजी ने अपने आश्रम के पास बसाया था। वह जगह आज दारानगर के नाम से जानी जाती है। दारा का शाब्दिक अर्थ तो आप जानते ही होंगे-औरत-औरतें। इस संपूर्ण स्थान को लोग दारानगर गंज कहकर पुकारते हैं। यहां पर और भी कई आश्रम हैं जिनका वानप्रस्थियों और तपस्वियों से गहरा संबंध है। कार्तिक पूर्णिमा पर विदुर कुटी को स्पर्श करती हुई गंगा के तट पर मेला भी लगता है। गंगा में स्नान करने के लिए विदुर कुटी पर बड़े-बड़े घाट भी निर्मित हैं। पिछले कुछ वर्षों से गंगा ने विदुर कुटी से काफी दूर बहना शुरू कर दिया है। इसका कारण कुछ मतावलंबी धर्म आध्यात्म में गिरावट से जोड़ते हैं तो इसका दूसरा कारण भौगोलिक अवस्था में उतार-चढ़ाव और गंगा में खनिजों का अनियंत्रित दोहन माना जाता है। गंगा में खनिजों के बेतहाशा दोहन के कारण गंगा अपना परंपरागत मार्ग छोड़ती जा रही है। इसके जल क्षेत्र में घुसपैठ के कारण कृषि और आबादी वाले इलाके हर साल बाढ़ की चपेट में आते हैं। गंगा के विदुर कुटी के तटों वापस नहीं आने से यहां के घाट और उनकी जल आधारित प्राकृतिक छटा अब देखने को नहीं मिलती है। बिजनौर जनपद में चांदपुर के पास एक गांव है सैंद्वार। महाभारत काल में सैन्यद्वार इसका नाम था। यहां पर भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोण का आश्रम एवं उनका सैन्य प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था। इस केंद्र के प्रांगण में द्रोण सागर नामक एक पौण्ड भी है। यहां महाभारतकाल के अनेक स्थल एवं नगरों के भूमिगत खण्डहर मौजूद हैं। सन् 1995-96 में चांदपुर के पास राजपुर नामक गांव से गंगेरियन टाइप के नौ चपटे तांबे के कुल्हाड़े और नुकीले शस्त्र पाए गये जिससे स्पष्ट होता है कि यहां ताम्र युग की बस्तियां रही हैं। महाभारत का युद्ध, गंगा के पश्चिम में, कुरुक्षेत्र में हुआ था। हस्तिनापुर, गंगा के पश्चिम तट पर है, और इसके पूर्वी तट पर बिजनौर है। उस समय यह पूरा एक ही क्षेत्र हुआ करता था। महाभारत काल के राजा मोरध्वज का नगर, मोरध्वज, बिजनौर से करीब 40 किलोमीटर दूर है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने जब खुदाई करायी तो यहां के भवनों में ईटें ईसा से 5 शताब्दी पूर्व की प्राप्त हुईं। यहां पर बहुमूल्य मूर्तियां और धातु का मिलना आज भी जारी है। यहां के खेतों में बड़े-बड़े शिलालेख और किले के अवशेष अभी भी किसानों के हल के फलक से टकराते हैं। आसपास के लोगों ने अपने घरों में अथवा नींव में इसी किले के अवशेषों के पत्थर लगा रखे हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय को खुदाई में जो बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त हुईं वह उसी के पास हैं। यहां पर कुछ माफिया जैसे लोग बहुमूल्य वस्तुओं की तलाश में खुदाई करते रहते हैं और उन्हें धातुएं प्राप्त भी होती हैं। यहां ईसा से दूसरी एवं तीसरी शताब्दी पहले की केसीवधा और बोधिसत्व की मूर्तियां भी मिलीं हैं और ईशा से ही पूर्व, प्रथम एवं दूसरी शताब्दी काल के एक विशाल मंदिर के अवशेष भी मिले हैं। यहां बौद्ध धर्म का एक स्तूप भी कनिंघम को मिल चुका है। कहते हैं कि इस्लामिक साम्राज्यवादियों के निरंतर हमलों की श्रृंखला में यहां भारी तोड़फोड़ हुई। इन्ही इस्लामिक साम्राज्यवादियों में से एक हमलावर नजीबुद्दौला ने मोरध्वज के विशाल किले को बलपूर्वक तोड़कर अपने बसाये नगर नजीबाबाद के पास, किले की ईटों से अपना एक विशाल किला बनाया। बिजनौर जिला गजेटियर कहता है कि इसमें लगे पत्थर मोरध्वज स्थान से लाकर लगाए गए हैं। मोरध्वज के किले की खुदाई में आज भी मिल रहे बड़े पत्थरों और नजीबुद्दौला के किले में लगे पत्थरों की गुणवत्ता एकरूपता और आकार बिल्कुल एक हैं। पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए जो हुक इस्तेमाल किए गए थे, वह भी एक समान हैं। इसलिए किसी को भी यह समझने में देर नहीं लगती है कि नजीबुद्दौला ने मोरध्वज के किले को नष्ट करके उसके पत्थरों से अपने नाम पर यह किला बनवाया। सन् 1887 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इसके अधिकांश भाग को ढहा दिया। इसकी दीवारें बहुत चौड़ी हैं, जो इसके विशाल अस्तित्व की गवाह हैं। नजीबुद्दौला का जो महल था उसमें आज पुलिस थाना नजीबाबाद है। यहां पर नजीबुद्दौला के वंशजों की समाधियां भी हैं। मगर संयोग देखिएगा कि जो किला नजीबुद्दौला ने बनवाया था, आज उसे पूरी दुनिया सुल्ताना डाकू के किले के नाम से जानती है। यदि आप बिजनौर आकर यह जानने की कोशिश करें कि जिले में नजीबुद्दौला का किला कहां है, तो इस प्रश्न का जल्दी से उत्तर नहीं मिल पाएगा और यदि आप ने पूछा कि सुल्ताना डाकू का किला कहां है, तो यह कोई भी बता सकता है कि वह नजीबाबाद के पास है। भला डाकुओं के भी किले होते हैं? मगर आज नजीबुद्दौला का कोई नाम लेने वाला नहीं है। बिजनौर जनपद में एक ऐतिहासिक कस्बा मंडावर है। इतिहासकार कहते हैं कि पहले इस स्थान का नाम प्रलंभनगर था, जो आगे चलकर मदारवन, मार्देयपुर, मतिपुर, गढ़मांडो, मंदावर और अब मंडावर हो गया। बौद्ध काल में यह एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल था। इतिहासकार कनिंघम का मानना है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां पर करीब 6 माह तक रहा और उसने इस पूरे इलाके का ऐतिहासिक और भौगोलिक अध्ययन किया। अपने यात्रावृत में इस स्थान को मोटोपोलो या मोतीपुर नाम भी दिया गया है। मंडावर के पास बगीची के जंगल में माला देवता के स्थान पर आज भी पुरातत्व महत्व की कीमती प्रतिमाएं खेतों में मिलती हैं। सन् 1130 एड़ी में अरब यात्री इब्नेबतूता मंडावर आया था। अपने सफरनामें में उसने दिल्ली से मंडावर होते हुए अमरोहा जाना लिखा है। सन् 1227 में इल्तुतमिश भी मंडावर आया था और यहां उसने एक विशाल मस्जिद बनवायी जो आज किले की मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध है। किला तो अब नहीं रहा पर मस्जिद मौजूद है। यह मस्जिद पुरातत्व महत्व का एक नायाब नमूना है। इसमें इमाम साहब के खड़े होने के स्थान एवं छत में कुरान शरीफ की पवित्र आयतें लिखी हैं। एक लंबा समय बीतने पर भी इसकी लिखावट के रंगों की चमक अभी भी मौजूद है। ब्रिटिशकाल में महारानी विक्टोरिया को मंडावर के ही मुंशी शहामत अली ने उर्दू का ट्यूशन पढ़ाया था। मुंशी शहामत अली अंग्रेज सरकार के रेजीडेंट थे। महारानी विक्टोरिया ने उन्हें उर्दू पढ़ाने के एवज में मंडावर में इनके लिए जो महल बनवाया था। यह महल पूरी तरह से यूरोपीएन शैली में है और इसमें अत्यंत महंगी लकडि़यां दरवाजें खिड़कियां और फानूस हुआ करते थे। अब सब कुछ ध्वस्त होता जा रहा है। यह संपत्ति अब वक्फबोर्ड के अधीन है। किरतपुर के पास बगीची के जंगलों में जहां तहां विशाल कटे हुए पत्थर देखने को मिलते हैं। यहां पर इतिहास के शोध छात्र भ्रमण करते हैं और यहां के पत्थरों का किसी काल या देशकाल से मिलान करते हैं। देखा जाए तो पूरा बिजनौर जनपद ही इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं से भरा पड़ा है। शोध में संसाधनों और इतिहास में दिलचस्पी में अभाव के कारण इस पर ऐसा काम नहीं हो पाया जिस प्रकार यूरोपीय देशों में काम चल रहा है। आइए, आपका बिजनौर की एक और अद्भुत सच्चाई से सामना कराते हैं। आप माने या न माने लेकिन यह सच है कि बिजनौर से कुछ दूर जहानाबाद में यहां एक ऐसी मस्जिद थी जिस पर कभी गंगा का पानी आने से इलाहाबाद और बनारस में बाढ़ आने का पता चल जाया करता था। मुगल बादशाह शाहजहां ने यहां की बारह कुंडली खाप के सैयद शुजाद अली को बंगाल की फतह पर प्रसन्न होकर यह जागीर दी थी, जिसका नाम पहले गोर्धनपुर था और अब जहानाबाद है। शुजातअली ने गोर्धनपुर का नाम बदलकर ही जहानाबाद रखा। इन्होंने गंगातट पर पक्का घाट बनवाया और एक ऐसी विशाल मस्जिद तामीर कराई कि कि जिस पर अंकित किए गये निशानों तक गंगा का पानी चढ़ जाने से इलाहाबाद और बनारस में बाढ़ आने का पता चलता था। लगभग सन् 1920 में दुर्भाग्य से आई भयंकर बाढ़ से यह मस्जिद ध्वस्त हो गई जबकि उसकी मीनारों के अवशेष अभी भी यहां पड़े दिखाई देते हैं। यहां एक किला भी था, जो अब खत्म हो गया है। कहते हैं इस किले से दिल्ली तक एक सुरंग थी। यहां से कुछ दूर पुरातत्व महत्व का एक नौ लखा बाग है। वह भी एक किले जैसा। इसमें शुजात अली और उनकी बेगम की सफेद संगमरमर की समाधियां हैं। बांदी और इनके हाथी-घोड़ों की भी समाधियां पास में ही हैं। ये समाधियां पुरातत्व विभाग के अधीन हैं, लेकिन देख-रेख के अभाव में इनकी हालत खस्ता होती जा रही है। मुगलकाल को याद कीजिए। अकबर के नौ रत्नों में से एक अबुल फजल और फैजी चांदपुर के पास बाष्टा कस्बे के पास एक गांव के रहने वाले थे। राज्य की सूचना निदेशालय की एक स्क्रिप्ट के अनुसार बीरबल बिजनौर से ही कुछ दूर कस्बा खारी के रहने वाले थे। हालांकि बीरबल के बारे में इससे ज्यादा कुछ पता नहीं चल सका है। इसी प्रकार गंगा के तट पर बसे कुंदनपुर गांव में एक किला था जो सन् 1979 की बाढ़ में बह गया। कहा जाता है कि यह राजा भीष्मक की राजधानी थी। कहते हैं कि इसी के पास एक मंदिर से श्रीकृष्ण, भीष्मक की पुत्री रूक्मणि को हर कर ले गए थे। यह मंदिर आज भी है। हस्तिनापुर के सामने नागपुर आज भी, नारनौर के नाम से जाना जाता है। यहां सीतामढ़ी नाम का एक विख्यात मंदिर है। इतिहासकार कहते हैं कि पृथ्वी को समतल कर भूमि से अन्न उत्पादन करने की शुरूआत करने वाले रामायण काल के शासक प्रथु के अधीन यह पूरा क्षेत्र था। बढ़ापुर कस्बे से पांच किलोमीटर पूर्व में जैन धर्म के भगवान पारसनाथ के नाम से एक महत्वपूर्ण स्थान है। जैन धर्मावलंबियों की मान्यता है कि भगवान पारसनाथ यहां कुछ समय रूके थे। यहां पुराने किले के अवशेष हैं और बड़ी-बड़ी ध्वस्त हो चुकीं, जैन प्रतिमाएं और शिलाएं हैं जो जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं। सुल्ताना की नजीबुद्दौला के किले से पहचान की एक सत्य कहानी है। खूंखार, दबंग और अपराधी प्रवृत्ति के लिए बदनाम हुई भातु नामक एक दलित जाति के लोगों के सुधार के नामपर तत्कालीन अंग्रेजी प्रशासन ने इस पत्थरगढ़ के किले को भातुओं के सुधार गृह के रूप में इस्तेमाल किया था। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन देश में जोरों पर चल रहा था और सशस्त्र क्रांति में विश्वास करने वाले स्वतंत्रता के आंदोलनकारियों को भातु जाति के, नवयुवकों का बड़ा सहयोग मिल रहा था। अंग्रेजी प्रशासन की नाक में दम कर देने वाले भातुओं पर नजर रखने के लिए अंग्रेजी प्रशासन ने इनको इस पत्थरगढ़ के किले में निरुद्ध कर दिया। इनमें से सुल्तान नामक एक युवक कुछ युवाओं के एक गुट के साथ विद्रोह करके अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र जंग में कूद पड़ा। इसने अपना एक संगठन बनाया और थोड़े ही समय में अंग्रेजी शासक और उनके पिठ्ठू ज़मीदार सुल्ताना के नाम से थर्राने लगे। अंग्रेजों के पिट्ठू कहे जाने वाले जमींदारों की तो मानों शामत ही आ गई। उस समय के अंग्रेज पुलिस कमिश्नर मिस्टर यंग ने सुल्ताना को पकड़ने के लिए देशभर में जाल बिछाया था। बिजनौर में किलेनुमा थाने भी उसी समय खोले गए थे। लेकिन अंग्रेज पुलिस, सुल्ताना को नहीं पकड़ पा रही थी। कहते हैं कि किसी संत ने सुल्ताना को बोला था, कि जब वह प्रसन्न होकर किसी बच्चे को गोद में उठायेगा तो उसकी मृत्यु निकट होगी। इसीलिए सुल्ताना ने अपनी शादी भी नहीं की थी। जनपद के मिट्ठीबेरी गांव में सुल्ताना ने एक महिला के नवजात बच्चे को गोद में उठाया, तभी उसे संत की बात याद आयी और उसी समय अंग्रेज पुलिस के घेरे में आकर, अपने करीब 150 साथियों के साथ पकड़ा गया। सन् 1927 में सुल्ताना को आगरा की सेंट्रल जेल में उसके 15 साथियों के साथ फांसी दे दी गई। अंग्रेज तो उसको डाकू मानते थे, लेकिन कुछ लोगों का यह मत है कि वह डाकू नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी था। उसके पकडे़े जाने को लेकर और भी कुछ श्रुतियां हैं जिनमें एक श्रुति यह भी है कि नजीबाबाद के कुछ मुसलमान जमीदारों पर यकीन करके उनकी मुखबरी पर सुल्ताना पकड़ा गया था। बहरहाल सुल्ताना डाकू के नाम पर रंगमंच पर नाटक भी खेला जाता है, जिसे लोग बड़े चाव से देखते हैं। बिजनौर में कई छोटी बड़ी रियासतें थीं। इनमें साहनपुर, हल्दौर और ताजपुर बड़ी और प्रसिद्घ रियासतें हैं। जमींदारों का भी यह जिला माना जाता है। रियासतदारों के साथ-साथ जमींदार त्यागी राजपूतों का भी यहां काफी प्रभाव रहा है। साहनुपर स्टेट अकबरकाल की स्टेट है। हल्दौर, सहसपुर, स्योहारा, ताजपुर भी प्राचीन स्टेट हैं। ताजपुर के राज परिवार के दो युवक विदेश गये और वहां से शादी करने पर ईसाई हो गए। उन्होंने विदेश से लौटकर ताजपुर में एक शानदार चर्च बनवाया। यह चर्च देश का दूसरे नंबर का भारतीयों का बनवाया हुआ चर्च है। इसके घंटों की आवाज़ काफी दूर तक सुनाई देती है। शेरशाह शूरी ने शेरकोट बसाया था। साहनपुर में मोटा महादेव शिव मंदिर पुरातत्व महत्व की जगह है। जलीलपुर क्षेत्र के गांव धींवरपुरा में कई एकड़ क्षेत्र में फैला प्राचीन बड़ का पेड़ वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है। नजीबाबाद से कुछ किलोमीटर दूर जोगिरमपुरी में मुस्लिम संप्रदाय के प्रसिद्घ शिया संत सैयद राजू की मजार है, जहां प्रति वर्ष विशाल उर्स होता है। इसमें ईरान और अन्य देशों के शिया धर्मावलंबियों के साथ ही साथ अन्य धर्म और जातियों के श्रद्घालु भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। बिजनौर जनपद ने देश को कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभाएं भी दी हैं, जैसे-प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा आत्माराम बिजनौर के थे।
अपाहिज व्‍यथा सहन कर रहा हूं
तुम्‍हारी कहन थी ,कहन कह रहा हूं
ये दरवाजा खोलो तो खुलता नही है
इसे तोड़ने का जतन कर रहा हूं ।
उपरोक्‍त पंक्तियों के रचनाकार एवं गज़लकार कवि दुष्‍यंत यहीं के थे ।उर्दू के प्रख्यात विद्वान मौलवी नजीर अहमद रेहड़ के रहने वाले थे। इन्होंने उर्दू साहित्य पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। इंडियन पैनलकोड का इन्होंने इंगलिश से उर्दू में अनुवाद भी किया है। सरकार ने उन्हें उनके उर्दू साहित्य की सेवाओं के लिए शमशुल उलेमा की उपाधि दी तथा एडिनवर्ग विश्वविद्यालय ने उन्हें डा ऑफ लॉ की उपाधि दी। वे अंग्रेजों के जमाने के डिप्टी कलेक्टर थे। देश के प्रसिद्ध समाचार पत्र समूह टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वामी एवं जैन समाज के शीर्ष नेता साहू अशोक कुमार जैन, साहू रमेश चंद्र जैन, पत्रकार लेखक डा महावीर अधिकारी, भारतीय हाकी टीम के प्रमुख खिलाड़ी और पूर्व ओलंपियन पद्मश्री जमनलाल शर्मा, भारतीय महिला हाकी टीम की पूर्व कप्तान रजिया जैदी, भूतपूर्व गर्वनर धर्मवीरा, फिल्म निर्माता प्रकाश मेहरा बिजनौर की देन हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय का उर्दू का प्रसिद्ध तीन दिवसीय समाचार पत्र मदीना बिजनौर से प्रकाशित होता था। उस समय यह समाचार पत्र सर्वाधिक बिक्री वाला एवं लोकप्रिय था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान साहित्य एवं पत्रकारिता की मशाल लेकर चलने वाले संपादकाचार्य पं रुद्रदत्त शर्मा, पंडित पदमसिंह शर्मा, फतेहचंद शर्मा आराधक, राम अवतार त्यागी, मशहूर उर्दू लेखिका कुर्तुल एन हैदर, पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्रपाल सिंह कश्यप, प्रसिद्घ संपादक चिंतक बाबू सिंह चौहान, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी बिजनौर के ही थे। काकोरीकांड के अमर शहीदों का प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी के गांव पैजनियां से गहरा रिश्ता रहा है। अशफाक उल्ला एवं चंद्रशेखर जैसे अमर शहीदों ने यहां अज्ञात वास किया था। स्वर्गीय त्यागी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने कभी सरकार से न पेंशन ली और न ही कोई अन्य लाभ। पैजनियां गांव को स्वतंत्रता आंदोलनकारियों का तीर्थ भी कहा जाता है। Bhola Nath Tyagi , 49 / Imaliya Campus , Civil Lines , Bijnor-246701 Email-bholanathtyagi@gmail.com Mob-09456873005

Monday 5 December 2011

नये सदी की कवयित्री

नयेसदी के दूसरे दशक में महिला कवयित्रियों की कविता:एक पाठक की नजर में



Þ बेटियॉ नहीं लिखतीं
मॉओंपर कभी कोई कविता
मॉके अनकहे दु:खों का एहसास
घुलाहोता है उनकी रगों में
जैसेखून में प्‍लाज्‍मा
मिलाहोता है उन्‍हें
वहींसब कुछ संस्‍कार और
परम्‍पराके नाम पर
जिसेभोगती हैं वे
बचपनसे जवानी तक मायके में  ß
(आशाप्रभात ,वागर्थ ,जून 2011)



सीतामढ़ीकी ये गुमनाम लेखिका कवयित्रियों के बिल्‍कुल अलग जमीन की बात कर रही हैं ।स्‍त्रीऔर मॉ पर लिखी अनगिन महत्‍वपूर्ण और कुकुरमुत्‍ता टाईप कविताओं के बीच आशा अच्‍छीकविताओं की उम्‍मीद जगाती हैं ,जब वह कहती हैं



 Þबेटियॉ लिख ही नहीं सकती
बेटोंकी तरह
मसालापिसती मॉ के कान की
झुलतीबालियों के रिद्म पर
आटागूंधती उनके हाथ की
चूडि़योंकी खनक परß



कविताकी निष्‍पत्ति भी उतनी ही कवित्‍वपूर्ण है ।किसी लीक पर चलने की बजाय यह नया रास्‍ताबनाती है




Þबेटियॉ सिर्फ तमाशाई नहीं होतीं
नहींदेखती रहती उन्‍हें
जानवरोंकी तरह खटते पटते
जिन्‍दगीतमाम करते
बेटियॉशरीक होती हैं बराबर
उनकेदु:खों ,संघर्षों में
इसलिएलिखना चाहती हैं उन पर
औपन्‍यासिककहानियॉ,
विरासतमें मिली
यातनाओंजितनी बड़ी    ß



इसीप्रकार निर्मला पुतुल (दुमका) हैं ,जिनके पास न केवल जीवन का प्रचुर अनुभव है,बल्कि कहने का अंदाज भी




Þजरो सोचो ,कि
तुममेरी जगह होते
औरमैं तुम्‍हारी
तोकैसा लगता तुम्‍हें
कैसालगता
अगरउस सुदूर पहाड़ की तलहटी में
होतातुम्‍हारा गॉव
औररह रहे होते तुम
घासफूस की झोपडि़यों में
गाय,बैल,बकरियोंऔर मुर्गियों के साथ
औरबुझाने को आतुर ढि़बरी की रोशनी में
देखनापड़ता भूख से बिलबिलाते बच्‍चों का चेहरा
तोकैसा लगता तुम्‍हेंß
(नयाज्ञानोदय ,सितम्‍बर 2010)



नयीसदी में सुधा अरोड़ा जैसी पुरानी पीढ़ी की कवयित्री भी हैं ,जिनके पास अनुभव तो है,परंतु अपना शिल्‍प नहीं ।




Þअकेली औरत नींद को पुचकारती है
दुलारतीहै
पासबुलाती है
परनींद है कि रूठे बच्‍चे की तरह
उसेमुंह बिराती हुई
उससेदूर भागती हैß
(कथन,अक्‍तूबर दिसंबर2011 ,सन्‍नाटे का संगीत )



नयीकविता की कहन और शैली को अपनाकर भी सुधा अरोड़ा अपने लिए कोई मुकम्‍मल शिल्‍प  गढ़ नहीं पाती है ।अकेलापन और स्‍त्रीजीवन कीविवशताओं पर ढ़ेर सारा चर्चा के बावजूद वे कविता के मर्म को स्‍पर्श भर करती है।ह्रदय और मस्तिष्‍क को झकझोड़ने वाली कविताई यहॉ मौजूद नहीं है



Þअकेली औरत
कभीनहीं भूल पाती
जाड़ेके वे ठिठुरते दिन
औरठंड से जमीं रातें
जबप्‍यार को देह से बॉटने के बाद
बगलमें लेटे पति के
शुरूआतीखर्राटों की
धीमीसी आहट सुनकरß
(कथनका ही उपरोक्‍त अंक,भीतर बजती कई रातें )



विपिनचौधरी(हिसार) के यहॉ यह दुविधा नहीं हैं ।वे अपने कथ्‍य
के अनुकूल शिल्‍प का चयनकरती हैं



Þयह पुलिया जाने कब से है यहॉ
औरपीपल के नीचे बैठा मोची भी
नपेड़ की उम्र से
मोचीकी उम्र का पता लगता है
नमोची की उम्र से पेड़ का
औरन पानी का जो पुल के नीचे
बिनालाग लपेट बहता हैß
(वागर्थ,नवंबर 2007 ,पुलिया पर मोची)
Þ


इसी कविता में आगे विपिन कहती हैं

पुलका पानी जरूर कुछ कम हो गया है
परजिंदगी का पानी
आजभी उस मोची के
भीतरसे कम हुआ नहीं दिखता
शहरका सबसे
सिद्धहस्‍तमोची होने का
अहसासतनिक भी नहीं है उसे
हजारोंकारीगरों की तरह
उसेहुनर को कोई पदक
नहींमिला
बल्किकई लोग तो यह भी सोच
सकतेहैं
कियह भी कोइ हुनर हैß



गीतादूबे की कविता सिंदूर में भी सिंदूर एवं मंगलसूत्र को पुरूषप्रधान समाज के अस्‍त्रके रूप में देखा गया है ।(वागर्थ ,नवंबर 2007) इसी तरह पूजा खिल्‍लन की कविताअपरिभाषित तथा वत्‍सला की कविता स्‍त्री और घोड़े बेहतर शिल्‍प की तलाश को जरूरीमानती है ।(हंस ,नवंबर,2011)ज्‍योत्‍सना मिलन की कविता (उतनी देर ,कथादेश ,जून2011) भी स्‍त्री और मॉ के प्रसंगों का चुनाव करती है ,पर प्रभावकारी कविताई केबिना ।इसी अंक में धनबाद की उमा अपनी कविता लड़की में स्‍थाई प्रभाव छोड़ती है



Þअपनी नागरिकताओं से वंचित
वहनहीं बोल पाती अपनी जबान
अपनीहॅसी नहीं हंस पाती
कबकाभूल चुकी है अपना रोना
अकेलेमें खुद को खटखटाकर
खौफनाकगलियों से गुजरती है वहß



यहीसफलता(प्रभाव की दृष्टि से) चन्‍द्ररेखा ढडवाल को (वे सोच रहे हैं ,हंस ,जनवरी,2011) में मिलती दिखती है

Þतुम मत सोचो
वेसोच रहे हैं
सृष्टिके पहले दिन से
निरंतरß



हंस,मार्च 2011 में पूनम सिंह भी अपनी कविता (जहां खत्‍म होता है सब कुछ) को प्रेम कीस्‍मृति ,साथ के संघर्ष और निर्विकल्‍प चयन के बेहतर रेखाओं से मुकम्‍मल बनाती हैं



Þआज समय के किसी अलक्षित कोने में
प्रेमके शोकगीत की तरह
औंधापड़ा है सितार
आड़ीतिरछी कई लकीरें काट गई है
सीधीसरल रेखा में परि‍भाषित
उसप्‍यार कोß



रंजनाजायसवाल अपनी एक कविता(शराबखाने में स्‍त्री ,हंस ,दिसंबर 2010)में स्‍त्री स्‍वतंत्रताको नये रूपक में देखती हैं



Þशराबखाने के इतिहास में
एकपहली घटना थी
एकस्‍त्री ले रही थी
शराबकी चुस्कियां
सबसेबेपरवाह
थकीहुई थी
शराबखानेके स्‍थायी ग्राहकों में
खलबलीथी
विदेशीब्रांड है देशी की भला क्‍या औकाम
रूपरंग में एंग्‍लोइंडियन लगता है
नशाभी है या सिर्फ दिखता हैß



रंजनाइसी अंक में अपनी दूसरी कविता(मेरा स्‍लोगन) में तात्‍कालिकता से अतिक्रांत हैं

Þपुरूष ने स्‍त्री को कहा  वेश्‍या
मुझेअजीब न लगा
लेखकने लेखिका को कहा छतीसी
फर्कन पड़ाß



स्‍पष्‍टहै कि कोई तात्‍कालिक घटना या प्रसंग जिन काव्‍यात्‍मक स्थितियों में महान कविताबनती है ,वह इस कविता में अनुपस्थित है ।
स्त्रियांमात्र स्‍त्री और भेदभाव को ही रखकर कविता लिख रही ,ऐसी बात नहीं ,हंस के अगस्‍त2010 अंक में वर्तिका नन्‍दा एक कविता(वो बत्‍ती ,वो रातें)में बचपन को काव्‍यात्‍मकअंदाज में देख रही है



Þबचपन में
बत्‍तीचले जाने में भी
गजबका सुख था
हमचारपाई पे बैठे तारे गिनते
एककोने स उस कोने तक
जहांतक फैल जाती नजर
हरबार गिनती गड़बड़ा जाती
हरबार विश्‍वास गहरा जाता
अगलीबार होगी सही गिनती
बत्‍तीका न होना
सपनोंके लहलहा उठने
कासमय होताß



पंखुरीसिन्‍हा वागर्थ के फरवरी 2008 अंक में अपनी तीन कविताओं(नई औरत ,उम्र और पालतूजानवर )में अच्‍छे विषय का चुनाव करते हुए कविता की लीक पकड़ती हैं ,परंतु नारीवादकी अभिधा उनको जकड़ लेती है ।
किरणअग्रवाल भी अपनी एक कविता(भरी हुई बस में ,हंस,अप्रैल 2011) में नारीवाद से टकरातीहैं ,परंतु स्‍वप्‍नजीविता उन्‍हें अभिधा की परिधि से दूर करती है



Þमेरा बच्‍चा
जोअभी मेरे पेट में ही है
औरअभी से ही संघर्ष करना सीख रहा है जिंदगी से
भरीहुई बस में
कराहउठता है और भींच लेता है अपनी मुट्ठियां
जबकई अदद हाथ निगाहें कई अदद
मेरेजिस्‍म को नोचने के लिए बढ़ती है मेरी ओरß



नयेसदी की कविता की जरूरतों को प्रत्‍यक्षा भी अच्‍छी तरह से समझती हैं ,तथा पाखी केमई 2011 अंक में अपनी चार कविताओं से इस जरूरत को पूरा भी करती हैं ।वो औरतें नामककविता में वे अपने अनुभव की उपमाओं के द्वारा कविता की नयी सीढ़ी बनाती है



Þवो औरतें प्रेम में पकी हुई औरतें थीं
कुछकुछ वैसी जैसे कुम्‍हार के चाक से निकले कुल्‍हड़ों
कोआग में जरा ज्‍यादा पका दिया गया हो
औरवो भूरे कत्‍थई की बजाय काली पड़ गई हों
याकुछ सुग्‍गे के खाये ,पेड़ों पर लटके कुछ ज्‍यादा डम्‍भक
अमरूदकी तरह
जिसेएक कट्टा खाकर फिर वापस छोड़ दिया गया हो
उसकेउतरे हुए स्‍वाद की वजह से
वेऔरतें डर में थकी हुई औरतें थी
कुछकुछ चोट खाये मेमनों की तरह
जिबहमें जाते बकरियों की तरहß



मंजरीश्रीवास्‍तव कविता ,इतिहास और प्रेम को एकरूप करते हुए नया रास्‍ता बनाने में सफलहुई है ।आलोचना,जुलाई सितम्‍बर2010 की एक कविता(एक कविता पाब्‍लो नेरूदा के लिए)में वह नेरूदा को पूरी जिंदादिली से याद करती हैं



Þशुरू हुई तुम्‍हारी कविताएं
एकतन में
किसीएकाकीपन में नहीं
किसीअन्‍य के तन में
चॉंदनीकी एक त्‍वचा में
पृथ्‍वीके प्रचुर चुम्‍बनों में
तुमनेगाए गीत
वीर्यके रहस्‍यमय प्रथम स्‍खलन के निमित्‍त
उसमुक्‍त क्षण में
जोमौन था तब ।
तुमनेउकेरी रक्‍त और प्रणय से अपनी कविताऍ
प्‍यारकिया जननेन्द्रियों के उलझाव से
औरखिला दिया कठोर भूमि में एक गुलाबß



मंजरीइसी काव्‍यात्‍मकता से इजा़डोरा(आलोचना का वही अंक) तथा कुंवर नारायण(हंस ,अप्रैल,2010)को भी याद करती हैं ,तथा यह स्‍मृति किसी भी दृष्टि से रस्‍मी नहीं है ।
परम्‍पराऔर आधुनिकता का संघात अपनी पूरी शक्ति एवं सौन्‍दर्य के साथ अनामिका में मौजूद है।इस एक मुट्ठी संघात में जितनी काव्‍य उर्जा यहां विमुक्‍त होती है ,संभवत: अन्‍यत्रनहीं ।
तद्भव(अंक 18 ,जुलाई 2008 ) में उनकी तीनों कविता(तलाशी ,मृत्‍यु और ओढ़नी)उनके कविताके स्‍वभाव को स्‍पष्‍ट करती है ।



Þएक एक अंग फोड़ कर मेरा
उन्‍होंनेतलाशी ली
मेरीतलाशी में मिला क्‍या उन्‍हें
थोड़ेसे सपने मिले और चांद मिला
सिगरेटकी पन्‍नी भर,
माचिसभर उम्‍मीद ,एक अधूरी चिट्ठी
जोवे डिकोड नहीं कर पाये
क्‍योंकिवह सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता के समय
मैंनेलिखी थी
एकअभेद्य लिपि मेंß



ज्‍योतिचावला अपनी पांच कविताओं(आलोचना ,जुलाई सितंबर 2010)में रास्‍ता बनाने का प्रयासकरती हैं ,परंतु पुराने रास्‍तों पर चलने का मोह उनमें है ।इसीलिए एक कविता(जामुनका पेड़) में वह याद शब्‍द का दो बार और स्‍मृति का भी दो बार चर्चा करती है ।उनकोयह भी कहना पड़ता है कि

Þउस पेड़ से जुड़ी है मेरे बचपन की स्‍मृतियॉß

कलके लिए के नवीनतम अंक(सितंबर दिसंबर 2011)में लीना मल्‍होत्रा की चार कविताएं(बनारस में पिंडदान ,ओ बहुरूपिए पुरूष,तुम्‍हारे प्रेम में गणित था 1 व 2)छपी है ।
लीनाइन कविताओं में प्रेम या पुरूष के प्रेम की पड़ताल करती हैं ,तथा इस तलाश में उन्‍हेंशतरंज की सी चालों तथा रेल पटरी की समानांतर जिंदगी का आभास होता है



Þयह जो दर्द था हमारे बीच
रेलकी पटरियों की तरह जुदा रहने का
मैंनेमाना उसे
मोक्षका द्वार जहॉ अलिप्‍त होने की पूरी संभावनाएं मौजूद थी
औरतुमने
एकसमानांतर जीवन
बसएक दूरी भोगने और जानने के बीचß



इससमानांतर जिंदगी की (अ)संभावनाओं की ओर संकेत तो करती हैं ,परंतु उसके उलझाव औरनरक को देख नहीं पाती है ।



अपर्णामनोज की कविताएं असुविधा ब्‍लॉग(धन्‍यवाद भाई अशोक कुमार पांडेय)पर उपलब्‍ध है,तथा कवयित्री की गहन संवेदनशीलता ,अनुभव के प्राचुर्य तथा शिल्‍प वैविघ्‍य केप्रति जिज्ञासा को स्‍पष्‍ट करने के लिए पर्याप्‍त है



Þमेरे सीतापुष्‍प(आर्किड)
तुम्‍हेंयाद होगा मेरा स्‍पर्श
अपनेकौमार्य को
सुबनसिरी(अरूणाचलकी नदी)में धोकर
मलमलकिया था
औरघने बालों में तुम
 टंक गए थे
तबमेरी आत्‍मा का प्रसार उस सुरभि के साथ
बहचला था
एकबसंत जिया था दोनों नेß



प्रतिभाकटियार की कविता भी असुविधा ब्‍लॉग पर है ,तथा प्रतिभा अपनी बात काफी प्रभावशालीढ़ंग से  रखती हैं
Þउनके पास थी बंदूकें
उन्‍हेंबस कंधों की तलाश थी
उन्‍हेंबस सीने चाहिए थे
उनकेहाथों में तलवारें थी
उनकेपास चक्रव्‍यूह थे बहुत सारे
वेतलाश रहे थे मासूम अभिमन्‍यू
उनकेपास थे क्रूर ठहाके
औरवीभत्‍स हंसी
वेतलाश रहे थे द्रौपदीß



असुविधाब्‍लॉग पर युवा कहानीकार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ भी है ,तथा उनकी प्रेम कविताओं का नयाकोण ही तो कविताई है



Þप्‍यार करना तो
मेरीपहली झुर्री को भी
पहलीरूपहली लट को भी
करना
जोउग आए
आंखोंके नीचे स्‍याही
यादरखना वो रातें
जोइस सफर में हमने
जागके बिताई
कभीन देना प्रेम में गुलाब
यालाल कार्नेशन
देनातो
जड़ोंमें दलदली मिट्टी लिए
कमलदेना अधखिलाß



(कविताओंका एवं कवयित्रियों का चयन हमारी सामर्थ्‍य से सीमित हुई है ।इस सर्वेक्षण मेंमात्र एक दो साल के कुछ पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री को ही ध्‍यान में रखा गयाहै ,तथा इंटरनेट पर उपलब्‍ध सामग्री में भी मात्र एक ब्‍लॉग का ही सहयोग लिया गयाहै ।कई प्रसिद्ध कवयित्रियों का नाम मेरी जानकारी के बावजूद इस लेख में नहीं हैं ,बाद के अधिक व्‍यवस्थित अध्‍ययन में उन्‍हें शामिल किया जाएगा ।पत्रिकाओं का भी ज्‍यादाप्रतिनिधिक आधार उस भावी अध्‍ययन में ही संभव होगा )



Monday 28 November 2011

गालिब शताब्‍दी वर्ष 1969 में दिल्‍ली में एक प्रसिद्ध मुशायरा हुआ था ,जिसकी  जानकारी हमारे मित्र शहाब मोहिउद्दीन खान ,एडवोकेट ने दिया है ।उस मुशायरे में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी मौजूद थी ,तथा साहिर ने अपने एक नज्‍म में गालिब को याद करने के रस्‍म पर जबर्दस्‍त व्‍यंग्‍य किया ।इस नज्‍म को उपलब्‍ध कराने के लिए हम वकील साहब के आभारी हैं ।उन्‍होंने कई बार यह नज्‍म हमको सुनाया है ,तथा उनकी ऑंखों में हमने सभ्‍यता और संस्‍कृति से सियासत करने वालों के लिए अपार घृणा देखी है ।गालिब और साहिर को इस नज्‍म के बहाने फिर से याद कर रहे हैं ।


इक्‍कीस बरस गुजरे ,आजादी ए कामिल को
तब जाके कहीं हमको ,ग़ालिब का ख़याल आया ।
तुर्बत हैं कहॉ इसकी ,मदफ़न था कहॉ इसका
अब अपने सुख़न परवर ,जे़हनों में सवाल आया ।1।


सौ साल से ये तुरबत ,चादर को तरसती थी
अब उसमें अकीदत के ,फूलों की नुमाईश है ।
उर्दू के तअल्‍लुक से कुछ ,भेद नहीं खुलता
ये जश्‍न ये हंगामा ,खि़दमत है कि साजि़श है ।2।


जिन शहरों में गूंजी थी ,ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू ,बे नामोनिशां ठहरी ।
आजादी ए कामिल का एलान ,हुआ जिस दिन
इस मुल्‍क की नज़रों में ,गद्दार ज़ुबां ठहरी ।3।


जिन अहले सियासत ने ,ये जि़न्‍दा जुबां कुचली
उन अहले सियासत को ,मरहूम का ग़म क्‍यूं हो ।
ग़ालिब जिसे कहते हैं  ,उर्दू ही का शायर था
उर्दू पे सितम ढ़ा के ,ग़ालिब पे करम क्‍यूं हो ।4।

ये जश्‍न ये हंगामा ,दिलचस्‍प खिलौने हैं
कुछ लोगों की कोशिश है ,कुछ लोग बहल जाएं ।
जो वादा ए फरदा पर, अब टल नही सकते हैं
मुमकिन हैं कि कुछ अर्सा,इस जश्‍न पे टल जाए ।5।

ये जश्‍न मुबारक हो ,पर ये भी सदाकत है
हमलोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।
गांधी हो कि गालिब हो ,इंसाफ की नजरों में
हम दोनों के क़ातिल हैं ,दोनों के पुजारी हैं ।6।










Friday 25 November 2011

द्विवेदीयुगीनआलोचना : मिश्रबंधु

 द्विवेदी कालीन आलोचकों में मिश्रबंधु का काम कई दृष्टियों से महत्‍वपूर्ण है  । भक्तिकाल और रीतिकाल की उनकी परोसी हुई सामग्री को आचार्य शुक्‍ल भी अपने इतिहास में स्‍वीकार करते हैं । तीन भाईयों गणेश बिहारी मिश्र , श्‍याम बिहारी मिश्र तथा शुकदेव बिहारी मिश्र के साहित्यिक अवदान को हम लोग सामूहिक रूप से मिश्रबंधु के ही नाम से जानते हैं तथा इतिहास के इस अनोखे पहलू को इसी रूप में स्‍वीकार करते हैं ।
द्विवेदी कालीन विद्वान आलोचना का कार्य कलम की बजाय गुलाब और तलवार से करते हैं  ।वे अपने प्रिय कवियों को गुलाब देते हैं तथा अन्‍य पर तलवार से प्रहार करते हैं ।मिश्रबंधु लिखित ' हिंदी नवरत्‍न' का नाम भी रीतिकालीन अवशेष का सूचक है ।नवरत्‍न साहित्‍य और कला का प्रसिद्ध और चालू मानक रहा है और लेखकों ने इसका प्रयोगकर अपने उद्देश्‍य को स्‍पष्‍ट कर दिया है ।इनकी आलोचना की पद्धति है छन्‍दों का मुकाबला ,मानो कविता की बात नहीं घुड़दौड़ का आयोजन हो । 

''पहले हम मतिराम को भूषण से बहुत अच्‍छा कवि समझते थे ,पर पीछे से इस विचार में शंका होने लगी ।उस समय हमने भूषण और मतिराम के एक एक छन्‍द का मुकाबला किया ।तब जान पड़ा कि मतिराम के प्राय: 10 या 12 कवित्‍त तो ऐसे रूचिर हैं कि उनका सामना भूषण का कोई कवित्‍त नहीं कर सकता और उनके सामने देव के सिवा और किसी के भी कवित्‍त ठहर नहीं सकते , पर मतिराम के शेष पद्य भूषण के अनेक पद्यों के सामने ठहर नहीं सकें ।''
ये उदाहरण आलोचना के उस विभ्रम का है जो द्विवेदीयुगीन आलोचना झेल रही थी ।मिश्रबंधुओं ने कविताओं का मिलान किया ,स्‍तर के हिसाब से वर्गीकरण किया ,फिर उसे नंबर दिए ,परंतु इस प्रक्रिया में उस सिद्धांत का उल्‍लेख नहीं है ,जिसके आधार पर उन्‍हें नंबर दिया गया ।स्‍पष्‍ट है कि अपनी रूचि और काव्‍यगत संस्‍कार ही आलोचना का सबसे बड़ा मानक था ।
                                                                       आचार्य शुक्‍ल की भाषा में मिश्रबंधु कविवृत्‍तकार ज्‍यादा थे इतिहासकार कम ,यद्यपि उनका वृत्‍त हिंदी इतिहास की आलोचना का एक अनिवार्य सोपान रहा है तथा स्‍वयं शुक्‍ल जी भी 'मिश्रबन्‍धु विनोद' के ऋणी रहे हैं ।वे रीतिकालीन काव्‍यशास्‍त्र के मर्मज्ञ थे तथा पारंपरिक काव्‍य परंपरा की रसस्‍वी धारा को उर्जापूर्वक रेखांकित किया ।उन्‍होंने तुलसी काव्‍य में नायक उपनायक की विरोधी स्थिति और तुलसी की रूपक कला को स्‍पष्‍ट किया ,इसी तरह सूर के बाल लीला में उन्‍होंने स्‍वाभाविकता को परिलक्षित किया ।देव में वे छंदवैविघ्‍य को अजायबघर की तरह देखते हैं तथा देव साहित्‍य की अभूतपूर्व कोमलता ,रसिकता और सुंदरता की प्रशंसा करते हैं ।आलोचना का यह पक्ष आधुनिकता से रहित है ,परंतु मिश्रबंधु रसिकता को कुछ कुछ तार्किकता से जोड़ते हुए आधुनिकता का मार्ग प्रशस्‍त करते हैं ।तुलनात्‍मक आलोचना के प्रवर्तन का भी श्रेय उन्‍हीं को है ,यद्यपि तुलना के लिए अपनाई गई उनकी प्रविधि से हम असहमत हैं ।

Tuesday 22 November 2011

निशांत झा की कविताएं


निशांत झा हिंदी और उर्दू कविता के बीच सेतु बनाते हुए अपना शिल्‍प और मुहावरा गढ़ने के लिए कटिबद्ध है । इनकी गजलों में एक नये लेखक की कच्‍ची मिट्टी की सुगंध आपको अनायास ही मिल जाएगी ।यह गंध जहां इनकी पहचान है ,वहीं भविष्‍य की अच्‍छी कविता का संकेत भी ।अच्‍छे कुम्‍हार की तरह उनको भी बहुत कुछ मथना है अभी ।
ज़िंदगी के पेच ओ ख़म से हम नहीं थे वाकिफ मगर ,
हम जिए ,दिल से जिए ,छोरी नहीं कोइ कसर !

तू सरापा खूब -सूरत थी , मगर ई ज़िंदगी !
हम ने ही पायी नहीं थी देखने वाली नज़र !

रूह क्या है , सागर ऐ नूर ऐ खुदा की बूँद है ,
चैन आ जाए उसे , सागर में मिल जाए अगर !

दिएर की क्यों ख़ाक छाने , जब वो हर ज़र्रे में है ,
क्यों न उसके अक्स को दिल में तलाशे हर पहर !

हम ग़रीबों के मुक़द्दर में कहाँ गुलशन लिखे ?
हमने काग़ज़ के गुलों पे इत्र छिरका उम्र भर !

:चैन : था या जीस्त के साहिल पे लिक्खा लफ्ज़ था ,
जब मिला तब तब मिटाने आ गयी ग़म की लहर !

2
पहले था सुना , अब यक़ीन सा हो चला है,
हर शख्स क्यों यहाँ बिका बिका सा लगा है |

ग्राहक तो हमेशा ख़ुश दिखते हैं बाज़ारों में,
हर ख़रीददार भी क्यों यहाँ लुटा लुटा लगा है |

इंसान ही बिकते हैं, इंसान ही ख़रीददार हैं,
इस जहाँ मैं आज , इंसानो का बाज़ार लगा है |

हर शख्स ने ख़ुद ही तय कर रखी हैं अपनी क़ीमतें,
कहीं जज़्बात ,कहीं ईमान, कहीं तन, का तख़्त लगा है |

क्या क्या नहीं करता इंसान पेट की खातिर,
ज़मीर के कमरे पे आज, भूख का ताला लगा है |

3
अपनी फूटी किस्मत से रो के बोली इक बेवह
क्या खता हुई मुझसे जो बना दिया विधवा

मांग का सिन्दूर उज्र ख़ाली है कलाई भी
अब तो बस मुक़द्दर में है सुफैद इक साड़ी

हाथ में नह चूरी है और न पाऊँ में पायल
मिट गया मेरा हर सुख हो गया है दिल घायल

अब कहाँ रहा बिस्टर मैं हूँ और चटाई है
घर का एक कोना ही बस मेरी खुदैई है

मुझ से हर खुशी रूठी रुंज -ओ -ग़म ने घेरा है
कुछ नज़र नहीं आता हर तरफ अँधेरा है

इक सिन्दूर मिटते ही मांग हो गयी सूनी
अब खमोश रहती हूँ पहले थी मैं बातूनी

अपनी अपनी खुशियों में लोग चूर रहते हैं
अब तो मेरे अपने भी मुझ से दूर रहते हैं

कितनी सदा -ओ -बेरुंग अब मेरी कहानी है
बस सफेद कपरों में ज़िंदगी बितानी है

देके रंज -इ तन्हाई उम्र भर का ग़म बख्शा
ऐ फलक यह बतला डे क्या कुसूर था मेरा

4
गूँथ रहा है सुबह से जगकर,
रिश्तों की चौखट पर।
माथे पर बल आ जाता है ,
थोड़ी सी आहट पर।।

कितने धागे कितनी लड़ियाँ,
कितने रंग के दाने हैं।
गिनता है बिसराता है,
प्यार भरी मुस्काहट पर।।

तपते दिन और शीतल रातें,
मशरूफी हर मौसम में।
रोज यहाँ पछताता है,
बिस्तर की सिलवट पर।।

'इश्क' ये इन्सां का अफसाना,
रिश्ते बुनते जाना है।
नए सहारे खोज रहा है,
हर दिल की अकुलाहट पर।।

Sunday 20 November 2011

महावीर प्रसाद द्विवेदी(mahavir prasad dwivedi) की आलोचना दृष्टि


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जिस महत्‍तर चिंता के साथ हिंदी साहित्‍य संसार में अवतरित हुए ,उसमें मात्र भाषा की उच्‍छश्रृंखलता व खड़ी बोली व ब्रजभाषा की द्वैधता ही शामिल नहीं थी ।आलोचना व कविता भी उनकी चिंताओं में शामिल है ।आलोचनाकर्म भले ही आचार्य शुक्‍ल की तुलना में उनका कम हो ,परंतु कविता की समझ उनकी निस्‍संदेह बीस थी ।रीतिकालीन अवशेषों से जूझते द्विवेदी जी शुद्धतावाद और उपयोगितावाद की तरफ झुकते हैं ,परंतु कविता व आलोचना की कसौटी को विश्‍वसनीय बनाते हैं ।कविता के लोकप्रिय शिल्‍प की तुलना में वैकल्पिक आग्रहों को उन्‍होंने जितनी जल्‍दी स्‍वीकारा ,यह आश्‍चर्य उत्‍पन्‍न करती है ।नए शिल्‍प के प्रति सकारात्‍मक दृष्टिकोण एक लंबे समय तक हिंदी आलोचना से लुप्‍त रही और यह कहने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि यह स्‍वीकार्यता एक लंबे अंतराल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह में प्रकट हुई । अपनी कविता में अभिनवशिल्‍प के कारण ही निराला और मुक्तिबोध बहुत दिनों तक आलोचकों के एक वर्ग के द्वारा निशाना बनते रहे तथा रामचन्‍द्र शुक्‍ल और राम विलास शर्मा अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद इस एकांगिता का अंग बने रहे ।
शिल्‍प विषयक उनकी प्रगतिशीलता को रेखांकित करने के लिए उनका एक उद्धरण प्रस्‍तुत करना चाहूंगा '' आजकल लोगों ने कविता और पद्य को एक ही चीज समझ रखा है ।यह भ्रम है ।कविता और पद्य में वही अन्‍तर है ,जो अंग्रेजी पोयट्री और वर्स में है ।किसी प्रभावोत्‍पादक और मनोरंजक लेख ,बात या वक्‍तृता का नाम कविता है ,नियमानुसार तुली हुई सतरों का नाम पद्य है । जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्‍त पर असर नहीं होता ,वह कविता नहीं ।वह नपी तुली शब्‍द ,स्‍थापना मात्र है ।गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है ।''
यही विचार निराला भी व्‍यक्‍त करते हैं '' तुले हुए शब्‍दों में कविता करने और तुक अनुप्रास आदि ढ़ूढ़ने से कवियों के विचार स्‍वातंत्र्य में बड़ी बाधा आती है ।पद्य के नियम कवि के लिए एक प्रकार की बेडि़यां हैं ।उनसे जकड़ जाने से कवियों को अपनी स्‍वाभाविक उड़ान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।''
आचार्य द्विवेदी अपने समझ को एक व्‍यापक जमीन पर विकसित करते हैं ।संस्‍कृत के कई प्रतिष्ठित लेखकों पर उन्‍होंने गंभीरतापूर्वक लिखा तथा उनकी कमियों को साहसपूर्वक दिखाया ।संस्‍कृत ही नहीं बांग्‍ला ,अंग्रेजी ,मराठी और उर्दू साहित्‍य को मनन करते हुए उन्‍होंने हिंदी में गंभीर पाठक वर्ग को पैदा किया ।उर्दू साहित्‍य की प्रशंसा उन्‍होंने जिस मनोयोग से किया ,वह उनकी निष्‍पक्ष दृष्टि और हिंदी के सेकुलर भविष्‍य की ओर संकेत करती है '' उर्दू का साहित्‍य समूह हिन्‍दी से बढ़ा चढ़ा है ।इस बात को कबूल करना चाहिए ।''''''' उर्दू लेखकों में शम्‍स उलमा हाली ,आजाद जकाउल्‍ला ,नजीर अहमाद आदि की बराबरी करने वाला हिन्‍दी में शायद ही कोई हो ''
उन्‍होंने प्राचीन साहित्यिक परंपरा के क्षयमान तत्‍वों का खुलकर विरोध किया ।उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा कि नायिका भेद जैसे ग्रन्‍थों के न होने से न केवल युवा वर्ग बल्कि सबका कल्‍याण है ।उन्‍होने कविता मे सरल और जनसाधारण की भाषा को ही उपयुक्‍त माना ।आलंकारिकता के विरूद्ध सहजता का उन्‍होंने खुलकर समर्थन किया ।
नन्‍ददुलारे वाजपेयी ने आचार्य द्विवेदी को साहित्‍य में कपास की खेती करने वाला कहा है ,बहुत सारे लोगों ने उन्‍हें नीरस और उपयोगितावादी बताया है ,परंतु इसे उस युग के परिपेक्ष्‍य में ही देखा जाना चाहिए ।राष्‍ट्रप्रेमी द्विवेदी जी हर तरह से सामंतवाद और रीतिवाद को पराजित करना चाहते थे ,इसीलिए उन्‍होंने अपने लिए एक कठोर नीरस और रूक्ष विद्वान की भूमिका का वरण किया ।कूड़ा करकट हटा के ही उन्‍होंने वह जमीन बनायी ,जिस पर आचार्य राम चन्‍द्र शुक्‍ल खड़े हुए ।

Wednesday 9 November 2011

भारतेन्‍दुकालीन हिंदी आलोचना


भारतेंदु कालीन हिंदी आलोचना आलोचना के प्रारंभिक पर बुनियादी सवाल से जुझती रही ।इस काल के तीन मुख्‍य आलोचक हैं भारतेंदु हरिश्‍चन्‍द्र,बालकृष्‍ण भट्ट और प्रेमधन ।निश्चित रूपेण भारतेंदु मंडली संस्‍कृत आलोचना की बेगवती धारा से अछूती है ।इसके पास परंपरा ,आधुनिकता ,राष्‍ट्र व समाज के सीधे साधे प्रश्‍न हैं ।सुधार व जागरण के सामान्‍य प्रश्‍नों से ही यह मंडली साहित्‍य को देखती है ।यद्यपि सामंती छाया से मुक्ति दिलाने की महती प्रक्रिया को प्रारंभ करने का श्रेय इस मंडली को है ।विश्‍वनाथ त्रिपाठी भारतेंदु युग और रीतिकालीन साहित्‍य के अंतर को तीन बिंदु पर देखते हैं ।1 यथार्थ बोध 2 विषमता बोध 3 और इस विषमता से उबरने की छटपटाहट ।राम विलास शर्मा ने रीतिकालीन आलोचना और भारतेंदु आलोचना में निहित आधारभूत अंतर को दिखलाने के लिए बालकृष्‍ण भट्ट के एक निबंध के शीर्षक का उल्‍लेख किया है 'साहित्‍य जनसमूह के ह्रदय का विकास है ' ।
भारतेंदु का आलोचना संबंधी चिंतन मात्र नाटक तक सीमित है ,परंतु यही एक मात्र निबंध उनकी मौलिकता को स्‍पष्‍ट करने के लिए पर्याप्‍त है ।उन्‍होंने हिंदी नाटक को संस्‍कृत ,यूरोपीय और पारसी नाटक के सिद्धांतों में बांटने की बजाय तत्‍कालीन आवश्‍यकता और राष्‍ट्रीयता को ध्‍यान में रखा ।उन्‍होंने प्राचीन नाटक के उद्देश्‍यों को आगे बढ़ाते हुए नाटक के पांच उद्देश्‍य बताए 1 श्रृंगार 2 हास्‍य 3 कौतुक 4 समाज संस्‍कार 5 देश वत्‍सलता ।उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा कि ' अलौकिक विषय का आश्रय करके नाटकादि दृश्‍यकाव्‍य प्रणयन करना उचित नहीं है ।'
इस काल में आलोचना को सर्वाधिक गंभीरता से बालकृष्‍ण भट्ट ने लिया ।बच्‍चन सिंह उन्‍हें ही हिन्‍दी साहित्‍य का प्रथम आलोचक मानते हैं ।संस्‍कृत और अंग्रेजी साहित्‍य से परिचित भट्ट जी ने मुख्‍यत: समसामयिक साहित्‍य पर अपने विचार व्‍यक्‍त किए ।उन्‍होंने 'रणधीर प्रेममोहिनी' को पहला ट्रेजेडी कहा तथा 'परीक्षा गुरू 'की भाषा और प्‍लाट को सराहनीय बताया ।'संयोगिता स्‍वयंवर ' को उन्‍होंने कथानक ,चरित्रचित्रण ,कथोपकथन, ,देशकाल व उद्देश्‍य की दृष्टि से देखा ।यहॉ पर उन्‍होंने आलोचना के मानक में युगांतार किया ।लाला भगवानदीन की असफलता के विषय में कहा गया कि ऐतिहासिक पुरावृत्‍त और ऐतिहासिक नाटक में जो अंतर होता है ,उसे भगवान दीन ने नहीं समझा ।चरित्रचित्रण की एकरसता तथा कथोपकथन की अस्‍वाभाविकता पर भी उन्‍होंने आक्षेप किए ।तथापि उनकी आलोचना में उपदेश बहुलता तथा अनावश्‍यक व्‍यंग्‍य व कटुता का बाहुल्‍य है ।
'संयोगिता स्‍वयंवर ' पर प्रेमधन ने भी लिखा है ,परंतु उनकी आलोचना पुराने किस्‍म की है ।उन्‍होंने रस और सन्धियों को मानक बनाकर ही लिखा है ।स्‍पष्‍ट है कि भारतेंदु युग साहित्‍य की अन्‍य विधाओं के साथ आलोचना को भी नवजागरणवादी दृष्टि से ही देखती है ।इस युग के उठाए प्रश्‍नों का सम्‍यक उत्‍तर परवर्ती युग में मिलता है ।हिंदी साहित्‍य को संस्‍कृत साहित्‍य की ही तरह वृहत्‍तर आधार पर खड़ा करने का न ही समय उनके पास था , न ही आवश्‍यक औजार ।

Friday 2 September 2011

शमीम करहानी ,कवि शायर

चिरैयाकोट मउनाथभंजन के रहने वाले श्री शहाब मोहिउददीन खान (मोबाईल नम्‍बर 09616503548)पेशे से वकील परंतु दिल से कवि(कबीरा) हैं । मउ के ही एक गांव करहां के रहने वाले मशहूर शायर शमीम करहानी के विषय में उन्‍होंने महत्‍वपूर्ण जानकारी दी है ।तथ्‍य के स्‍तर पर यह जानकारी अधूरा होते हुए भी रचनात्‍मकता के स्‍तर पर उल्‍लेखनीय है ।सर्वप्रथम कवि की उस कविता को देखा जाए ,जो उन्‍होंने गांधी जी के हत्‍या के बाद लिखा था
ये घेरे हैं क्‍यों रोने वालों की टोली
खुदारा न बोलो ,ये मनहूस बोली
कोई बाप के खूं से खेलेगा होली
अबस मादरे हिंद शरमा गई है
जगाओ न बापू को नींद आ गई है ।
इस कविता के साथ ही कवि का एक और गजल देखा जाए
मशअल के लिए परदै हुश्‍न ,रूखे मशअल है
कहते हैं जिसे शोला ,वह आग का आंचल है
भीगी हुई पलकें हैं ,ऐ महफिले शब ,सो जा
साकी का तबस्‍सुम भी अब नींद से बोझल है
रूक्‍कासा ऐ दौरां के आहंग पर क्‍या बोले
खुद अपने मसाएल में उलझी हुई पायल है
इक शामे तमन्‍ना को अन्‍दाज को क्‍या कहिए
रूठी हो तो आंसू है ,मन जाए तो काजल है ।
इसी तरह कवि का एक और प्रसिद्ध गजल खान साहब ने ऐसे सुनाया
पीले जो लहू दिल का
वह इश्‍क का मस्‍ती है
क्‍या मस्‍त है ये नागन
खुद अपने को डसती है
ढलते हैं यहां शीशे
चलते हैं यहां पत्‍थर
दीवानों ठहर जाओ
सहरा नहीं बस्‍ती है ।
खान साहब ने कवि शमीम करहांनी का अंतिम गजल इस प्रकार सुनाया
क्‍या शर्म खुदी क्‍या पास हुआ
गुरबत की अन्‍धेरी रातों में
कितने ही बुताने जोहराबदन
बांदीदै नम बिक जाते हैं
ये शहर है ,शहरे जरदारी
क्‍या होगा शमीम अंजाम तेरा
यॉ जेहन खरीदा जाता है
यॉ अहले कलम बिक जाते हैं




























Saturday 27 August 2011

प्रगतिशील वसुधा





प्रगतिशील वसुधा का श्रद्धांजलि अंक और मेरी कुछ कविताएं ।

Sunday 21 August 2011

राम शरण शर्मा (ram sharan sharma )



राम शरण शर्मा (26 नवंबर 1919 से 21 अगस्‍त 2011) की बरौनी से प्रारंभ यात्रा जिस निष्‍पत्ति तक पहुंची वह आश्‍चर्यजनक है ।मिथिलांचल के एक सामान्‍य से कस्‍बे में जन्‍मे प्रोफेसर शर्मा ने प्राचीन इतिहास लेखन को गंभीड मोड दिया ।पटना ,दिल्‍ली व टोरंटो के विश्‍वविद्यालय उनकी अकादमिक प्रतिभा के साक्षी बने तथा अपने गुरूओं ए एल बाशम के सांस्‍कृतिक इतिहास लेखन व डी डी कोशांबी के नीरस भौतिकवाद से आगे जाते हुए उन्‍होंने द्वन्‍द्वात्‍मक भौतिकवादी इतिहास लेखन को ठोस आधार पर स्‍थापित किया ।उनका इतिहास लेखन भूगर्भ में छिपे अवशेषों के साथ ही साहित्‍य के सूत्रों ,शैलियों को समेटते हुए व लोकोक्तियों ,कहावतों का रस ग्रहण करते हुए आगे बढी ।
अपने सहयोगियों इरफान हबीव ,रोमिला थापर जैसे विद्वानों के साथ उन्‍होंने इतिहास लेखन को साम्‍प्रदायिकता व राजनीति से अलग करने में लगाया ।उन्‍होंने इतिहास को अनुमान व भाषणबाजी से आगे ठोस तथ्‍य पर आधारित किया ।यह गंभीर सामाजिक शास्‍त्र के रूप में भारत में जानी गयी ।उन्‍होंने इतिहास को भौगोलिक उत्‍खनन ,समाजशास्‍त्र ,भाषाशास्‍त्र एवं नृविज्ञान के सिद्धांतों के बीच स्‍थापित किया । अब इतिहास 'एक था राजा ' नहीं रहा । भारत में जिन विद्वानों ने इतिहास को राजा महाराजाओं से आगे जनता के संघर्षों ,उसके बदलते जीवन व कष्‍टों के संदर्भ में देखा ,उसमें राम शरण शर्मा अग्रगण्‍य हैं । निम्‍नलिखित कुछ महत्‍वपूर्ण ग्रंथों की सहायता से यह जाना जा सकता है कि लेखक की रूचि किन तथ्‍यों ,विचारों की ओर रही है
Select bibliography of works in English
Aspects of Political Ideas and Institutions in Ancient India, (Motilal Banarsidass, Fifth Revised Edition, Delhi, 2005), ISBN 8120808983. Translated into Hindi and Tamil.
Sudras in Ancient India: A Social History of the Lower Order Down to Circa A D 600(Motilal Banarsidass, Third Revised Edition, Delhi, 1990; Reprint, Delhi, 2002). Translated into Bengali, Hindi, Telugu, Kannada, Urdu and Marathi (two volumes).
Perspectives in Social and Economic History of Early India, paperback edn., (Munshiram Manoharlal, Delhi, 2003). Translated into Hindi, Russian and Bengali. Gujrati, Kannada, Malayalam, Marathi, Tamil and Telugu translations projected.
Material Culture and Social Formations in Ancient India, (Macmillan Publishers, Delhi, 1985). Translated into Hindi, Russian and Bengali. Gujrati, Kannada, Malayalam, Marathi, Tamil and Telugu translations projected.
Urban Decay in India (c.300-1000), (Munshiram Manoharlal, Delhi, 1987). Translated into Hindi and Bengali.
Advent of the Aryans in India (Manohar Publishers, Delhi, 2003)
Early Medieval Indian Society: A Study in Feudalisation (Orient Longman Publishers Pvt. Ltd., Delhi, 2003)
Higher Education, ISBN 8171693202.
Looking for the Aryans, (Orient Longman, Madras, 1995, ISBN 8125006311).
India's Ancient Past, (Oxford University Press, 2005, ISBN 978-0195687859).
Indian Feudalism (Macmillan Publishers India Ltd., 3rd Revised Edition, Delhi, 2005).
The State and Varna Formations in the Mid-Ganga Plains: An Ethnoarchaeological View (New Delhi, Manohar, 1996).
Origin of the State in India (Dept. of History, University of Bombay, 1989)
Land Revenue in India: Historical Studies, Motilal Banarsidass, Delhi, 1971.
Light on Early Indian Society and Economy, Manaktala, Bombay, 1966.
Survey of Research in Economic and Social History of India: a project sponsored by Indian Council of Social Science Research, Ajanta Publishers, 1986.
Communal History and Rama's Ayodhya, People's Publishing House (PPH), 2nd Revised Edition, September, 1999, Delhi. Translated into Bengali, Hindi, Kannada, Tamil, Telugu and Urdu. Two versions in Bengali.
Social Changes in Early Medieval India (Circa A.D.500-1200), People's Publishing House, Delhi.
In Defence of "Ancient India", People's Publishing House, Delhi.
Rahul Sankrityayan and Social Change, Indian History Congress, 1993.
Indo-European languages and historical problems (Symposia papers), Indian History Congress, 1994.
Some economic aspects of the caste system in ancient India, Patna, 1952.
Ancient India, a Textbook for Class XI, National Council of Educational Research and Training, 1980. Translated into Bengali, Hindi, Japanese, Korean, Kannada, Tamil, Telugu and Urdu. Italian and German translations projected. Revised and enlarged book as India's Ancient Past, (Oxford University Press, 2005, ISBN 978-0195687859).
Transition from antiquity to the Middle Ages in India (K. P. Jayaswal memorial lecture series), Kashi Prasad Jayaswal Research Institute, Patna, 1992.
A Comprehensive History of India: Volume Four, Part I: the Colas, Calukyas and Rajputs (Ad 985-1206), sponsored by Indian History Congress, People's Publishing House, 1992, Delhi.

Books to be released
Rethinking India's Past, (Oxford University Press, 2009, ISBN 978-0195697872).

Select bibliography of works in Hindi
Vishva Itihaas ki Bhumika, Patna, 1951-52.
Bharatiya Samantvaad, Rajkamal Prakashan, Delhi.
Prachin Bharat Mein Rajnitik Vichar Evam Sansthayen, Rajkamal Prakashan, Delhi.
Prachin Bharat Mein Bhautik Pragati Evam Samajik Sanrachnayen, Rajkamal Prakashan, Delhi.
Shudron Ka Prachin Itihaas, Rajkamal Prakashan, Delhi.
Bharat Ke prachin Nagaron Ka Patan, Rajkamal Prakashan, Delhi.
Purva Madhyakalin Bharat ka Samanti Samaj aur Sanskriti, Rajkamal Prakashan, Delhi.
Prarambhik Bharat ka Parichay, Orient Blackswan, Delhi, 2004, ISBN 978-81-250-2651-8.
उनकी पुस्‍तकों को भारत व यूरोप के प्रमुख भाषाओं में अनुवाद किया गया ।यद्यपि हिंदी में लेखन को उन्‍होंने वरीयता नहीं दी ,तथापि उनके हिंदी के अनुदित पुस्‍तकों में उनके द्वारा हिंदी में मौलिक रूप से अलग अध्‍याय लिखा गया तथा अनुवाद का भी गंभीरता से पर्यवेक्षण किया गया ।इस तरह हिंदी के भी वे निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्‍ठ इतिहास लेखक हैं ।हिंदी में मौलिक रूप से राम विलास शर्मा ने ऋग्‍वेद एवं आर्यों पर लिखने का प्रयास किया ,पर उनके लेखन की गंभीर सीमा है ।
हिंदी साहित्‍य संसार की ओर से महान इतिहासकार को श्रद्धांजलि ।