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Tuesday 16 July 2013

नौंवी नवलेखन प्रतियोगिता

नौंवी नवलेखन प्रतियोगिता

1 नौंवी नवलेखन प्रतियोगिता उपन्‍यास विधा के लिए सुनिश्चित की गई है ।

2 पांडुलिपि की गुणवत्‍ता के अनुसार चयनित पांडुलिपि पर रू एक लाख (100000) का पुरस्‍कार प्रदान किया जाएगा । चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित करेगा ।ज्ञानपीठ केनियमानुसार प्रकाशित पुस्‍तक के लिए लेखक को रॉयल्‍टी दी जाएगी ।अनुशंसित पांडुलिपियां भी ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित होंगी ।

3 इस बार 40 वर्ष की आयु तक के लेखकों से उपन्‍यास की पांडुलिपियां आमन्त्रित है ।

4 लेखक का प्रथम उपन्‍यास होना चाहिए , भले ही लेखक की रचनाएं अन्‍य विधाओं में प्रकाशित हुई हों ।

5उपन्‍यास की पांडुलिपि कम से कम 200 टंकित पृष्‍ठों की होनी चाहिए ।

6 लेखक द्वारा जन्‍मतिथि सहित अपना पूरा परिचय भेजना आवश्‍यक है ।

7 प्रतियोगिता में भेजी जाने वाली पांडुलिपि पर '  नवलेखन प्रतियोगिता के लिए ' जरूर लिखें ।

8 भारतीय ज्ञानपीठ की वेबसाइट पर उपलब्‍ध  नवलेखन प्रतियोगिता फार्म भी साथ में भेजें अथवा कार्यालय से मँगबाऍं ।

9 यदि कोई कृति पुरस्‍कार के योग्‍य नहीं पायी गयी तो इस वर्ष पुरस्‍कार नहीं दिया जाएगा ।

10 निर्णायक मंडल का निर्णय मान्‍य और अन्तिम होगा ।

11 इस वर्ष कार्यालय में पांडुलिपि प्राप्‍त होने की अंतिम तिथि 30 सितम्‍बर , 2013 है ।

कृपया पुरस्‍कार सम्‍बन्‍धी कोई पत्र व्‍यवहार न करें ।
किसी से भी अनुशंसा कराने वाले लेखक को प्रतियोगिता के अयोग्‍य घोषित किया जा सकता है ।


(साभार 'नया ज्ञानोदय' जुलाई 2013)

भारतीय ज्ञानपीठ
18 ,इन्‍सटीट्यूशनल एरिया ,लोदी रोड

पोस्‍ट बॉक्‍स नं0 -3113

नई दिल्‍ली 110033

Saturday 13 July 2013

सरयू की एक उदास सांझ

इतनी उदासी तो मौत के दुआर पर भी नहीं होती है ,और इस शहर के बीचोंबीच हम टहलते रहे ,परंतु शहर ने मानो नोटिस ही नहीं लिया हो ।हम धीरे-धीरे चल रहे थे ,हम हरेक रूकने वाले दुकानों पर रूक रहे थे ,हम जो खरीद सकते थे ,खरीद रहे थे ।हम चुटकुला-कहानी सुन सुना रहे थे ,परंतु शहर ने मानो अफीम के पानी से कुल्‍ला किया हो ।दुकानों में बच्‍चों के खिलौने सजे थे ,वहीं बगल में औरतों के श्रृंगार के सामान बिक रहे थे ,अयोध्‍या नरेश राम के विभिन्‍न मंदिरों के फोटू भी बिक रहे थे ।भजन के कैसेटों का दुकान अलग था ,उसमें विभिन्‍न भजनों के ऑडियो-वीडियो संगीत सुनाए जा रहे थे ।6 दिसंबर 1992 की घटनाओं का भी सचित्र प्रसारण चल रहा था ,कुछ नेतागण भी दिख रहे थे ,जिसे देश ने टुकड़ों में नायक या खलनायक कहा ।कैसेट विक्रेता निर्लिप्‍त भाव से कैसेट बेच रहे थे ।मेरी उदासी या उत्‍साह से उन पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा ,वे जुलाई के पुरवैये से पीडि़त थे ।मारक आलस्‍य उनकी आंखों में था ,वे मशीनी हो गए थे ।वे ऐसे शहर में रहते थे ,जिसका रिमोट बहुत दूर था ,और इस शहर को उस बहुत दूर वाले रिमोट से बांध दिया गया था ।इस शहर की अपनी जिंदगी खतम हो गई थी ,यहां के लोग अब लोग नहीं रह गए हैं ,वे संतों ,नेताओं ,कारसेवकों का बस पोस्‍टर गिनते हैं ।उनकी रोजी पोस्‍टर छापने ,चिपकाने में है ।पोस्‍टर के कंटेंट पर वे बहस नहीं करते ।उनका घर ,उनका पार्क ,उनका सड़क अचानक पोस्‍टरों ,बैनरों से घिर जाता है ।उनकी सांसें इन बैनरों के आर-पार नहीं जाती ,उनका दम घुटता है ,पर वे अपने सूखे होठों पर उदास मुस्‍कुराहट लाने की कोशिश करते हैं ।

                                               और अयोध्‍या की ये उदासी हर कोई पहचानते हुए भी अनसूनी करता है ,कुछ जो पुराने ढ़ंग से सोचते हैं ,उन्‍हें अब भी लगता है कि मंथराऍं साजिश कर रही है ,और बूढ़ा राजा चुप्‍पी मारे हुए है ।उसकी चुप्‍पी उसके पिता ,पति और राजा की भूमिकाओं को और भी तिक्‍त बना देता है ।पति पिता का हाथ पकड़े है ,और पिता पति को मुंह दबाए ।राजा इन सबको देखके परेशान है  ।राजा इसलिए भी परेशान है कि हस्तिनापुर और कुरूक्षेत्र से संजय ,विदुर ,कृष्‍ण भी पहुंच चुके हैं ,और सरयू की शांत धाराओं में पेंच ,तर्क ,नीति की भँवरे पड़ रही है ।अब अवध ही नहीं हस्तिनापुर की गद्दी का भी निर्धारण सरयू ही करेंगी ,पर पता नहीं सरयू को खुशी क्‍यों नहीं है ,उसकी दूधिया रंगें रक्तिम हो रही है ।इन धाराओं में अदृश्‍य हाथें दिख रही है ,ये बलिष्‍ठ हाथे हैं ,जिनकी नसों और मांसपेशियों से खून की लकीरें स्‍पष्‍ट दिख रही है ,ये थामने वाली हाथे नहीं हैं ,ये नाव चलाने वाली हाथें भी नहीं है  ।इन हाथों में रखे सामानों का क्रम अस्‍त-व्‍यस्‍त है ,कभी चाकू ,कभी झंडा ,कभी तलवार ,कभी जमीन का नक्‍शा ,कभी हाथ उठते हैं सिग्‍नल की तरह ,कभी संकेत देते हैं ,धाराओं के दिशा को मोड़ने वाले ,कभी चुटकियों के बजते ही सरयू का पानी खतम हो जाता है ,कभी ईशारों से ही सरयू में उबाल पैदा किया जाता है ।इन हाथों के संकेत दूर तक जाते हैं ,शायद दुनियाभर के घुड़सवार इंतजार कर रहे हैं ।संकेत मिलते ही वे सरयू की तरफ कूच करेंगे ।सरयू के प्राण अब इन्‍हीं हाथों में है ,सरयू इन्‍हीं हाथों के सहारे देश के नदियों से मिल चुकी है ।देश की नदियां आपस में नहीं जुड़ी ,पर सरयू जुड़ चुकी है ,सरयू देश के बाहर की नदियों से भी जुड़ चुकी है ।



अयोध्‍या के राजा अपनी ही राजधानी में अठारह ताला और उन्‍नीस फाटक के अंदर बंद हैं ।जाहिलों की भीड़ उन्‍हें घर देना चाहती थी ,और इक्‍कीस साल के लिए खुले आसमान में कैद कर दिया ।अवधेश जिन्‍हें किराये की बिजली से चमकाया गया है ,कभी गुजराती शामियाना तो कभी सिंधी शामियाना में ठंडा ,गरमी,बरसात गुजार रहे हैं ।पूरे ब्रह्माण्‍ड का पोषण करने वाले पंडों के हाथ से मिश्री ,मूंगफली खा के समय काट रहे हैं ,त्रिलोक की रक्षा करने वाले श्री राम की सुरक्षा में पांच सौ से ज्‍यादा रायफलधारी लगाए गए हैं ,इतना ही नहीं महिला सुरक्षाकर्मी भी विष्‍णु की सुरक्षा में लगे हैं ।ये महिलाएं अपनी सुरक्षा ,सूचिता को बनाए रखकर भगवान की भी रक्षा कर रही हैं ।अपने घर-परिवार से दूर ये महिलाऍं भगवान की सुरक्षा को लेकर चौकस हैं ।चौबीस गुणे सात ही नहीं ,उन तीन दिनों में भी ,जिन दिनों के लिए वे अपवित्र घोषित कर दी गई हैं ,वे सतर्क हैं ।इन महिलाओं ने भगवान ही नहीं उन भक्‍तों को भी माफ कर दिया है ,जो महिलाओं की पवित्रता को लेकर ज्‍यादा चिंतित रहते हैं ।


                       और राम कई बार अयोध्‍या त्‍यागे ।कभी अध्‍ययन के लिए तो कभी पिता के दिए वचन को पूरा करने के लिए ।एक बार बुंदेलखंड के ओरछा भी चले गए ।एक बार सीता को वापस लाने और पता नहीं कब-कब ।उन्‍हें अयोध्‍या से बाहर जाते लोगों ने कई बार देखा है ।बाल्‍मीकि और तुलसी जो भी कहें बहुत ज्‍यादा उत्‍सव उनके लिए कभी भी सगुण नहीं रहा ।1992 ईसवी के मेले में पता नहीं राम ने क्‍या निश्‍चय किया ,परंतु मुझे तो नहीं लगता कि हजारों सुरक्षाकर्मियों से घिरे उस छोटे स्‍थान में भगवान हैं भी ।संगीनों की आमद भगवान को छोटा साबित करने के लिए पर्याप्‍त तो है ही आदमी को  और इतिहास को भी छोटा साबित करता है ।

                                  मुझे पता नहीं अयोध्‍या में इतिहास के साथ रहूं कि विश्‍वास के साथ रहूं । ये महल और मंदिर जो तीन-चार सौ साल से ज्‍यादा पुरानी नहीं है ,पुरातत्‍व के तर्क पर बहुत ज्‍यादा मजबूत नहीं है ,पर सरयू की उपस्थिति इतनी प्रामाणिक और विश्‍वसनीय है कि इतिहास और विश्‍वास दोनों को एकरूप कर देती है ।सीता की रसोई ,लक्ष्‍मण का घर ,मंथरा का निवास आदि कई नामकरण पुरातत्‍व की बजाय पुराण से संदर्भित है ,कुछ -कुछ पु‍रोहितवाद से भी ,परंतु आम भारत की इनके प्रति आस्‍था देखते ही बनती है ।किसी भी इतिहास को निरा तर्क से खंडित करने का साहस इनके प्रति नहीं हो सकता ।यह आस्‍था का इतिहास है ,और यह 'मैटर' को सीमित करता है ।परंतु इन आस्‍थाओं की एक सीमा होनी चाहिए ।आस्‍थाऍं देश ,समाज और मानवता को खंडित करने का प्रयास करें तो इनकी धुलाई-पोछाई और फिर से रँगाई होनी चाहिए,पर कौन रंगेगा इनको ।

                                          और राम जब-जब अयोध्‍या से बाहर गए ,जो सबसे दृढ़ और निर्मल स्‍मरण था वह सरयू से ही संबंधित था ।सरयू की निर्मल और शांत धारा वे कभी भी भुला नहीं पाए ।इसी तट पर उनका शैशव और बचपन था ।मित्र थे ,गुरू थे ,मिथिलानी के साथ के वे समय ,जिन्‍हें धरती के जिस कोण रहे ,ह्रदय में रखे रहे ।अवध के किसानों की सहजता और दृढ़ता हरदम शक्ति के रूप में उनके साथ रही ।राम जब-जब अयोध्‍या में रहे ,सरयू और अवध शांति और समृद्धि के समरूप हो गए ।परंतु सरयू के जीवन में शांति कम ही रही है ।आज फिर सरयू अशांत था ,देश के विभिन्‍न नदियों ,नालों के जल सरयू में आ रहे थे ,सरयू का कछार ,पेटी और फिर छाती भर गया था ।अब पानी छाती से ऊपर बह रहा था ।यह सगुन नहीं था ,अवध के लिए और देश के लिए भी ।

Saturday 6 July 2013

ट्रांसफर वाला सालाना ऊर्स

ये हैं ट्रांसफर के जायरीन ,बढ़ रहे हैं अपना चूड़ा-सत्‍तू बांध के ।कोई बस से ,ट्रेन से ,कोई अपने वाहन से ।यात्रा गांव से तहसील की ओर ,तहसीलों से जिला मुख्‍यालय और जिला मुख्‍यालय से राजधानी की ओर ।ये पचास साल पहले के गंगास्‍नानार्थियों से भी गए गूजरे हैं ,कोई गाय का गोबर छू रहा है ,कोई मोगलाही बाबा को मुर्गा चढ़ा रहा है ,कोई पान और माछ से सगुन बना रहा है ,और जोशी जी को तो ज्‍योतिषी ने कह दिया था कि गिलहरी का गोबर छू के ही यात्रा प्रारंभ करें ,सो वे शहर के जंगल और पार्क में गिलहरी ढ़ूंढ़ रहे हैं ।पहले के दो दिनों में तो सफलता नहीं मिली है ,पर तीसरे दिन पार्क के कर्मचारी गफूर मियां ने खास टिप्‍स दी है कि गिलहरी बस सुबह और शाम को ही दिशा-मैदान पर निकलते हैं ,सो जोशी जी ने भी टार्गेट पर ध्‍यान दिया है ,और आज वे अपने इकलौते बेटे और नौकर के साथ ही आऐंगे और मिशन पूरा करके ही लौटेंगे ।सबसे जो महत्‍वपूर्ण है कि देश की सर्वोत्‍तम नीतियों में से एक धर्मनिरपेक्षता का पालन पूरी तरह से हो रहा है ।डॉ0 ब्रह्मदेव शुक्‍ल मोगलानी बाबा को मुर्गा चढ़ा रहे हैं और मो0 साजिद पैदल वैद्यनाथ धाम जाऐंगे ।वाह रे हिंदुस्‍तान का सेकुलर रिवाज और गंगा-जमुनी तहजीब ।


पूरे प्रदेश में ट्रांसफर खतम होने वाले हैं ,तो हमारे विभाग में अब शुरू होने वाला है ।मतलब औरों के वार्षिक चक्र से अलग है हमारा वार्षिक चक्र ।मानो हमारे बच्‍चों के लिए हाकिमों ने स्‍कूल में स्‍थान सुरक्षित रखबाया है ,मानो हमारी यात्रा बरसात की किच-किच में ही अपने मुकाम पे पहुंचती है ,और हमारी विदाई पे लोग रोते नहीं ,साथी मूंछ पिजाते हैं ,अ‍धीनस्‍थ आश्‍वस्‍त होता है 'स्‍साला नकचढ़ा गया जिला से 'और अधिकारी ये बतियाते छिपाते नहीं कि 'मैं चाहता तो रोक लेता उसे ' ।जो भी हो दलाल जिला से लेकर राजधानी तक फैल गए हैं ।आपके शहर में तो वे हैं ही ,जो पिछले कई महीनों से आपसे पूछ रहे हैं ,फिर आपकी पत्‍नी को भी कनविंस करने का प्रयास कर रहे हैं 'भाभी जी कहां ठीक रहेगा ' ,'बच्‍चों के स्‍कूल के लिए ये ठीक रहेगा '  ।और पता नहीं स्‍टेशन से ही दललबा सब पीछे लगा हुआ है ,विधान सभा मार्ग ,सचिवालय के सामने वाले सड़क पर भी कई सफेदपोश ,कृष्‍णवस्‍त्र धारक ,पॉकेटमार और सिनेमा टिकट का ब्‍लैक मार्केटर अपने अपने अंदाज से आपसे पूछता हुआ फिर आपके जेब को और आपको चेक करता हुआ ।


आप किसी गफलत में नहीं रहे ।ये जरूरी नहीं कि सफेद पोश और वह काला कोट धारी ही आपको मंजिल तक ले जाए ,वह पॉकेटमार भी कम धांसू नहीं और कुछ साहेब लोग पॉकेटमारों को ज्‍यादा पसंद करते हैं ,क्‍योंकि पॉकेटमार आपसे ज्‍यादा मोल-तोल करते हुए उनको ज्‍यादा से ज्‍यादा दिलबाता है ,और सफेदपोश जल्‍दी में रहता है ,और उनका हिस्‍सा भी कम होता है ,वह बात हरदम मुख्‍यमंत्री और मंत्री का ही करेगा ,और आपके सामने भी किसी का फोन आएगा तो एकदम चौकस होके कहेगा 'बाद में बात करिए अभी तो प्रमुख सचिव से बात चल रही है '   ।मूंछ वाला ,बिना मूंछ वाला ,रीढ़ वाला ,बिना रीढ़ वाला ,दिमाग वाला ,बिना दिमाग वाला भी कोई भी हमारा ट्रांसफर करा सकता है ।सबकी अपनी पहुंच है ,अपना रेट है ।सब कोई आश्‍वस्‍त कर रहा है ।अब आपके विवेक पर है ,रहने और जाने के रिस्‍क को तौलते हुए जल्‍दी उन्‍हें बता दीजिए ,और आप भी अपना जेब ,दिल ,जुबान को चेक करते हुए उन्‍हें बता दीजिए ।वे बड़े महत्‍वपूर्ण मिशन पर हैं ,उनका समय मत खाईये ,उनका दिमाग मत खाईए ।वे जो बता रहे ,मूक होकर ग्रहण करें।हमारे एक मित्र 'संशयात्‍मा विनश्‍यति' कहकर उनका दिमाग और चढ़ाते हैं ।लेकिन जब कोई बाजार में है तो क्‍यों न ठोक बजाकर ही खरीदे ।अब वे वाराणसी के नाम पर चंदौली और फैजाबाद के नाम पर अयोध्‍या कर देंगे तो आप कहां कहां मुंह दिखाऐंगे ,किस किस से आपबीती बताऐंगे और बताकर ही क्‍या कुछ कर लेंगे ।एक रस्‍ता ये भी है कि चुपचाप जाके बड़े साहेब की गोद में बैठ जाईए और उनके झोले के निकट अपना पर्स रख दीजिए ,फिर वे जितना मन हो निकाल लेंगे ,और आपके मन की जगह पर आपको दे देंगे ।और जब एक ही जगह पर आपही की तरह दो कंपिटेंट लोग हो ,तब साहेब के दाढ़ी को सहलाईए ,उसमें इत्र लगाइए ,उन दाढि़यों पर कोई शेर कहिए।


                                                                          यदि शेरों से काम नहीं चले तो रोईए,झूठ बोलिए कि पिता की तबियत खराब है ,और जिस अस्‍पताल में ईलाज करानी है ,वह इसी शहर में है ।यदि रोने से भी काम न चले तो साहेब के घर चले जाईए ,साहेब की ही नहीं उनकी बेगम का भी पैर पकड़ लीजिए ,क्‍या पता वहीं काम बन जाए ।ध्‍यान दीजिएगा साहेब के बेगम का पैर पकड़ते वक्‍त नफासत में कोई कमी न हो ,कोई शेर वेर पढ़ने की गलती मत कीजिएगा ,हां जितना मन होगा रोईएगा ,थोड़ा गाकर ,थोड़ा चिल्‍लाकर ,कुछ भर्वल भी आल्‍हा की तरह ।यदि बेगम पसीझ गई तो फिर समझ लीजिए आपका काम सस्‍ता भी होगा और अच्‍छा भी ।फिर अगली मीटिंग आप जब आए तो यह कहते हुए कि मेरे क्षेत्र का प्रसिद्ध आईटम है एक-दो साड़ी जरूर लाईए ।वैसे ये कोई अनिवार्य आईटम नहीं है ,जितनी मैडम उतनी पसंद ।सो अपना सारा ध्‍यान मैडम की पसंद पर एकाग्र करिए ।

अब इधर देखिए सब बुद्धि रंजन की तरह बुद्धिमान तो है नहीं कि जाते हैं राजधानी तो बताते हैं कि जा रहे आजमगढ़ ।सब उनकी तरह धैर्यवान भी नहीं है कि कितना भी हिचकोला लगे डकार तक नहीं निकालेंगे ,हम लोग तो पहली बार बस पर चढ़े यात्री की तरह थे ,जो बस खिसकी और हम लोग लगे आंख-नाक मूनने ।विनय जी आऐंगे और आपकी पेट से सबकुछ निकलबा लेंगे ,वे भी कुछ बोलेंगे ,लेकिन वह आपके काम का नहीं होगा ,वह उनके द्वारा पहले से ही सोचे गए पार्ट और डायलॉग का एक हिस्‍सा होगा ।और वे वहीं करेंगे जो बोलेंगे नहीं ,आज तक यही हुआ है ।वे बड़़े दिमाग वाले आदमी हैं ,सबको अपने ही ग्रूप का मनबाने का नौटंकी करते हुए ,वे कम ही लोगों के हैं ।वे उन सबके हैं ,जिनका कोई विकल्‍प उनके पास नहीं है ,परंतु वे आजकल सबसे पूछ रहे हैं कि ट्रांसफर में इस साल कहां जाना चाहते हैं ।

                                                       काम कराने की कोई मानक विधि नहीं है ,कोई मानक माध्‍यम भी नहीं है ,कोई मानक राशि भी नहीं है ,कोई खास देवता एवं कोई स्‍पेशल मंत्र भी नहीं है ।किसी मंत्री ,विधायक की शरण लीजिए ।वे आपका काम कराऐंगे ,लेकिन चिट्ठी लिखाने की गलती मत कीजिए ।अइसन अइसन दू सौ चिट्ठी ई सचिवालय में डेली आवत हई ।विधायक जी कहेंगे कि 'अपना भाई है ' या फिर 'निकट संबंधी है ' ।अब आपके काम में कुछ वेट है ।अब फिर इतिश्री समझने की गलती मत कराईए ।साहेब से मिलिए तो विधायक की बदतमीजी के लिए गलती मानिए और उनको आश्‍वस्‍त करिए कि 'मेरी चिंता को देखते हुए पिता से नहीं रहा गया और ये गलती हो गई ' ।अब क्षमा मांगने की पूरी नौटंकी करते हुए अपना पर्स खोल दीजिए ।इंशाअल्‍लाह चाहेंगे तो काम जरूर बन जाऐगा 



यदि काम यहां भी नहीं बनता है तो फिर इस मूलमंत्र पर आईए कि साहेबबा का चाहत है
? कोई खास गहना,कोई खास शूट ,किसी खास तरह की कोई बात ।थोड़ा दिमाग पे जोर डालिए ई ससुरा चाहत का है ?
कोई औरत कोई मरद कोई आशीर्वाद कोई जन्‍तर कोई टोना टोटका ।यदि समय मिले तो उसे भालू और हकीम से जरूर फूंकबा दीजिए । कभी-कभी भालू के फूंकने से पतला चीज भी मोटा दिखने लगता है 
!शायद भालू के दांत और मुंह से इतिहास का अंत हो जाता है ,और हकीम के दांत और मुंह की गंदगी से विश्‍वास का रास्‍ता उत्‍तरआधुनिकता का संकेत करता है ।


                                                                             अभी तो हाकिम का कमरा भी सजा होगा ,उन्‍हीं का क्‍यूं रामविजय बाबू और श्‍यामविजय बाबू भी मजे में होंगे ।उनके टेबुल पर ढ़ेर सारी फाईलें ,और टेबुल के नीचे लस्‍सी ,नमकीन के ढ़ेर सारे निशानियां मौजूद होंगे ,जिन्‍हें चपरासी भी साफ नहीं करता होगा ,ताकि कोई भी आनेवाला शऊर न भूले ।रामविजय ट्रांसफर की सूची में हर अनिच्‍छुक का नाम दिखाता होगा ,ज‍बकि ट्रांसफर चाहने वालों से भर मुंह बात भी कैसे कर पाएगा ।चाहने वाले के लिए 'कैसे होगा  ,बड़ा मुश्किल है ,बड़ी ही टाईट सिचुएशन है ,बड़ा लेट कर दिए 'जैसा लतीफा निकालता होगा ,और नहीं चाहनेवालों के लिए भी ऐसे ही वाक्‍यों की महा-श्रृंखलाएं