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Saturday, 4 June, 2011

रात सवा ग्‍यारह का ट्रेन

रात सवा ग्‍यारह की ट्रेन
तडके चार बजे उतारती है मुजप्‍फर पुर
मात्र छह घंटे में पत्‍नी और बच्‍चों से मिलने की संभावना
जितनी ही गुदगुदाती है
उतना ही दुतकारता है
अहं का विवेक
क्‍या वह फोन नहीं कर सकती है
परास्‍त करता है तर्क कि
कल ही तो मॉ को बोले हो कि अभी घर नहीं आऐंगे
पहाड की तरह दिखने लगते हैं विभाग के अधिकारी
पिछले महीने ही तो छुटटी लिए हो
निरूत्‍तर कर देता है
सास ससुर की चालाक प्रश्‍नावली
दीवाल घडी की निस्‍संगता व मोबाइल फोन की चुप्‍पी से खतम होता है
एक और युद्ध
बैग थका है पहले ही घर जाने की कल्‍पना से
उसका खुला हुआ मुंह अपलक
हमको भी डरा रहा है ।
तीन सौ किलोमीटर की दूरी बढ रही है
गणितीय सूत्रों की परवाह किए बिना
अप्रारम्‍भ यात्राओं की कहानियां बढ रही है ।

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