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Monday 1 August 2011

अमन के राग की खोज में


साल हजारों पहले

आर्कमिडीज ने हाथ भर की लाठी से

सरकाया था धरती को

तब यूं ही नजर पड गयी उसकी

सिंधु के बहुरंगी घाटों पर

वह किताबों गानों बोलियो मूर्तियों में खोने लगा

उन रंगों पर कई दावे थे

बोलियों में था जनपद का स्‍नेह

मूर्तियों के साथ इतिहास बोलता था

केवल प्रसिद्धि का गुरूत्‍व ही नही

धन्‍यवाद का ज्‍वार भी था

सिन्‍धु बांट रही थी

हडप्‍पा,गालिब फैज को
लोग डूब रहे थे कालिदास के श्‍लोकों में

बॉट रहे थे घर उनका

महाकवि कभी कश्‍मीर कभी मालवा मिथिला मे जनम ले रहा

विद्यापति के पास मैथिल बंगाली असमी

खुसरो के पास जनम रही थी हिंदी उर्दू जुडवा बहनें

कमजोर था पैमाना विभाजन का

जातियां स्‍नेह से सराबोर थी

शक हो तो पूछिए कामिल बुल्‍के से

वह मानस पर लिखेगा

या फिर काफिर मुहम्‍मद रफी से

जिसके भजन सबसे मशहूर हैं

वैसे भी ईद के अच्‍छे गाने तो लता ने ही गाए हैं

अमन का यह राग कई बार गाया गया

कभी शमशेर ने

किसी यतीन्‍द्र मिश्र ने भी
राग जारी है
कभी द्रुत कभी विलम्बित

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