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Monday 5 December 2011

नये सदी की कवयित्री

नयेसदी के दूसरे दशक में महिला कवयित्रियों की कविता:एक पाठक की नजर में



Þ बेटियॉ नहीं लिखतीं
मॉओंपर कभी कोई कविता
मॉके अनकहे दु:खों का एहसास
घुलाहोता है उनकी रगों में
जैसेखून में प्‍लाज्‍मा
मिलाहोता है उन्‍हें
वहींसब कुछ संस्‍कार और
परम्‍पराके नाम पर
जिसेभोगती हैं वे
बचपनसे जवानी तक मायके में  ß
(आशाप्रभात ,वागर्थ ,जून 2011)



सीतामढ़ीकी ये गुमनाम लेखिका कवयित्रियों के बिल्‍कुल अलग जमीन की बात कर रही हैं ।स्‍त्रीऔर मॉ पर लिखी अनगिन महत्‍वपूर्ण और कुकुरमुत्‍ता टाईप कविताओं के बीच आशा अच्‍छीकविताओं की उम्‍मीद जगाती हैं ,जब वह कहती हैं



 Þबेटियॉ लिख ही नहीं सकती
बेटोंकी तरह
मसालापिसती मॉ के कान की
झुलतीबालियों के रिद्म पर
आटागूंधती उनके हाथ की
चूडि़योंकी खनक परß



कविताकी निष्‍पत्ति भी उतनी ही कवित्‍वपूर्ण है ।किसी लीक पर चलने की बजाय यह नया रास्‍ताबनाती है




Þबेटियॉ सिर्फ तमाशाई नहीं होतीं
नहींदेखती रहती उन्‍हें
जानवरोंकी तरह खटते पटते
जिन्‍दगीतमाम करते
बेटियॉशरीक होती हैं बराबर
उनकेदु:खों ,संघर्षों में
इसलिएलिखना चाहती हैं उन पर
औपन्‍यासिककहानियॉ,
विरासतमें मिली
यातनाओंजितनी बड़ी    ß



इसीप्रकार निर्मला पुतुल (दुमका) हैं ,जिनके पास न केवल जीवन का प्रचुर अनुभव है,बल्कि कहने का अंदाज भी




Þजरो सोचो ,कि
तुममेरी जगह होते
औरमैं तुम्‍हारी
तोकैसा लगता तुम्‍हें
कैसालगता
अगरउस सुदूर पहाड़ की तलहटी में
होतातुम्‍हारा गॉव
औररह रहे होते तुम
घासफूस की झोपडि़यों में
गाय,बैल,बकरियोंऔर मुर्गियों के साथ
औरबुझाने को आतुर ढि़बरी की रोशनी में
देखनापड़ता भूख से बिलबिलाते बच्‍चों का चेहरा
तोकैसा लगता तुम्‍हेंß
(नयाज्ञानोदय ,सितम्‍बर 2010)



नयीसदी में सुधा अरोड़ा जैसी पुरानी पीढ़ी की कवयित्री भी हैं ,जिनके पास अनुभव तो है,परंतु अपना शिल्‍प नहीं ।




Þअकेली औरत नींद को पुचकारती है
दुलारतीहै
पासबुलाती है
परनींद है कि रूठे बच्‍चे की तरह
उसेमुंह बिराती हुई
उससेदूर भागती हैß
(कथन,अक्‍तूबर दिसंबर2011 ,सन्‍नाटे का संगीत )



नयीकविता की कहन और शैली को अपनाकर भी सुधा अरोड़ा अपने लिए कोई मुकम्‍मल शिल्‍प  गढ़ नहीं पाती है ।अकेलापन और स्‍त्रीजीवन कीविवशताओं पर ढ़ेर सारा चर्चा के बावजूद वे कविता के मर्म को स्‍पर्श भर करती है।ह्रदय और मस्तिष्‍क को झकझोड़ने वाली कविताई यहॉ मौजूद नहीं है



Þअकेली औरत
कभीनहीं भूल पाती
जाड़ेके वे ठिठुरते दिन
औरठंड से जमीं रातें
जबप्‍यार को देह से बॉटने के बाद
बगलमें लेटे पति के
शुरूआतीखर्राटों की
धीमीसी आहट सुनकरß
(कथनका ही उपरोक्‍त अंक,भीतर बजती कई रातें )



विपिनचौधरी(हिसार) के यहॉ यह दुविधा नहीं हैं ।वे अपने कथ्‍य
के अनुकूल शिल्‍प का चयनकरती हैं



Þयह पुलिया जाने कब से है यहॉ
औरपीपल के नीचे बैठा मोची भी
नपेड़ की उम्र से
मोचीकी उम्र का पता लगता है
नमोची की उम्र से पेड़ का
औरन पानी का जो पुल के नीचे
बिनालाग लपेट बहता हैß
(वागर्थ,नवंबर 2007 ,पुलिया पर मोची)
Þ


इसी कविता में आगे विपिन कहती हैं

पुलका पानी जरूर कुछ कम हो गया है
परजिंदगी का पानी
आजभी उस मोची के
भीतरसे कम हुआ नहीं दिखता
शहरका सबसे
सिद्धहस्‍तमोची होने का
अहसासतनिक भी नहीं है उसे
हजारोंकारीगरों की तरह
उसेहुनर को कोई पदक
नहींमिला
बल्किकई लोग तो यह भी सोच
सकतेहैं
कियह भी कोइ हुनर हैß



गीतादूबे की कविता सिंदूर में भी सिंदूर एवं मंगलसूत्र को पुरूषप्रधान समाज के अस्‍त्रके रूप में देखा गया है ।(वागर्थ ,नवंबर 2007) इसी तरह पूजा खिल्‍लन की कविताअपरिभाषित तथा वत्‍सला की कविता स्‍त्री और घोड़े बेहतर शिल्‍प की तलाश को जरूरीमानती है ।(हंस ,नवंबर,2011)ज्‍योत्‍सना मिलन की कविता (उतनी देर ,कथादेश ,जून2011) भी स्‍त्री और मॉ के प्रसंगों का चुनाव करती है ,पर प्रभावकारी कविताई केबिना ।इसी अंक में धनबाद की उमा अपनी कविता लड़की में स्‍थाई प्रभाव छोड़ती है



Þअपनी नागरिकताओं से वंचित
वहनहीं बोल पाती अपनी जबान
अपनीहॅसी नहीं हंस पाती
कबकाभूल चुकी है अपना रोना
अकेलेमें खुद को खटखटाकर
खौफनाकगलियों से गुजरती है वहß



यहीसफलता(प्रभाव की दृष्टि से) चन्‍द्ररेखा ढडवाल को (वे सोच रहे हैं ,हंस ,जनवरी,2011) में मिलती दिखती है

Þतुम मत सोचो
वेसोच रहे हैं
सृष्टिके पहले दिन से
निरंतरß



हंस,मार्च 2011 में पूनम सिंह भी अपनी कविता (जहां खत्‍म होता है सब कुछ) को प्रेम कीस्‍मृति ,साथ के संघर्ष और निर्विकल्‍प चयन के बेहतर रेखाओं से मुकम्‍मल बनाती हैं



Þआज समय के किसी अलक्षित कोने में
प्रेमके शोकगीत की तरह
औंधापड़ा है सितार
आड़ीतिरछी कई लकीरें काट गई है
सीधीसरल रेखा में परि‍भाषित
उसप्‍यार कोß



रंजनाजायसवाल अपनी एक कविता(शराबखाने में स्‍त्री ,हंस ,दिसंबर 2010)में स्‍त्री स्‍वतंत्रताको नये रूपक में देखती हैं



Þशराबखाने के इतिहास में
एकपहली घटना थी
एकस्‍त्री ले रही थी
शराबकी चुस्कियां
सबसेबेपरवाह
थकीहुई थी
शराबखानेके स्‍थायी ग्राहकों में
खलबलीथी
विदेशीब्रांड है देशी की भला क्‍या औकाम
रूपरंग में एंग्‍लोइंडियन लगता है
नशाभी है या सिर्फ दिखता हैß



रंजनाइसी अंक में अपनी दूसरी कविता(मेरा स्‍लोगन) में तात्‍कालिकता से अतिक्रांत हैं

Þपुरूष ने स्‍त्री को कहा  वेश्‍या
मुझेअजीब न लगा
लेखकने लेखिका को कहा छतीसी
फर्कन पड़ाß



स्‍पष्‍टहै कि कोई तात्‍कालिक घटना या प्रसंग जिन काव्‍यात्‍मक स्थितियों में महान कविताबनती है ,वह इस कविता में अनुपस्थित है ।
स्त्रियांमात्र स्‍त्री और भेदभाव को ही रखकर कविता लिख रही ,ऐसी बात नहीं ,हंस के अगस्‍त2010 अंक में वर्तिका नन्‍दा एक कविता(वो बत्‍ती ,वो रातें)में बचपन को काव्‍यात्‍मकअंदाज में देख रही है



Þबचपन में
बत्‍तीचले जाने में भी
गजबका सुख था
हमचारपाई पे बैठे तारे गिनते
एककोने स उस कोने तक
जहांतक फैल जाती नजर
हरबार गिनती गड़बड़ा जाती
हरबार विश्‍वास गहरा जाता
अगलीबार होगी सही गिनती
बत्‍तीका न होना
सपनोंके लहलहा उठने
कासमय होताß



पंखुरीसिन्‍हा वागर्थ के फरवरी 2008 अंक में अपनी तीन कविताओं(नई औरत ,उम्र और पालतूजानवर )में अच्‍छे विषय का चुनाव करते हुए कविता की लीक पकड़ती हैं ,परंतु नारीवादकी अभिधा उनको जकड़ लेती है ।
किरणअग्रवाल भी अपनी एक कविता(भरी हुई बस में ,हंस,अप्रैल 2011) में नारीवाद से टकरातीहैं ,परंतु स्‍वप्‍नजीविता उन्‍हें अभिधा की परिधि से दूर करती है



Þमेरा बच्‍चा
जोअभी मेरे पेट में ही है
औरअभी से ही संघर्ष करना सीख रहा है जिंदगी से
भरीहुई बस में
कराहउठता है और भींच लेता है अपनी मुट्ठियां
जबकई अदद हाथ निगाहें कई अदद
मेरेजिस्‍म को नोचने के लिए बढ़ती है मेरी ओरß



नयेसदी की कविता की जरूरतों को प्रत्‍यक्षा भी अच्‍छी तरह से समझती हैं ,तथा पाखी केमई 2011 अंक में अपनी चार कविताओं से इस जरूरत को पूरा भी करती हैं ।वो औरतें नामककविता में वे अपने अनुभव की उपमाओं के द्वारा कविता की नयी सीढ़ी बनाती है



Þवो औरतें प्रेम में पकी हुई औरतें थीं
कुछकुछ वैसी जैसे कुम्‍हार के चाक से निकले कुल्‍हड़ों
कोआग में जरा ज्‍यादा पका दिया गया हो
औरवो भूरे कत्‍थई की बजाय काली पड़ गई हों
याकुछ सुग्‍गे के खाये ,पेड़ों पर लटके कुछ ज्‍यादा डम्‍भक
अमरूदकी तरह
जिसेएक कट्टा खाकर फिर वापस छोड़ दिया गया हो
उसकेउतरे हुए स्‍वाद की वजह से
वेऔरतें डर में थकी हुई औरतें थी
कुछकुछ चोट खाये मेमनों की तरह
जिबहमें जाते बकरियों की तरहß



मंजरीश्रीवास्‍तव कविता ,इतिहास और प्रेम को एकरूप करते हुए नया रास्‍ता बनाने में सफलहुई है ।आलोचना,जुलाई सितम्‍बर2010 की एक कविता(एक कविता पाब्‍लो नेरूदा के लिए)में वह नेरूदा को पूरी जिंदादिली से याद करती हैं



Þशुरू हुई तुम्‍हारी कविताएं
एकतन में
किसीएकाकीपन में नहीं
किसीअन्‍य के तन में
चॉंदनीकी एक त्‍वचा में
पृथ्‍वीके प्रचुर चुम्‍बनों में
तुमनेगाए गीत
वीर्यके रहस्‍यमय प्रथम स्‍खलन के निमित्‍त
उसमुक्‍त क्षण में
जोमौन था तब ।
तुमनेउकेरी रक्‍त और प्रणय से अपनी कविताऍ
प्‍यारकिया जननेन्द्रियों के उलझाव से
औरखिला दिया कठोर भूमि में एक गुलाबß



मंजरीइसी काव्‍यात्‍मकता से इजा़डोरा(आलोचना का वही अंक) तथा कुंवर नारायण(हंस ,अप्रैल,2010)को भी याद करती हैं ,तथा यह स्‍मृति किसी भी दृष्टि से रस्‍मी नहीं है ।
परम्‍पराऔर आधुनिकता का संघात अपनी पूरी शक्ति एवं सौन्‍दर्य के साथ अनामिका में मौजूद है।इस एक मुट्ठी संघात में जितनी काव्‍य उर्जा यहां विमुक्‍त होती है ,संभवत: अन्‍यत्रनहीं ।
तद्भव(अंक 18 ,जुलाई 2008 ) में उनकी तीनों कविता(तलाशी ,मृत्‍यु और ओढ़नी)उनके कविताके स्‍वभाव को स्‍पष्‍ट करती है ।



Þएक एक अंग फोड़ कर मेरा
उन्‍होंनेतलाशी ली
मेरीतलाशी में मिला क्‍या उन्‍हें
थोड़ेसे सपने मिले और चांद मिला
सिगरेटकी पन्‍नी भर,
माचिसभर उम्‍मीद ,एक अधूरी चिट्ठी
जोवे डिकोड नहीं कर पाये
क्‍योंकिवह सिन्‍धु घाटी सभ्‍यता के समय
मैंनेलिखी थी
एकअभेद्य लिपि मेंß



ज्‍योतिचावला अपनी पांच कविताओं(आलोचना ,जुलाई सितंबर 2010)में रास्‍ता बनाने का प्रयासकरती हैं ,परंतु पुराने रास्‍तों पर चलने का मोह उनमें है ।इसीलिए एक कविता(जामुनका पेड़) में वह याद शब्‍द का दो बार और स्‍मृति का भी दो बार चर्चा करती है ।उनकोयह भी कहना पड़ता है कि

Þउस पेड़ से जुड़ी है मेरे बचपन की स्‍मृतियॉß

कलके लिए के नवीनतम अंक(सितंबर दिसंबर 2011)में लीना मल्‍होत्रा की चार कविताएं(बनारस में पिंडदान ,ओ बहुरूपिए पुरूष,तुम्‍हारे प्रेम में गणित था 1 व 2)छपी है ।
लीनाइन कविताओं में प्रेम या पुरूष के प्रेम की पड़ताल करती हैं ,तथा इस तलाश में उन्‍हेंशतरंज की सी चालों तथा रेल पटरी की समानांतर जिंदगी का आभास होता है



Þयह जो दर्द था हमारे बीच
रेलकी पटरियों की तरह जुदा रहने का
मैंनेमाना उसे
मोक्षका द्वार जहॉ अलिप्‍त होने की पूरी संभावनाएं मौजूद थी
औरतुमने
एकसमानांतर जीवन
बसएक दूरी भोगने और जानने के बीचß



इससमानांतर जिंदगी की (अ)संभावनाओं की ओर संकेत तो करती हैं ,परंतु उसके उलझाव औरनरक को देख नहीं पाती है ।



अपर्णामनोज की कविताएं असुविधा ब्‍लॉग(धन्‍यवाद भाई अशोक कुमार पांडेय)पर उपलब्‍ध है,तथा कवयित्री की गहन संवेदनशीलता ,अनुभव के प्राचुर्य तथा शिल्‍प वैविघ्‍य केप्रति जिज्ञासा को स्‍पष्‍ट करने के लिए पर्याप्‍त है



Þमेरे सीतापुष्‍प(आर्किड)
तुम्‍हेंयाद होगा मेरा स्‍पर्श
अपनेकौमार्य को
सुबनसिरी(अरूणाचलकी नदी)में धोकर
मलमलकिया था
औरघने बालों में तुम
 टंक गए थे
तबमेरी आत्‍मा का प्रसार उस सुरभि के साथ
बहचला था
एकबसंत जिया था दोनों नेß



प्रतिभाकटियार की कविता भी असुविधा ब्‍लॉग पर है ,तथा प्रतिभा अपनी बात काफी प्रभावशालीढ़ंग से  रखती हैं
Þउनके पास थी बंदूकें
उन्‍हेंबस कंधों की तलाश थी
उन्‍हेंबस सीने चाहिए थे
उनकेहाथों में तलवारें थी
उनकेपास चक्रव्‍यूह थे बहुत सारे
वेतलाश रहे थे मासूम अभिमन्‍यू
उनकेपास थे क्रूर ठहाके
औरवीभत्‍स हंसी
वेतलाश रहे थे द्रौपदीß



असुविधाब्‍लॉग पर युवा कहानीकार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ भी है ,तथा उनकी प्रेम कविताओं का नयाकोण ही तो कविताई है



Þप्‍यार करना तो
मेरीपहली झुर्री को भी
पहलीरूपहली लट को भी
करना
जोउग आए
आंखोंके नीचे स्‍याही
यादरखना वो रातें
जोइस सफर में हमने
जागके बिताई
कभीन देना प्रेम में गुलाब
यालाल कार्नेशन
देनातो
जड़ोंमें दलदली मिट्टी लिए
कमलदेना अधखिलाß



(कविताओंका एवं कवयित्रियों का चयन हमारी सामर्थ्‍य से सीमित हुई है ।इस सर्वेक्षण मेंमात्र एक दो साल के कुछ पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री को ही ध्‍यान में रखा गयाहै ,तथा इंटरनेट पर उपलब्‍ध सामग्री में भी मात्र एक ब्‍लॉग का ही सहयोग लिया गयाहै ।कई प्रसिद्ध कवयित्रियों का नाम मेरी जानकारी के बावजूद इस लेख में नहीं हैं ,बाद के अधिक व्‍यवस्थित अध्‍ययन में उन्‍हें शामिल किया जाएगा ।पत्रिकाओं का भी ज्‍यादाप्रतिनिधिक आधार उस भावी अध्‍ययन में ही संभव होगा )



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