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Wednesday, 5 January, 2011

द बर्थ

अर्धनारीश्‍वर संपादक के गल चुके 

गर्भाशय से ही ब्‍लाग जन्‍मा

  लाश के पेट के उपर प्रतीकों का गटठर  छाती की तरह उठा था
 हाथ की उंगलियों से कम था बारहमासा
 फुसफुसाता मुंह उसका अस्‍तव्‍यस्‍त भाषा की तरह अस्‍पष्‍ट था
 नथूने में उसके कमसिन कवयित्रियों के याद का गंध था
 जिसकी कविताएं प्रतिमाह छप रही थी
झिलमिलाते आंख के सामने था
लौटाई गई कविताओं के टटके बिम्‍ब
ऐसी ही कहानियों के दर्द 
संपादक के कान में गर्म तेल की तरह घुस रहे थे
 प्रकाशन और पुरस्‍कार की शताधिक अंर्तकथाएं
  डॉक्‍यूमेंटरी फिल्‍म की तरह सादी और उबाउ लग रही थी
  संपादक आज देह त्‍याग रहा था
  उसके पोर पोर से नया कुछ उग रहा था









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