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Tuesday, 7 May 2013

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी : आलोचना का स्‍वतंत्र मान



 यह तय है कि अपनी -अपनी रूचि और अपने -अपने संस्‍कार लेकर वस्‍तु का यथार्थ स्‍वरूप-निर्णय नहीं हो सकता ।कोई एक सामान्‍य मान-दण्‍ड होना चाहिए ।वह मान-दण्‍ड बुद्धि है अर्थात् किसी वस्‍तु ,धर्म या क्रिया के वास्‍तविक रहस्‍य का पता लगाने के लिए उसे अपने अनुराग-विराग या इच्‍छा -द्वेष के साथ नहीं सान देना चाहिए ,बल्कि देखना चाहिए कि देखनेवाले के बिना भी वस्‍तु अपने-आपमें क्‍या है  ?गीता में इसी बात को नाना भाव से कहा गया है ।कभी द्वन्‍द्वों से अपरिचालित होने को ,कभी बुद्धि की शरण लेने को ,कभी 'अफलाशी' होकर कर्म करने को कहा गया है ।समालेाचना का जो ढर्श्रा चल रहा है ,उसमें द्वंद्वों द्वारा परिचालित होने को दोष का कारण तो माना नहीं जाता ,उल्‍टे कभी-कभी उसके लिए गर्व किया जाता है ।अनुराग-विराग,इच्‍छा-द्वेष आदि के द्वारा निर्णय पर पहुंचने को समालोचक गर्व की वस्‍तु समझता है ।

सम्‍मतियों की इस बहुमुखी विरोधिता का कारण है ,वस्‍तु को मानसिक संस्‍कारों के चश्‍मे से देखना और बुद्धि के द्वारा न देखना ।अत्‍यधिक आधुनिक भाषा में कहें तो सब्‍जेक्‍टीविटी देखना ,और ऑब्‍जेक्‍टीवली देखने का प्रयत्‍न न करना ।पर समालेाचक को अपनी लज्‍जा तो छिपानी ही चाहिए ।कुछ समालोचक तो लज्जित होना जानते ही नहीं ।वे हर गली-कूचे में अपनी विशेष राय और अपने सौप्रतिद्वन्‍द्वियों की बात गर्व के साथ सुनाते रहते हैं ।पर कुछ जो शीलवान हैं ,इस बात से शर्मिंदा भी होते हैं और इसी लज्‍जा से बचने के लिए वेदांत से लेकर कामशास्‍त्र तक का हवाला दिया करते हैा ।इन शर्मिंदा होने वाले शीलवानों के कारण समालोचना की समस्‍या और भी जटिल हो रही है ।इन्‍होंने इतने बहुविध शास्‍त्रीय दृष्टिकोण और लोक-शास्‍त्रादि पक्षों का आविष्‍कार किया है -महज परस्‍पर-विरोधी उक्तियों के समाधान के लिए-कि पाठक का चित्‍त र्विा्रांत हो जाता है । ऐसे ही एक प्रकार के समालोचकों ने एक स्‍वतंत्र रस-लोक की कल्‍पना की है ।इनके पास दर्शनशास्‍त्र की व्‍युत्‍पत्ति है और इसीलिए दर्शन की गम्‍भीरता से आतंकित सह्रदय समाज पर इनका सिक्‍का भी बहुत जम गया है ।ये छूटते ही शरीर के दो हिस्‍से कर डालते हैं -शरीर और आत्‍मा ,जड़ और चेतन ।अब चेतन में आइए तो चेतन भी देा ,लोक पक्षात्‍मक और भाव पक्षात्‍मक ।और लोकपक्ष भी दो ,आदर्शवादी और यथार्थवादी .... इत्‍यादि ।इस प्रकार समालोचना का मेघ-मल्‍हार शुरू होता है आर अनभ्र वज्रपात प्राय: ही होता दिख जाता है ।

साभार 'आलोचना का स्‍वतंत्र मान ' ,लोकभारती प्रकाशन






Sunday, 24 March 2013

कबीर की अकथ कहानी(पुरूषोत्‍तम अग्रवाल) पर वागीश शुक्‍ल :साभार 'आलोचना'

चयनित अंश:-
समीक्षाधीन पुस्‍तक की सीमाऍं वही है जो आधुनिक विमर्श की है और जब तक उस आधुनिक विमर्श की जड़ों तक नहीं जाया जाता ,उसकी विसंगतियों की कोई पड़ताल भी सतक के नीचे नहीं जा सकती ।मैं केवल एक उदाहरण दूंगा :यदि कबीर के वर्णाश्रम-विरोध की परख 'ह्यूमन राइट्स' के संदर्भ में की जा सकती है तो उनके जीवहिंसा-विरोध की पड़ताल 'एनिमल राइट्स' के सन्‍दर्भ में क्‍यों नहीं की जा सकती ?यदि इसका कोई और कारण है ,सिवाय इसके कि 'ह्यूमन राइट्स' के लिए कानून बन चुके हैं और 'एनिमल राइट्स' के लिए अभी कानून नहीं बने ,तो वह समझना मेरे लिए सम्‍भव नहीं हुआ ।किन्‍तु कल वे बन भी सकते हैं ।तब ?

प्रारंभिक में कहा गया है कि कबीर यह चेतावनी दे रहे हैं :मेरे ब्रह्मविचार को तुम गीत मत समझ बैठना-'तुम जिन जानौ यह गीत है ,यह तो निज ब्रह्मविचार रे ।' गीत और ब्रह्मविचार में अन्‍तर की यह चेतावनी केवल कबीर ने ही नहीं अश्‍वघोष ने भी दी है ,लेकिन भगवत्‍पाद या कालिदास ने नहीं दी ,और यहीं उस मानसिकता का ,जिसे मैं 'पेगन मानसिकता' कहता हूं ,और उस मानसिकता का ,जिसे मैं 'डि-पेगनाइजेशन की मानसिकता' कहता हूं किन्‍तु जिसका प्रचलित नाम 'दूसरी परम्‍परा' है ,अन्‍तर मौजूद है ।

कालै यास्‍पर्स ने जब यह कहा था कि ईसाइयत के भीतर ट्रैजेडी नहीं लिखी जा सकती और जब फ़ारसी-अरबी के काव्‍यशास्‍त्री लगातार यह घोषणा करते हैं कि इस्‍लाम के भीतर कविता सम्‍भव नहीं है तो वे इस अन्‍तर की ही ओर इशारा कर रहे हैं ।

Saturday, 23 March 2013

धाकड़ मजिस्‍ट्रेट




धाकड़ मजिस्‍ट्रेट वो होता है ,जो मेला ,दंगा और परीक्षा ड्यूटियों में डेली हिसाब करता है ।उसे दिहाड़ी कहने-कहाने का भय नहीं है ,बल्कि 'लेते' वक्‍त एक आत्‍मसंतोष का भाव होता है कि 'कोई फ्री का थोड़े ही ले रहा हूं 'वह मेला में दुकान गिनकर ,दंगा में मूड़ी गिनकर और परीक्षा में एडमिट कार्ड गिनकर लेता है ।अब जैसे कि परीक्षा ड्यूटी है तो प्रति पाली प्रति विद्यार्थी मात्र दस रूपये की दर से हिसाब कर दीजिए ।अब आप सोच रहे होंगे कि इससे तो दोहजार -तीन हजार डेली ही मिल पाएगा ,और यदि अंत में लिया जाए तो लेने के कई नाम है -कोपरेशन के लिए ,नॉन आपरेशन केलिए ,होली सेलिब्रेशन के लिए या फिर सॉलिड ठकुरई कि 'भय बिनु ...' या फिर अचूक ब्राह्मणवाद कि राजा ,ब्राह्मण और देवता के यहां लोग खाली हाथ नहीं जाते हैं ,और लेनदेन के तमाम मॉडल इसी वाद में अंर्तभुक्‍त हैं ।अब आप डेली हिसाब नहीं किए और कहीं हाकिम ने ड्यूटी बदल दी ,तो ये पुराना बनिया/स्‍कूल प्रबंधक आपसे मिलेगा ? और आप कुछ ले पाऐंगे ?।इसलिए जो भी हो 'हस्‍तामलक' की तरह हो 'बाद में मिलना है ' या 'किसी दिन देख लेंगे' वालों को आप दिखा दीजिए कि आप कितने बड़े मजिस्‍ट्रेट हैं ,और नियमों ,अधिनिय और आदेशों का इतना धुर्रा उड़ाइए कि ससुर स्‍कूल सहित उड़ जाए ।ये जो पिछले दिन ड्यूटी बदली है तो स्‍कूल प्रबंधक और मजिस्‍ट्रेट बहनों की तरह रोए ,और आने वाले मजिस्‍ट्रेट के लिए ढ़ेर सारी कथाऍं ,घटनाऍं मौजूद रहे कि 'साहब कितने अच्‍छे थे ' , और 'साहब तो गाना भी गाते थे ' ।अब आपके पास दो ही विकल्‍प है या तो दिहाड़ी की तरह डेली वसूलें या फिर अच्‍छे की तरह गाना गाऍं .........

Sunday, 17 March 2013

कबीर की अकथ कहानी पर :डेविड लॉरेंजन

कबीर की अकथ कहानी पर :डेविड लॉरेंजन के आलेख का एक अंश::::-------


अपनी अकथ कहानी में अग्रवाल शास्‍त्रोक्‍त भक्ति और काव्‍योक्‍त भक्ति का जो नया वर्गीकरण प्रस्‍तुत करते हैं ,वह सामाजिक और धार्मिक प्रतिमानों को कलात्‍मक कसौटी के साथ जोड़ने का प्रयास प्रतीत होता है ।दूसरे शब्‍दों में ,अग्रवाल कवियों की धार्मिक और सामाजिक विचारधारात्‍मक भिन्‍नताओं के साथ ही काव्‍यात्‍मक भिन्‍नताओं पर भी बल देना चाहते हैं ।लेकिन यह बात हर जगह साफ नहीं हो पाती कि अग्रवाल तुलसीदास और सूरदास को किस वर्ग में रखना चाहते हैं ।एक स्‍थान पर वे केवल कबीर और निर्गुणी कवियों को ही नहीं ,बल्कि बस ,आदिकालीन और केशव जैसे रीतिकालीन कवियों को ही बाहर रखते हुए नामदेव ,मीरां ,तुलसीदास और सूरदास को भी काव्‍योक्‍त-भक्ति के अंतर्गत रखते प्रतीत होते हैं (पृ0 343) ।लेकिन कुछ ही पृष्‍ठों के बाद ,लगता है कि अग्रवाल तुलसीदास और सूरदास को काव्‍योक्‍त-भक्ति से बाहर मानते हैं (पृ 350) ।यह रेखांकित करते हुए कि कबीर अपनी भक्ति को स्‍पष्‍ट शब्‍दों में भगति नारदी कहते हैं ,पुरूषोत्‍तम अग्रवाल काव्‍योक्‍त-शास्‍त्रोक्‍त वर्गीकरण के लिए प्रयुक्‍त धार्मिक विशिष्‍टताओं को क्रमश: नारद-भक्ति-सूत्र और शांडिल्‍य-भक्ति-सूत्र की वैचारिक विशिष्‍टताओं से विश्‍वसनीय रूप से जोड़ते हैं ।उनके द्वारा काव्‍योक्‍त कही गई भक्ति ,प्रेम प्रेरित ,उपलब्‍ध दार्शनिक संप्रदायों से स्‍वायत्‍त ,भागीदारी पर आधारित संवेदना है ,जबकि शास्‍त्रोक्‍त-भक्ति से अग्रवाल का आशय पारंपरिक संस्‍कृत शास्‍त्रों पर निर्भर और पारंपरिक धार्मिक सत्‍ता के समक्ष समर्पण की संवेदना से है ।

इन तीन वर्गीकरणों : सगुण-निर्गुण ,वर्ण-धर्मी और अवर्णधर्मी और शास्‍त्रोक्‍त-भक्ति और काव्‍योक्‍त-भक्ति के बीच की भ्रांतियों और उलट-पुलट से बचने का एक सीधा -सा तरीका यह स्‍वीकार कर लेना हो सकता है कि उत्‍तर भारत के भक्‍त कवियों की रचनाओं में धार्मिक,सामाजिक विचारधारात्‍मक और कलात्‍मक अंतर सदा साथ-साथ ही उपस्थित हों ,यह जरूरी नहीं ।दूसरे शब्‍दों में ,संभवत: यह बेहतर होगा कि इनमें सभी कवियों को समानांतर श्रेणियों में रखने पर जोर न दिया जाए ।इस पद्धति से,कबीरकी कविता को निर्गुणी ,अवर्ण-धर्मी और काव्‍योक्‍त वर्ग में रखा जा सकता है ।इसी तरह, तुलसीदास के काव्‍य को ,या कम से कम कुछ भजनों को ,सगुणी ,अवर्ण-धर्मी और काव्‍योक्‍त वर्ग में रखा जा सकता है ।


जिसे पुरूषोत्‍तम अग्रवाल भारत की आरंभिक आधुनिकता का दौर कहते हैं ,उस दौर में ,यानी मोटे तौर पर सन् 1400 से 1650 ई0 के बीच ,उत्‍तर भारत में विकसित हुई भक्ति-संवेदना की आंतरिक भिन्‍नताओं की रोचक तुलना यूरोपीय इतिहास के 1650 से 1790 के बीच के दौर अर्थात् तथाकथित यूरोपीय नवजागरण के दौर की एक विशेषता से की जा सकती है ।कुछ ही दिन पहले ,जोनाथन इस्राइल ने एक बहुत मजबूत तर्क प्रस्‍तुत किया है कि यूरोप में स्‍पष्‍ट रूप से दो नवजागरण हुए थे :स्पिनोजा ,डेनिस दिदरो ,डि हालबाक और थॉमस पेन जैसे बौद्धिकों के साथ जुड़ा रेडिकल नवजागरण ,और जॉन लाक ,वाल्‍त्‍ेयर ,इमैनुअल कांट और एडमंड बर्क जैसे बौद्धिकों के साथ जुड़ा कंजरवेटिव नवजागरण ।अधिक रेडिकल दिदरो और हालबाक के साथ वाल्‍तेयर की तुलना करते हुए ,इनके बीच वैषम्‍य का रेखांकन करने के लिए इस्राइल लिन शब्‍दों का प्रयोग करते हैं ,उनका उपयोग तुलसीदास और कबीर की तुलना करने के लिए भी ,बिना किसी ज्‍यादा फेरबदल के लिए किया जा सकता है


(आलोचना त्रैमासिक 46 वें अंक से साभार : मूल अंग्रेजी आलेख का अंग्रेजी से अनुवाद सुधांशुभूषण नाथ  तिवारी)



17 मार्च जिंदाबाद

इस शहर ने आज पहली बार औरतों का जुलूस देखा ।वैसे तो औरतों की क्रमबद्ध पंक्तियां विष्‍णु यज्ञ या फिर साईं बाबा के जुलूस में निकलती रही है ,जिसे शोभा यात्रा या और भी सुरूचिपूर्ण नाम दिया जाता रहा है ,पर औरतों का जुलूस देखकर शहर को अच्‍छा नहीं लगा था ।शहर तो लड़कियों को डांस करते देख या फिर बिना बुर्का या घूंघट में औरतों को देख चिढ़ जाता था पर ये तो अति थी ।औरतें जुलूस में नाच रही थी ,और औरतों के जागने की बात कर रही थी ,उन्‍होंने आधी आबादी ,भ्रूण परीक्षण ,लड़कियों के शिक्षा ,महिलाओं के अधिकार जैसे विषय पर मनमोहक नारे बनाए थे ,और शहर की शांति भंग करते हुए 'आवाज दो हम एक हैं ' की नारा लगा रही थी ।मेरे एक मित्र ने उनके साड़ी ,ब्‍लाउज की कीमत लगाते हुए कहा कि वे निम्‍न -मध्‍य वर्ग की महिलाएं थी ,कुछ तो स्‍पष्‍टत: निम्‍न वर्ग की लग रही थी ,जो केवल चिल्‍लाने के लिए किराए पर लाई गई थी ।एक मित्र ने उनके चप्‍पलों पर गौर फरमाया ,निष्‍कर्ष यही था कि ये आम तौर पर निम्‍न वर्ग की महिलाएं है ,तथा जुलूस स्‍वत:स्‍फूर्त न होकर प्रायोजित है ।सड़क किनारे की दुकानों पर तथाकथित उच्‍च वर्ग की महिलाएं शांतिपूर्ण आनंद के साथ खरीदारी करती रही ,कॉलेज की छात्राऍं भी मुंह बिचकाते हुए अपने अपने कामों में मगन रही ।कुछ पुलिसकर्मियों के साथ जुलूस आगे बढ़ती रही ,भ्रूण हत्‍या विरोधी नारे गूंजती रही ,पर शायद डॉक्‍टर लोग जुलूस की आवाज को नजरअंदाज करते हुए गर्भपात कराने में बिजी रहे ।जुलूस का आनंद तो शायद तब आता जब ये महिलाऍं हँसिये ,खुरपी से उन डॉक्‍टरों की अँतडि़या बाहर निकाल लेते ,जो बस पुत्रजन्‍म को मैनेज करने के लिए अल्‍ट्रासाउंड और एबार्शन करबाते हैं..............

Saturday, 16 March 2013

डस्‍टबिन

कोई लिखा ,अधलिखा ,कलम से लिखा ,पेंसिल से लिखा ,अपना लिखा ,किसी अधिकारी का आदेश ,अधीनस्‍थों की आख्‍या ,हाईकोर्ट का जजमेंट ,सरकार की रूलिंग ,सहकर्मियों के लूपहोल्‍स के साक्ष्‍य सभी संग्रहित ।फाईल मे ,बिना फाईल किसी डायरी मे ,किसी किताब में ,जो ज्‍यादा पुरानी हो गई तो अटैची में ,जो बहुत पुरानी हो गई तो स्‍टोर रूम में ,और साल दो साल बाद एक दो बंडल गांव में रख दिए ,बाबूजी-मां के पास ।पता नहीं कब किसकी जरूरत हो जाए ,सो किसी कागज को फाड़ते ,कबाड़ी वाले से बेचते ,डस्‍टबिन मे डालते या फिर रद्दी को फेकते वक्‍त हरदम एक डर बना रहा ।एक बार तो पत्‍नी ने डस्‍टबिन में शाम को ही कूड़ा डाल दिया था ,‍पर सुबह को वह एक-एक रद्दी को जोड़ता रहा ।उसकी इस आदत को पत्‍नी भी जान गई थी ,सो हरेक कागज(चाहे कितना भी रद्दी क्‍यों न हो)
को डस्‍टबिन में डालते वक्‍त वह भी पूछ लेती थी 'किसी काम का तो नहीं' ,और यह चिंता ,परेशानी केवल कागजों को लेकर हो ,यह बात नहीं थी ,संबंधों को लेकर भी थी ।घर,परिवार ,किसिम किसिम के दोस्‍त ,दूर-दराज के संबंधी सब कागजों की ही तरह उसके जेहन में ठूसे हुए थे ।बेशक कुछ फेके जाने लायक थे ,पर उसको लगता था कि शायद कुछ काम हो जाए इनका या फिर.............

Friday, 15 March 2013

'आलोचना' : अकथ कहानी प्रेम की

'आलोचना' का यह अंक श्री पुरूषोत्‍तम अग्रवाल की पुस्‍तक 'अकथ कहानी प्रेम की ' के बहाने पुन: कबीर के घर में पैठने का प्रयत्‍न है ।हालांकि शीश काटकर भूमि पर रखके अन्‍दर घर में जाने का साहस कोई बिरला ही कर पाता है ।

                                                                    इस पुस्‍तक ने कबीर को ,कवि कबीर को ,और उनके समय-समाज को फिर से और नए सिरे से गुनने समझने के लिए प्रेरित किया है ।वास्‍तव में हम जिस कबीर को जानते हैं वह संत महात्‍मा या पंथ-मठ-सम्‍प्रदाय वाले कबीर नहीं बल्कि कवि कबीर ही हैं ।भारतीय जीवन में अनेक संत-महात्‍मा हुए होंगे ,जैसे अनेक दार्शनिक और ऋषि भी ,लेकिन लोक और साहित्‍य-समाज ने उन्‍हीं को कंठस्‍थ किया जो मुख्‍यत: कवि हैं ,कबीर-सूर-तुलसी-मीरां या ललदद,बसवण्‍णा,तुकाराम और शाह लतीफ ।यह घटना दर्शन और काव्‍य के आन्‍तरिक सम्‍बन्‍ध को भी प्रकाशित करती है ।


                                                          रवीन्‍द्रनाथ भी कवि और कबीर को ही जानते थे ,रहस्‍यवाद आनुषंगिक था और काव्‍य में ही अनुस्‍यूत ।हरिऔध भी उसी काव्‍य से आकृष्‍ट हुए ।प्रेमचन्‍द की कहानी 'कफन' ,'ठगिनी क्‍यों नैना झमकावै' के बगैर अपूर्ण होती ।नागार्जुन ने कबीर के जन्‍मदिन ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा को अपना जन्‍मदिन माना । त्रिलोचन ,मुक्तिबोध ,भीष्‍म साहनी ,रघुवंश सबने कवि कबीर पर लिखा ।तीन दशक पहले भृगुनन्‍दन त्रिपाठी ने जो कविता पत्रिका निकाली असका नाम रखा 'कबीर' ।और ,कबीर की छह सौवीं जयन्‍ती पर सन् 2000 में भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान ,शिमला में कबीर की कविता पर केंद्रित एक संगोष्‍ठी हुई जिसमें गोपेश्‍वर सिंह और मैंने भी लेख पढ़े जो  'कबीर के मस्‍तक पर मोरपंख 'शीष्‍र्ज्ञक से और फिर 'कवि कबीर' शीर्षक से उसी वर्ष ''सम्‍भव' (सं0 सुभाष शर्मा) और अन्‍य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ ।उसी समय नामवर सिंह का एक अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण लेख कबीर की कविता पर 'हंस' में प्रकाशित हुआ था ।लघु पत्रिकाओं ने ,विशेषकर प्रगतिशील धारा की पत्रिकाओं ने ,कबीर पर लगातार सामग्री दी जिसमें आज से पच्‍चीस-तीस साल पहले 'वसुधा' द्वारा जारी एक पुस्तिका  अभी भी याद है 'कबीर और तत्‍कालीन कृषक समाज' ।यह सब कहने -दुहराने की जरूरत इसलिए है कि हम भूलें नहीं कि लोक जीवन तथा कंठ परम्‍परा के साथ-साथ हिन्‍दी साहित्‍य समाज में कबीर की कविता पर लगातार बात होती रही है और यह पुस्‍तक उसी चर्चा-परम्‍परा को समृद्ध करती है ।

                                                           साथ ही साथ यह पुस्‍तक अनेक दूसरे सवालों ,पक्षों पर भी बात करती है  । 'औपनिवेशिक आधुनिकता' बनाम 'देशज आधुनिकता' ऐसा ही एक महत्‍वपूर्ण सवाल है ।हालांकि 'औपनिवेशिक आधुनिकता' स्‍वयं में विरोधाभासी पद है - ऐसी कोई आधुनिकता सम्‍भव ही नहीं जो उपनिवेश की समर्थक या उससे संयुक्‍त हो ।यदि ऐसा होता है तो उसे आधुनिकता का विपर्यय ही कहा जाएगा ।गांधी जी ने 'हिन्‍द स्‍वराज' में यूरोप की आधुनिकता के इसी विपर्यय पर चोट की थी ।इसी सन्‍दर्भ में नेहरू जी ने भी पूछा था : कौन -सा इंग्‍लैंड भारत आया -व्‍यापारियों का या शेक्‍सपीयर-मिल्‍टन का ?  बाकी तो हर समाज की अपनी आधुनिकता होगी या हो सकती है (स्‍वयं जर्मनी ,इटली ,इंग्‍लैंड  या अमेरिका की आधुनिकता एक ही तो नहीं कही जा सकती )जिसमें कुछ तत्‍व जैसे स्‍वतंत्रता ,समानता और बन्‍धुता सर्वनिष्‍ठ भी होंगे ।


                               'धर्मेतर अध्‍यात्‍म' भी इसी तरह का पद है ।पुरूषोत्‍तम अग्रवाल ने इस सन्‍दर्भ में मार्क्‍स की अति चर्चित (लगभग विस्‍मृत नहीं ) 'आर्थिक एवं दार्शनिक पांडुलिपियां 1844 'में व्‍यवहृत स्पिरिचुअलिज्‍म पद का भी उल्‍लेख किया है जो वास्‍तव में चेतना या आत्‍म-तत्‍व को इंगित करता है ,एक नास्तिक की आत्मिकता को (क्‍योंकि मार्क्‍स के आरम्भिक लेख ही नास्तिकता के पक्ष में थे )किसी धर्मगंधी अध्‍यात्‍म को नहीं
।क्‍या धर्महीन या धर्मेतर आध्‍यात्मिकता सम्‍भव है ?(कबीर नास्तिक नहीं थे ) आध्‍यात्मिकता बिना किसी इतर की उपस्थिति की कल्‍पना के सम्‍भव नहीं ।एक ऐसा इतर जो हमसे भिन्‍न ,सुदूर और बृहत्‍तर हो ।व्‍यक्ति की आत्‍मा के सर्वोच्‍च (ब्रह्म की ) आत्‍मा से संयोग अथवा संयोग की आकांक्षा को व्‍यक्‍त करने के लिए प्राय: इस पद का प्रयोग होता आया है ।इसलिए इस पद के साथ धर्म का एक पूरा इतिहास सटा हुआ है ।रिल्‍के ,जो 'आध्‍यात्मिक' भी कहे जाते हैं ,का सबसे प्रिय उपन्‍यास था -डेनिश लेखक याकोब्‍सन का छोटा-सा उपन्‍यास 'नील्‍स लाइम' ।लेकिन 'नील्‍स लाइम' एक नास्तिक की कृति है -मनुष्‍य के इस ब्रह्मांड में निष्‍कवच संघर्ष की गाथा ,'न तो मनुष्‍य का कोई घर इस पृथ्‍वी पर है ,न कोई आसरा कहीं और ' ,'हर आत्‍मा अकेली है ......कोई किसी से कभी न पूरा मिल पाती है न पूरा विलीन .......' ।क्‍या इस भाव को 'धर्मेतर अध्‍यात्‍म' कहा जाना चाहिए  ? नए भाव-रसों को पुराने पद उसी तरह बदल देते हैं जैसे कांसे का बर्तन ताजा दही को ।

श्री पुरूषोत्‍तम अग्रवाल की इस पुस्‍तक पर देश और विदेश के अनेक महत्‍वपूर्ण विद्वानों के निबन्‍ध एवं टिप्‍पणियां यहां एकत्र हैं जो पुस्‍तक के महत्‍व की सूचक तो हैं ही ,कबीर की निरन्‍तर उपस्थिति का भी प्रमाण है ।यह अंक वास्‍तव में एक परिसंवाद है जो आगे भी और अंक के बाहर भी जारी रहेगा ।


मुझ सरीखे मूरतों के लिए कबीर साहेब पहले ही फरमा गए हैं -

अकथ कहानी प्रेम की ,कछू कही ना जाय ।
गूंगे के री सर्करा ,खाए अउ मुसकाय ।
                           -अरूण कमल



(साभार 'आलोचना'त्रैमासिक सहस्राब्‍दी अंक छियालिस)



























रवीन्‍द्रनाथ कवि

Thursday, 14 March 2013

(जहां हम रहते हैं)

तभी बरहमदेव के अंदर वाले बरहमदेव ने टोका ‘ ये क्‍या बरहमदेव ,अपना पुराना दिन भूल गये क्‍या ,भूल गए जब साहेब के सामने कुर्सी पर बैठने की क्‍या सजा मिली ,भूल गए उन साहेबों को जिन्‍हें सलाम करते-करते हाथ ,बाजू ,बांह दर्द करते थे ,वे भी जो हाथ से नमस्‍कार करना नहीं पसंद करते थे ,या तो साष्‍टांग या फिर पैर छूकर ‘ भूल गए उन साहेबों को जो कभी भी परिवार को साथ लेके नहीं रहे ,परिवार ईलाहाबाद ,लखनऊ खुद किसी पिछड़े ईलाके में नौकरी करते रहे ,जहां भी रहे भोजन-साजन और रात-बितावन के लिए नया नया परिवार बनाते रहे ,और ये परिवार ये तो गरीब काश्‍तकार के बहू-बेटी थे या फिर निचले स्‍टाफ की पत्नियां ‘

और बरहमदेव चाहते थे कि सबकुछ भूल जाए ,तभी दिख गए मनोहर सरोज सी0ओ0 रहे थे और विभाग के सबसे सज्‍जन अधिकारी माने जाते थे ,पर राजेशबा की औरत को रखे थे ,और यह कोई जोर-जबरदस्‍ती नहीं हुई थी ।पांच हजार देकर राजेश का ट्रांसफर करा दिया ,और फिर इतनी नौटंकी पेली कि राजेशबा उनकी बात में आ गया ,और परिवार को वहीं छोड़कर रायबरेली चला गया । और लोग बताते हैं कि वह बीस दिन महीना दिन पर आता और सी0ओ0 साहब परिवार की सारी आवश्‍यकता पर ध्‍यान दिए रहते .........स्‍साला जाति का भी था ,और हरदम पार्टी की भी बात करता था ।ध्‍यान स्‍साला का कहीं रहता था ,पर देखते ही अंबेडकर और फूले का नाम रटने लगता था ।

Tuesday, 12 March 2013

जय पूर्वांचल की जय

गाजीपुर की जय ,बलिया की जय ,मऊ की जय ,पूरे पूर्वांचल की जय ।पूर्वांचल में दिख रहे भारत-प्रेम की जय तथा भारत ही नहीं नेपाल तक में बढ़ रहे पूर्वांचल के प्रति बढ़ रहे जिज्ञासा की जय । पूर्वांचल में फल-फूल रहे ‘डिग्री टूरिज्‍म’ की जय ।वाह रे राहुल सांस्‍कृत्‍यायन की धरती , रूस,चीन,तिब्‍बत तक घूमे विद्या की प्राप्ति के लिए ,तो अब पूरी दुनिया को डिग्री देने का संकल्‍प इसी धरती से ।और संकल्‍प भी बहुत मँहगा नहीं दस हजार से लेकर एक लाख तक के विभिन्‍न पैकेज । अपने पूर्जा से नकल ,स्‍कूल के मास्‍टर से नकल ,परिक्षार्थी के स्‍थान पर किसी और को बैठाना ,दूसरी कॉपी की व्‍यवस्‍था या फिर परीक्षा से हमारा कोई मतलब नहीं ,ये लीजिए दो लाख ,और बस हमको डिग्री दीजिए ।
और किसको सुख नहीं इस व्‍यवस्‍था से ,विद्यार्थी को डिग्री तो मिल ही रही है ,एक महीने तक वसंतवास ।मात्र तीन घंटे तक का ही कष्‍ट है कि परीक्षा हॉल में बैठिए ,फिर शाम से अनंत आनंद की स्थिति ।मास्‍टरों की भी कुछ ज्‍यादा ही पूछ है इस समय ।कुछ तो नकल बनाते हैं ,कुछ चिट पहुंचाते हैं ,और श्री झंडा पांडे जैसे मास्‍टर भी हैं ,जो हैं तो एक छोटे मोटे ठेकेदार ,पर यदि कोई बदमाश अधिकारी और पुलिसजन आते हैं तो पांडे जी उनसे तब तक लोहा लेते हैं ,जब तक कि परीक्षा कक्ष के परिक्षार्थी और छात्र सतर्क न हो जाए ।कुछ स्‍टेटिक मजिस्‍ट्रेट होते हैं ,और उनकी इतनी सेवा हो जाती है कि वे स्‍टेटिक ही बने रहते हैं ,बस प्रधानाचार्य के कक्ष में बैठना ,काजू,किशमिश खाना और अखबार पढ़ना ,इनके साथ लगे पुलिस और चपरासी की भी खूब आव-भगत ।जो मोबाईल मजिस्‍ट्रेट होते हैं ,वे भी कुछ देर के लिए आएंगे ,और बस वसूल कर मोबाईल हो जाएंगे ।शिक्षा विभाग के अधिकारी इस दौरान काफी प‍रेशां दिखेंगे ,क्‍योंकि उन्‍हें व्‍यवस्‍था बनाते हुए ये सब करबाना है ,और सबकुछ करना है ,पर सख्‍त दिखना है ।बेचारे पत्रकार भी कभी-कभी आ धमकते हैं ,पर प्रिंसिपल या कोई मास्‍टर उनका रिश्‍तेदार होता है ,या फिर पत्रकार के भी बच्‍चे उस विद्यालय से परीक्षा दे रहे होते हैं ।अब पूछिए मत साहब
समस्‍त पूर्वांचल इस समय अतिथियों से भरा है ।गांव से लेकर शहर तक ।गांव के स्‍कूल ज्‍यादा मुफीद माने जाते हैं ,क्‍योंकि मोबाईल टीम की पहुंच वहां तक कम होती है ।और फिर वसंत का समय ,बिजली पंखे ,ए0सी0 और फ्रिज की जरूरत वैसे भी कम है ,सो विद्यार्थी और उनके माता-पिता वसंत का गुण-गान कर रहे हैं निराला ,सुभद्रा कुमारी चौहान और केदार नाथ अग्रवाल से भी ज्‍यादा ।और हर तरह के मकान किराए पर है ,पक्‍का ,कच्‍चा ,फूस का ।एक कमरे में दस-दस ,बीस-बीस लोग जमा हैं ।बिना जाति ,धर्म ,प्रांत ,भाषा की पड़ताल किए मकान मालिक किराया वसूल रहे हैं ,और पूर्वांचल भारत-भूमि की विविधता में एकता को फिर से रेखांकित कर रहा है ।
शिक्षा और मनोरंजन का यह अद्वितीय मेला आपको कहीं नहीं मिलेगा ।शाम से ही खेल , फिल्‍म ,गीतगान ,बातचित,भोज-भात का लंबा दौर ,जो देर रात तक चलना है ,और भोजपुरी क्षेत्र में पंजाबी ,बंगाली ,नेपाली व्‍यंजनों की महक फैल जाएगी ।महीने भर की परीक्षा के दौरान कम ही माता-पिता साथ रहते हैं ,और फिर बच्‍चे प्रति‍बंधित सुखों की ओर भी कदम बढ़ाते हैं ।इतना एकांत ,इतना अपरिचय ,इतनी भीड़भाड़ ,इतने खेत जो उन्‍होंने केवल फिल्‍मों में ही देखे हैं......सच सच बताइए किसको दुख है इस व्‍यवस्‍था से ।
दुकानों के माल बिक रहे हैं ,फोटो स्‍टेट वाला बिजी है ,पेट्रोल पंप वाला बिजी है ।डी0एम0 से लेकर एक होमगार्ड तक सब व्‍यवस्‍था बनाने के लिए चाक-चौबंद ।ज्‍यादा नंबर आएंगे ,स्‍कूल का नाम रौशन होगा ,बोर्ड का नाम ,प्रदेश का नाम रौशन होगा ,बच्‍चे अगले क्‍लास में जाएंगे ,उन्‍हें लैपटॉप मिलेगा ,बीस हजार रूपए मिलेंगे ,बच्चियों की शादी हो जाएगी ,परिवार ,समाज ,राष्‍ट्र सब के शिक्षा में बढ़ोत्‍तरी ।सही में कौन नाराज है यहां !!

Thursday, 14 February 2013

निराला और वसंत

'  खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम' वसंत और कहां जीर्ण निराला , परंतु हिंदी में वसंत के स्‍मरण के साथ ही निराला का भी चेहरा सामने आता है ।वैसे वसंत पर लिखने वाले बहुत हैं ,परंतु वसंत से गंभीर साम्‍य बैठाने वाले निराला ही हैं ।निराला ने खुद भी वसंत की बहुत ही दृश्‍य-छवियों को सामने लाया है

रंग गयी पग-पग धन्‍य धरा,-
हुई जग जगमग मनोहरा ।

और कभी हुलसकर छायावाद के अन्‍य कवियों के साथ सुर मिलाते हैं

सखि ,वसन्‍त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्‍कर्ष छाया ।

एक जगह वे स्‍वयं ही वसंत की अपूर्णता ,स्थिरता से परेशान हैं ,और 'स्थिर मधु ऋतु कानन' के बाद आवाहन करते हैं

गरजो ,हे मन्‍द्र ,वज्र-स्‍वर
थर्राये   भूधर-भूधर
झरझर-झरझर धारा झर
पल्‍लव-पल्‍लव पर जीवन ।


परंतु उनकी आशाएं अभी भी वसंत से ही है । वसंत की उपस्थिति उनके दुख ,अपमान को कम करती है

अभी न होगा मेरा अन्‍त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्‍त-
अभी न होगा मेरा अन्‍त ।

हिंदी के मठों -गढों को यह कहने को विवश होते हैं निराला

'मैं ही वसन्‍त का अग्रदूत'
और हिंदी समाज ने दशकों बाद जाना कि हिंदी साहित्‍य में जो नए गंध ,नए रस ,नए पल्‍लव हैं ,उसका श्रोत कहां है  ?

निराला के लिए सबसे सही समय'निशा वासंती' है ,और अपने सर्वाधिक प्रिय के लिए भी वे 'मेरे वसंत की प्रथम गीति ' कहते हैं ।ऋतुओं में वसंत ही उनके काव्‍यकर्म को सर्वाधिक उद्बुद्ध करती है ।





Sunday, 10 February 2013

रवींद्र वर्मा की कविताएं



शावेज़ की चौथी चुनाव-विजय पर


शावेज ,‍मुबारक हो
तुमसे ज्‍़यादा
वेनेजुएला को
वेनेजुएला से ज्‍़यादा
लातिन अमेरिका को
लातिन अमेरिका से ज्‍़यादा
धरती को जो
घायल
कराह रही है

अपने चारो ओर गोल गोल
घूमती धरती घायल
थकी-सी लगती है
जैसे अमेरिका अचानक
बहुत भारी हो गया हो
उलार गाड़ी की तरह
उलार गाड़ी कब तक
उलार चलेगी


2 अमृत जयंती

यह अमृत जयंती की बात है:
मैंने अ को फोन किया-
उसने बताया कि उसका उपन्‍यास
कालजयी है ।
ब  ने कहा कि उसने
हिंदी कविता को वह दिया है जो
उसके पास नहीं था ।
स आलोचक था -उसने
सनातन फैसले दे दिए थे ।
सब अमर मरेंगे ।


मजा तब आया जब
मैंने पाया कि मैं भी
महान हूं ।फर्क
यही था कि मुझे यह भीतरी
फरेब पता था ।इसीलिए
मुझमें पेड़ की पत्‍ती की तरह
गिरने की उम्‍मीद
बाकी थी ।
(मासिक 'समकालीन सरोकार' जनवरी 2013 में)






(साभार 'समकालीन सरोकार' ,रवींद्र 
वर्मा 






























Friday, 25 January 2013

मोती बी0 ए0 और दिनकर

भाई अनिल कुमार त्रिपाठी ने हिन्‍दी और भोजपुरी के प्रसिद्ध कवि-गीतकार मोती बी0ए0 पर विस्‍तार से बताया ।अनिल मानते हैं कि हिंदी फिल्‍मों से लगाव और उन संस्‍कारों को ज्‍यादा महत्‍व देने से कवि की रचनात्‍मकता और उनकी स्‍वीकृति प्रभावित हुई ।बाद में बरहज जैसे छोटे कस्‍बे में आने से उनके जीवन और संघर्ष से वह ताप खतम हो गया ,जो उनके गाने में देखे सुने गए ।


एक बार मोती बी0ए0 ने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियों को आधार बनाते हुए एक कविता लिखी

हटा पंथ के मेघ व्‍योम में स्‍वर्ग लूटने वाले
अकुलाए बच्‍चों के हित में दूध छीनने वाले
कहां गए वो कवि दिनकर राष्‍ट्रीय कहाने वाले
सरकारी ओहदे पाकर गद्दारी करने वाले


अनिल बताते हैं कि यह कविता उन्‍होंने दिनकर के भागलपुर विश्‍वविद्यालय के कुलपति के पद स्‍वीकारने के बाद लिखी थी ।परंतु अनिल जी के पिता जी (श्री वीरेंद्र त्रिपाठी) के आग्रह पर उन्‍होंने दिनकर का नाम हटाकर महान शब्‍द जोड़ दिया ।





 

Wednesday, 16 January 2013

प्रभात मिलिंद की कविताएं

मुम्‍बई 2008 :कुछ दृश्‍यांश (श्री रा0 ठा0 के लिए सादर)


1

जिस शहर के बारे में कभी इल्‍म था उनको
कि जहां हर किसी के लिए गुजर-बसर है
कि जो कोई एक बार आया यहां ,फिर लौट कर वापस नहीं गया कभी
कि जहां जिंदगी का एक नाम बेफिक्री और आजादी है
कि जहां प्रेम करना दुनिया में सबसे निरापद है
कि जहां आधी रात को भी सड़कों पर बेखौफ भटकता है जीवन
         
                         कितनी हैरत की बात है
                         एक रोज उसी शहर से मार भगाया गया उनको
                           और वह भी एकदम दिनदहाड़े


2
वे कीड़ों-मकोड़ें की तरह सर्वत्र उपस्थ्‍िात थे
मुंबई से लेकर डिब्रूगढ़ तक ......और दिल्‍ली से कोलकाता तक
इसके बावजूद वे कीड़ों-मकोड़ों की तरह अनुपयोगी और संक्रामक नहीं थे

                         सिर्फ दो वक्‍त की रोटी की गरज में
                        हजारों मील पीछे छोड़ आए थे वे अपनी जमीन और स्‍मृतियां
                        वे माणूस भी नहीं थे ,बस दो अदद हाथ थे
                       जो हमेशा से ही शहर और जिंदगी के हाशिये पर रहे
                      लेकिन उनकी ही बदौलत टिका रहा शहर अपनी धुरी पर
                     और उसमें दौड़ती रही जिंदगी बखूबी

खेतों की मिट्टी में उसके पसीने का नमकीन स्‍वाद था
कारखाने और इमारतों की नींव में उनके रक्‍त की गंध

                     दरअसल वे जन्‍मे ही थे इस्‍तेमाल के लिए
                      और इसीलिए मुंबई से लेकर डिब्रूगढ़ तक
                     और दिल्‍ली से कोलकाता तक सर्वत्र उपस्थित रहे

लेकिन अंतत: वे कीड़े-मकोड़ों की तरह ही घृणित और अवांछित माने गए
और मारे भी गए कीड़े-मकोड़ों की ही तरह

3

वे इस दुनिया में नए वक्‍त के सबसे पुराने खानाबदोश हैं.....
उनके कंधे और माथे पर जो गठरियां और टिन के बक्‍से हैं
दरअसल वही हैं उनका घर-संसार
लिहाजा चाह कर भी आप उनको बेघर या शहरबदर नहीं कर सकते


                      आप उनको एक दिन पृथ्‍वी के कगार से धकेल कर
                     इतिहास के अंतहीन शून्‍य में गिरा देने की जिद में है
                    लेकिन यह फकत आपकी दिमागी खब्‍त है
                   इससे पहले कि आप इस कवायद से थक कर जरा सुस्‍ता सकें,
                  वे इसी इतिहास की सूक्ष्‍म जड़ों के सहारे
                  पृथ्‍वी के पिछले छोर से अचानक दोबारा प्रकट हो जाएंगे


वे इस दुनिया के नए वक्‍त के सबसे पुराने खानाबदोश हैं.......
(प्रभात मिलिंद)
मो0 09435725739


(साभार 'शुक्रवार ,साहित्‍य वार्षिकी 2013)









































Tuesday, 15 January 2013



गणमान्‍य तुम्‍हारी........

वह बीस वर्षों से 'दीप प्रज्‍जवलन' की दुनिया में है
और इस दरमियान वह करीब बीस हजार बार दीप प्रज्‍ज्‍वलित कर चुका है
इस एकरसता में एक सरसता अनुभव करता हुआ
वह सुरक्षा कारणों से अब तक टमाटरों ,अंडों ,जूतों ,पत्‍थरों ,थप्‍पड़ों
और गोलियों से तो दूर हैं लेकिन गालियों से नहीं

एक सघन हाशिये से लगातार सुनाई दे रही गालियों के बरअक्‍स
यह है कि दीप पर दीप जलाता जा रहा है
इस 'उत्‍सवरक्षतमदग्रस्‍त' वक्‍त में
इतनी संस्‍कृतियां हैं इतनी समितियां हैं इतनी बदतमीजियां हैं
कि उसे बुलाती ही रहती हैं अवसरानवसर दीप प्रज्‍ज्‍वलन के लिए
और वह भी है कि सब आग्रहों को आश्‍वस्‍त करता हुआ
प्रकट होता ही रहता है
एक प्रदीर्घ और अक्षत तम में ज्‍योतिर्मय बन उतरता हुआ


लेकिन तम है कि कम नहीं होता
और शालें हैं कि इतनी इकट्ठा हो जाती हैं
कि गर करोलबाग का एक व्‍यवसायी 'टच' में न हो
तब वह गोल्‍फ लिंक वाली कोठी देखते-देखते गोडाउन में बदल जाए
गाहे-ब-गाहे उसे बेहद जोर से लगता है
कि वे शालें ही लौट-लौटकर आ रही हैं
जो पहले भी कई बार उसके कंधों पर डाली जा चुकी है

(अविनाश मिश्र)

साभार 'शुक्रवार' साहित्‍य वार्षिकी 2013



Saturday, 12 January 2013

लक्ष्‍मी नारायण मिश्र

नाटककार लक्ष्‍मी नारायण मिश्र (1903 -1987)

मिश्र जी की 110 वीं जयंती पर 11 जनवरी 2013 को उनके गृहजनपद मऊ में एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित हुआ ,जिसमें कोई भी प्रसिद्ध साहित्‍यकार शामिल नहीं हुआ ।देश के दूसरे भागों में भी किसी महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम के समाचार से हम अवगत नहीं हैं ।उनके अवदान पर एक महत्‍वपूर्ण लेख डॉ0 बच्‍चन सिंह का :-

 लक्ष्‍मी नारायण मिश्र   डी0 एल0 राय और प्रसाद की स्‍वच्‍छन्‍दतावादिता का विरोध करते हुए नाटक के क्षेत्र में आये ।प्रसाद तथा अन्‍य रोमैंटिक साहित्‍यकारों ने बुद्धिवाद का विरोध किया था तो मिश्र जी ने अपने को स्‍पष्‍ट कहते हुए कहा कि मैं बुद्धिवादी क्‍यों हूं  ? ' इस काल में लिखे प्राय: सभी नाटकों में रोमैंटिक प्रेम के विरोध में भारतीय विवाह संस्‍कारों का समर्थन किया गया है ।इस समस्‍या से संबद्ध नाटक हैं -संन्‍यासी ,राक्षस का मंदिर ,मुक्ति का रहस्‍य ,राजयोग ,सिन्‍दूर की होली और आधी रात ।

                      बुद्धिवाद का दावा करने के बावजूद मिश्र जी शॉ और इब्‍सन के अर्थ में बुद्धिवादी नहीं है ।शॉ रूढि़ विध्‍वंसक नाटककार हैं ।उनकी प्रसिद्धि इसलिए हुई कि उसने जनता को नैतिकता पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्‍य किया किन्‍तु रोमैंटिक प्रेम का विरोध करने पर भी मिश्र जी नैतिता के संबंध में पुनर्विचार करने के लिए बाध्‍य नहीं करते ।बल्कि वे रूढि़यों के समर्थन पर उतर आते हैं ।


           इब्‍सन ने एक स्‍थान पर कहा है कि यदि तुम विवाह करना चाहते हो तो प्रेम में मत पड़ो और यदि प्रेम करते हो तो प्रिय से अलग हो जाओ ।मिश्र जी के 'संन्‍यासी' नाटक की मालती कहती है   -' और फिर विश्‍वकान्‍त प्रेम करने की चीज है ...विवाह करने की नहीं ।प्रेम किसी दिन की ......किसी महीने की ,किसी साल की घड़ी भर के लिए ,जो चाहे जितना दु:ख-सुख दे .....उसमें जितनी बेचैनी हो ....जितनी मस्‍ती हो ....लेकिन वह ठहरता नहीं ।' एक दूसरे स्‍थान पर रोमैंटिक प्रेम की व्‍याख्‍या करती हुई वह पुन: कहती है -‍'जिसे प्रेम करे उसके सामने झुक जाना -बिल्‍कुल मर जाना-उसकी एक-एक बात पर अपने को न्‍योछावर कर देना रोमैंटिक प्रेम होता है ।हम लोग प्रेम नहीं करेंगे ।'  'राक्षस का मंदिर ' की ललिता का स्‍वर भी उससे भिन्‍न नहीं है ।'मुक्ति का रहस्‍य' की आशादेवी अंत में रोमांसविरोधी रूख अपनाती है ।'सिन्‍दूर की होली' की मनोरमा आद्यान्‍त रोमांस-विरोधी बनी रहती है ।


                      'सिन्‍दूर की होली' के दो पात्र मनोरमा और चन्‍द्रकान्‍ता एक-दूसरे के विरोधी हैं ।मनोरमा वैधव्‍य का समर्थन करती है और चन्‍द्रकान्‍ता रोमैंटिक प्रेम का ।मनोरमा का विधवा-विवाह का विरोध स्‍वयं बुद्धिवाद का विरोध करने लगता है और रोमैंटिक चन्‍द्रकान्‍ता का तर्क बुद्धिवाद हो जाता है ।


रोमैंटिक भावुकता और यथार्थवादी बुद्धिवाद की टकराहट मिश्र जी के नाटकों में इस ढ़ंग से चित्रित हुई है कि मिश्र जी भावुकता से मुक्‍त नहीं हो पाते ।प्राय: सभी पात्रों में भावुकता लिपटी हुई है ।मिश्र जी के व्‍यक्तित्‍व में ये दोनों तत्‍व पाये जाते हैं ।वे भीतर से भावुक और बाहर से बुद्धिवादी हैं ।भारतीयता के प्रति उनकी आस्‍था में भी विचित्र भावुकता का सन्निवेश हो गया है ।


               बुद्धिवादी रूख अपनाने के कारण मिश्रजी की भाषा प्रसाद की भाषा से भिन्‍न है ।उसमें तर्क करने की अद्भुत क्षमता है ।  'मुक्ति का रहस्‍य' में उन्‍होंने लिखा है -'शेक्‍सपियर के नाटकों के साथा जब प्रसाद के नाटक रखे जायेंगे त‍ब स्‍वगत का वही अतिरंजना ,वही संवादों की काव्‍यमयी कृत्रिमता ,मनोविज्ञान या लोकवृत्ति के अनुभव का वही अभाव ,संघर्ष और द्वंद्व की वही आंधी ......'कहना न होगा कि मिश्रजी ने उनसे बचने का प्रयास किया है ।संवादों में स्‍फूर्ति ,लघुता और तीव्रता का विशेष ध्‍यान रखा गया है ।वाग्‍वैदग्‍ध्‍य ,हाजिरजबाबी ,तर्कपूर्ण उत्‍तर-प्रत्‍युत्‍तर आदि समस्‍या नाटकों की विशेषताएं हैं ।इसमें संदेह नहीं कि अपनी त्रुटियों के बावजूद मिश्र जी ने हिन्‍दी नाटकों को रूमानियत से बाहर निकालने का प्रयास किया है ।



                              समस्‍या नाटकों के अतिरिक्‍त मिश्र जी ने कई ऐतिहासिक नाटकों की रचना भी की है ।गरूड़ध्‍वज ,नारद की वीणा ,वत्‍सराज ,दशाश्‍वमेघ ,वितस्‍ता की लहरें ,जगद्गुरू ,मृत्‍युंजय ,सरजू की धार आदि ऐतिहासिक नाटक हैं ।


(डॉ0 बच्‍चन सिंह 'आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य का इतिहास' में )

साभार 'लोक भारती प्रकाशन'

Thursday, 10 January 2013

इब्‍ने इंशा

इब्‍ने इंशा की कविताओं में निहित प्रभावों को रेखांकित करना कठिन है ,परंतु उनकी जीवन यात्रा से ही कुछ मजबूत रेखाएं स्‍पष्‍ट होती है । जून की पंद्रहवीं ,साल 1927 ईसवी को लुधियाना में जनम और 1949 में कराची और पाकिस्‍तान का वासी बनने की विवशता , यद्यपि जल्‍दी ही लोगों को पता चल गया कि उन्‍होंने जमीनी विभाजन को स्‍वीकारा नहीं था ।विभाजन की वास्‍तविकता और पीड़ा पर न लिखते हुए उन्‍होंने आदमी की पीड़ा पर लिखा ।लंबे समय तक लंदन में रहे ,ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया ।पाकिस्‍तान सरकार और यूनेस्‍को के द्वारा प्रदत्‍त कई सांस्‍कृतिक पदों को स्‍वीकारा ।विद्वानों ने उनके लहजे में मीर की खस्‍तगी और नजीर की फकीरी देखी है ।मनुष्‍य की स्‍वाधीनता और स्‍वाभिमान को सर्वोपरि मानते हुए आजीवन मानवतावादी वृत्तियों के प्रति संकल्पित रहे ।  11 जनवरी 1978 को लंदन में कैंसर से मृत्‍यु ।



                                                          इब्‍ने जी की रचनाएं सुखद आश्‍चर्य से भर देती है कि इस पाकिस्‍तानी साहित्‍यकार में हिंदुस्‍तानी जीवन ,शब्‍दावली और हिंदुस्‍तानी रंग के इतने इन्‍द्रधनुष कैसे हैं । इनकी गजलों में  जोगी ,सजन ,जोत ,मनोहर ,प्रेम ,बिरह ,रूप-सरूप ,सखि ,सांझ ,अंबर ,बरखा ,गोपी ,गोकुल ,मथुरा ,मनमोहन ,जगत ,भगवान संन्‍यास जैसे शब्‍दों का प्रयोग यह बतलाने के लिए पर्याप्‍त है कि उनके रचनात्‍मक संस्‍कार कैसे थे । अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह ने इस संबंध में कहा है कि 'उर्दू शाइरी की केंद्रीय अभिरूचि से यह काव्‍यबोध विलग है ।यह उनका निजी तख़य्युल है और इसीलिए उनकी शाइरी जुते हुए खेत की मानिंद दीख पड़ती है ।'


शायरी करते हुए भी इंशा जी शास्‍त्रीय संकीर्णता की परवाह नहीं करते ।इसीलिए अब्‍दुल बिस्मिल्‍लाह कहते हैं कि ' भाषा की रूपगत संकीर्णता से ऊपर उठकर शाइरी करनेवालों का एक वर्ग पाकिस्‍तान के उर्दू साहित्‍य में अपना अलग स्‍थान रखता है ,जिसमें नासिर काजि़मी ,अहमद फ़राज ,उमील-उद्दीन आली ,परवीन शाकिर आदि के नाम उल्‍लेखनीय है ।यह वर्ग इब्‍ने इंशा का वर्ग है......'


इब्‍ने इंशा ने हरेक दिन को ईद जैसा मनाया ,इसीलिए उनकी कविताओं में रंग-रंग के चांद मौजूद हैं ।उनकी पुण्‍यतिथि   11 जनवरी  पर उनकी कुछ गजलें :-



गोरी अब तू आप समझ ले ,हम साजन या दुश्‍मन हैं
गोरी तू है जिस्‍म हमारा ,हम तेरा पैराहन हैं

नगरी-नगरी घूम रहे हैं ,सखियों अच्‍छा मौका है
रूप-सरूप की भिक्षा दे दो ,हम इक फैला दामन है

तेरे चाकर होकर पाया दर्द बहुत रूस्‍वाई भी
तुझसे थे जो टके कमाए ,आज तुझी को अरपन है

लोगों मैले तन-मन-धन की ,हम को सख्‍त मनाही है
लोगों हम इस छूत से भागें ,हम तो खरे बरहमन हैं

पूछो खेल बनानेवाले ,पूछो खेलनेवाले से
हम क्‍या जानें किसकी बाजी ,हम जो पत्‍ते बावन है


सहरा से जो फूल चुने थे उनसे रूह मुअत्‍तर है
अब जो ख़ार समेटा चाहें ,बस्‍ती -बस्‍ती गुलशन है


दो-दो बूंद को अपनी खेती तरसी है और तरसेगी
कहने को तो दोस्‍त हमारे भादों हैं और सावन है



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कुछ कहने का वक्‍़त नहीं ये कुछ न कहो ,खामोश रहो
ऐ लोगों खामोश रहो हां ऐ लोगों खामोश रहो

सच अच्‍छा पर उसके जलू में , जहर का है इक प्‍याला भी
पागल हो  ? क्‍यों नाहक को सुक़रात बनो ,खामोश रहो

हक़ अच्‍छा पर उसके लिए कोई और मरे तो और अच्‍छा
तुम भी कोई मंसूर हो जो सूली पर चढ़ो ,खामोश रहो


उनका ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है
सर आंखों पर ,सूरज ही को घूमने दो -खामोश रहो

महबस में कुछ हब्‍स है और जंजीर का आहन चुभता है
फिर सोचो ,हां फिर सोचो ,हां फिर सोचो ,ख़ामोश रहो

गर्म आंसू और ठंडी आहें ,मन में क्‍या क्‍या मौसम है
इस बगिया के भेद न खोलो ,सैर करो ,खामोश रहो

आंखे मूंद किनारे बैठो ,मन के रक्‍खो बंद किवाड़
इंशा जी लो धागा लो और लव सी लो ,खामोश रहो

(साभार राजकमल प्रकाशन)

Sunday, 30 December 2012

श्रीलाल शुक्‍ल


श्री लाल शुक्‍ल

जन्‍म तिथि :  31 दिसंबर 1925

निधन   :28 अक्‍तूबर   2011

प्रमुख कृति  : सूनी घाटी का सूरज ,राग दरबारी ,पहला पड़ाव ,विश्रामपुर का संत ,अंगद का पांव
साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार :राग दरबारी(1969)

व्‍यास सम्‍मान: विश्रामपुर का संत(1999)

2008 में पद्म भूषण
2009 में ज्ञानपीठ पुरस्‍कार






Saturday, 29 December 2012

सत्‍य


           सत्‍य
सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी–फटी आँखों से
टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए–जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नज़रों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात

सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया है
कौर अंदर डालकर जबड़ों को झटका देना पड़ता है
तब जाकर खाना गले के अंदर उतरता है
ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सत्य को लकवा मार गया है

वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा–सारा दिन, सारी–सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक

लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है

जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हाँ, सत्य को लकवा मार गया है
उसे इमर्जेंसी का शाक लगा है
लगता है, अब वह किसी काम का न रहा
जी हाँ, सत्य अब पड़ा रहेगा
 लोथ की तरह, स्पंदनशून्य मांसल देह की तरह!

(1975)

Sunday, 23 December 2012

ओ सामने वाली पहाड़ी : सुरेश सेन निशांत

सुरेश सेन निशांत की कविताओं में पहाड़ का वह रूप नहीं है ,जो पंत या उसके बाद की कविताओं में है ।जहां पंत के पहाड़ 'ग्‍लोबल' हैं ,वहीं सुरेश के 'लोकल' ।इस स्‍थानीयता की अपनी आभा है ।यहां पहाड़ के साथ ही स्‍थानीय जीवन की तमाम तल्‍ख सच्‍चाईयां सामने हैं ।यह पर्वत-यात्रा आनंदित नहीं करती ,और इसके झकझोड़ने में ही कविता की शक्ति समाहित है



ओ सामने वाली पहाड़ी


एक(1)


मुझे नहीं पताइस बसंत में कैसी नजर आएगी तू
कैसी दिखेगी इस सावन में
जब बारिश से भींगी हुई होगी
तुम्‍हारी देह ।

हरे रंग का परिधान
तेरे जिस्‍म पर बहुत फबता है
बहुत भाता है मुझे
बुरांश के फूलों से सजा
तेरा रूप ।


मैं घंटों निहारता रहता हूं तुझे
जैसे कोई प्रेमी
अपनी प्रेमिका को निहारता है
जैसे कोई सत्रह बरस का युवक
किसी अति सुंदर लड़की को
अचरज से भरा निहारता ही जाता है
अपनी सुध-बुध खोता हुआ ।
जैसे कोई मछेरा हसरत भरी नजरों से
निहारता है नदी के निर्मल जल को।

उसी तरह हां उसी तरह
मैं निहारता रहता हूं तुम्‍हें ।

हर रोज नित नए ढ़ंग से
सँवरा हुआ लगता है मुझे तेरा रूप ।
तुम्‍हारी आंखों के जल में
रोज धोता हूं मैं अपनी देह ।
तुम्‍हारी देह की आंच में
सुखाता हूं अपना जिस्‍म ।
तुम्‍हारी आवाज की लहरों पर
तैराता हूं गांव भर के बच्‍चों के संग
अपनी भी कागज की कश्तियां।
मैं तुम्‍हारे जिस्‍म में
डूबो देता हूं अपना जिस्‍म
मिलता हूं वहां असंख्‍य जंतुओं से
असंख्‍य पंछियों से करता हूं दोस्‍ती ।


पता नहीं
कितने ही रहस्‍यों से भरी पड़ी है तू
जब भी तेरी देह में उतरता हूं
मैं ईश्‍वर को देखता हूं
तेरी देह में हरे रंग का परिधान पहने
एक कोमल पत्‍ते सा हिलते हूए


मैं देखता हूं वहां
अपने पुरखों को घास काटते हुए ।
सूखी लड़कियों का भरौटा उठाए
देखता हूं गांव भर की औरतों को उतरते ।
मैं हल की फाल उठाये
पिता को देखता हूं तेरे पास से
खुशी-खुशी लौटते ।
मैं देखता हूं
मुंह अंधेरे की गई मेरी बहिनें
मीठे काफलों की
भरी टोकरी लेकर लौट रही है तेरे पास से ।

पर इधर कोई
हरीश सिमेंट वाला टांग रहा है
तेरी देह पर अपना बोर्ड
तेरी देह से वस्‍त्र उतारने की
कर रहा है नित नए षड्यंत्र ।
हमारे ग्राम प्रधान और विधायक
लालच की नदी में डूबकर
उसकी महफिलों की बन गए हैं रौनक ।

ओ सामने वाली पहाड़ी
आजकल पूरे जनपद के कुम्‍हार
जब भी बनाने बैठते हैं घड़े
चाक पर रखी गीली मिट्टी में
सुनाई देती हैं उन्‍हें तुम्‍हारी सिसकियां
तुम्‍हारी कराहटों से भरी रहती है
उदास लुहारों की सुलगती गोरसियां


जब भी चरने छोड़ते हैं हम अपने मवेशी
वे दिन भर तुम्‍हें ही निहारते रहते हैं
मां से बिछुड़ रहे बच्‍चे सा होता है
उदासी और विलाप से भरा उनका रम्‍भाना


सो सामने वाली पहाड़ी
बच्‍चे आजकल
तुम्‍हारी वनस्‍पतियों को , पंछियों को
और तुम्‍हें अपने सपनों में बचाने की बातें
करते रहते हैं
वे तुम्‍हें सुमेरू पर्वत सा उठाकर
कही दूर छुपाकर बचा लेना चाहते हैं
उनकी भोली बातें सुन
दुख और क्रोध से भर जाती हैं औरतें
दुख और क्रोध से भर जाते हैं हम


हमारे इस विलाप में शामिल है
गीदड़ों का भी विलाप



दो (2)


ओ सामने वाली पहाड़ी
तीन कोस दूर पे
एक और फैक्‍टरी है सिमेंट की
ए0सी0सी0 नाम है उसका ।

यहां हर रोज बारूद के धमाकों से
तोड़ी जाती है एक पहाड़ी
वहां हर रोज
मरते हैं कुछ चिडि़यों के बच्‍चे
जो अभी उड़ना ही सीख रहे होते हैं

हर रोज बारूद के धमाकों से
सहमा जल निथरता जाता है
धरती की गहराई की ओर
हर रोज कम होता जाता है
हमारी बावडि़यों और कुओं का जल
हर रोज बढ़ती जाती है
हमारे गांव-घर की औरतों की
पानी के स्रोतों से दूरी ।


यहां हर रोज़ धमाकों से
कांपती है घरती
कांपता है हमारा मन
कांपती रहती है आसपास की
पहाडि़यों की रूह
कांपता रहता है भय से भरा
देर तक इस सतलुल का भी जल ।

ओ सामने वाली पहाड़ी
उसमें थोड़ा सा दूर जाएं
तो एक और सीमेंट फैक्‍टरी है
दूजी पहाड़ी पर बनी
अंबुजा नाम है उसका
वहां भी वैसी ही है
बारूद के धमाकों की गूंज
वैसा ही है धूऍं के बीच दौड़ते
ट्रकों का बेतहाशा शोर ।
उसकी बगल वाली पहाड़ी पर
जे0पी0 सीमेंट फैक्‍टरी है ।


यहां हर जगह सुनी जा सकती है
धरती की सिसकियां
और इन पहाडि़यों के सौदागरों की
ऊँची ठहाकेदार हँसी भी ।



तीन (3)
  

कहां जाऍंगे हम
हमारे मवेशी कहां जाऍंगे
कहां जाएँगे इन पहाडि़यों पर
बसने वाले परिंदे

हम बारिशों को
कौन से गीत गाकर बुलाऍंगे
हम धरती के इतने घावों को
कैसे भरेंगे
कहां रखेंगे
कहां बोएंगे
भय से सूखते
इन पेड़ों के बीज


चार(4)


ए0सी0सी0 सिमेंट फैक्‍ट्री के
बगल वाले गांव में है
मेरी बहिन का घर
धूल की एक मोटी दीवार है
हमारे और बहिन के घर के बीच
नहीं सुनाई देती है
बहिन की दुख भरी आवाज
उसकी सिसकियां ।
धूल की एक मोटी पर्त
बिछी रहती है
बहिन की घर की छत पर भी
जिसे धोती है कभी कभार होने वाली वारिश ।
धूल ही धूल है
घासनियों की घास पर भी
जिसे नहीं खाते हैं मवेशी ।
बहिन के पांच साल के बेटे को
हो गई है खांसी
जो जाती ही नहीं
यही बीमारी है उसके पिता को भी
वंशानुगत नहीं है यह रोग
अभी-अभी फैला है ।


सुरेश सेन निशांत

( गांव-सलाह ,डाक-सुन्‍दरनगर-1 ,जिला-मण्‍डी ,174401 ,हिमाचल प्रदेश)

फोन 09816224478


सभार 'बया' ,'अंतिका प्रकाशन' , गौरीनाथ(संपादक 'बया')

Sunday, 16 December 2012

अब तो पिताओं के भी मरने के दिन आ गए हैं ।

उम्र चालीस
चर्बियों के हिसाब से किसी नौकरी में
 मोटरसाईकिल की डिक्‍की में बी0पी0 शुगर की रिपोर्ट
रंगरूप और सफाचट ललाट से तेल-क्रीम की विफलता स्‍पष्‍ट थी
कई और चूर्ण ,अर्क भी फेल हुए थे
बच्‍चों की मार्कशीट :इस बार भी ससुरा थर्ड ही आया
जेब में मॉल का पता :कब तक झूठमूठ का व्‍यस्‍त रहोगे
हैंडिल में लटका सब्जियों का झोला:फिर अदरख भूले हो ससुर
फोन पर बार-बार नजर: फिर कौन सी मीटिंग है
गांव में मां भी बीमार है
अब तो पिताओं के भी मरने के दिन आ गए हैं ।