मुक्तिबोध के बाद की पुरस्कृत हिंदी कविता प्रचलित साहित्यिक संस्कारों और रूढि़यों के ओसारे में पलकर बड़ी हुई है ।इसका 'नकार' पूर्ववर्तियों का अनुकरण भर है ।इसकी 'क्रांति' पहले के आंदोलनों की तुकबंदी भर है ।इसका 'जन' बस अहसास दिलाता है कि यह उस 'हिंदी' की कविता है ,जिसमें निराला ,नागार्जुन ,मुक्तिबोध जैसे कवि हुए हैं ।पुरस्कृत कविता और आलोचना की जुगलबंदी लोकप्रिय तो है ,परंतु कविता और आलोचना के असाधारणता की खोज मर गई है ।वह कविता ही क्या जो विवाद पैदा न करे !वह कविता ही क्या जो अस्वीकार एवं असफल माने जाने की चुनौती को स्वीकार न करे !वह कविता ही क्या जो आलोचना की नई पौध को जन्म न दे !
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Wednesday, 30 November 2016
Saturday, 5 September 2015
(हे हिंदी के आलोचक ,नए आलोचक ,आलोचकगण....)
आप आलोचक हैं ,जादूगर नहीं कि किसी को ऊपर उठा सकते हैं किसी को नीचे ,किसी को हवा में गुम कर सकते हैं ,और जो है नहीं उसको साबित कर सकते हैं ,और यदि ऐसा कर सकते हैं तब आप जादूगर ही हैं ,आलोचक नहीं ।
(हे हिंदी के आलोचक ,नए आलोचक ,आलोचकगण....)
Wednesday, 7 January 2015
धर्म की गंंध
मेरे आस-पास धर्म की गंंध होती तो मैं नथूनों में भर-भर के उसे थाहने का प्रयास करता ,उसको असली नाम से बुलाने का प्रयास करता , कुछ बदलने का प्रयास करता ,कुछ उसको भी बदलता ,नहीं बदलता तो खुद को ही बदल लेता ।यदि संभव होता तो घंटे में तीन बार अपना धर्म बदलता या फिर उसकी पथरीले मंसूड़ों को खुरदरे जीभ से सहला-सहलाकर चिकना बना देता ।
Saturday, 22 November 2014
हाकिम आपकी क्षुद्रता को भगवान दूर करें..
हाकिम आपकी क्षुद्रता को भगवान दूर करें....आपके जातिगत अहंकार को भगवान शिव पी जाएं ,भगवान शिव आपकी शारीरिक श्रेष्ठता -भाव का भी शमन करें ।वायुदेव आपकी क्षेत्रीय दुर्भावना को उड़ा दें , आपके लोभ पर इंद्रदेव का वज्र गिरे ,आपकी कामुकता गलकर बर्फ हो जाए ।आपके झूठको भगवान गणेश अच्छा शिल्प दें ,माता सरस्वती आपके आडम्बर को विश्वसनीय बनाएं......
Wednesday, 19 November 2014
चंद्रकान्त देवताले और आधुनिक कविता की शक्ति
चंद्रकांत देवताले की एक कविता में से -
मैं वेश्याओं की इज्ज़त कर सकता हूं
पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
भड़क उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
और जख्मों ,भाषा और उनके गूंगेपन को
अच्छी तरह समझता हूं
उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
जिनसे भद्र लोग जिन्दगी और कविता की नाप-जोख करते हैं
पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
भड़क उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
और जख्मों ,भाषा और उनके गूंगेपन को
अच्छी तरह समझता हूं
उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
जिनसे भद्र लोग जिन्दगी और कविता की नाप-जोख करते हैं
चन्द्रकांत देवताले की यह कविता आधुनिकतावाद के सुसभ्य केंचुलों को फाड़ते हुए आधुनिक कविता के नए उपकरणों को स्थापित करती है ।यहां छंदमुक्त कविता अपने सर्वाधिक शक्तिशाली रूप में मौजूद है ।
Thursday, 2 October 2014
(रसूलपुर डायरी 1)
छह साल से हम लोग लगे हुए थे ......पंडित जाति का था अधिकारी .....जब भी मिलते पैर छू लेते ,हमारे दादा भी 'पांउ लागी' तो कहते ही थे.............हम सारे लोग एक ही चीज की मांग कर रहे थे कि हमारा चक पासियों के बीच से हटाइए....दूसरी चकबंदी थी ,और यही मौका था कि हम लोग किसी दूसरे क्षेत्र में अपना चक बनबा लें .......साहब खरचा-बरचा की बात तो हमने खुल के कहा .........पर हरदम ईमानदारी का झौंस देता था...........अब जब चक बन रहा है तो नियम-कानून पाद रहा है .......कहते हैं कि लेलो पचास-साठ हजार तुम भी खुश ,हम भी खुश ,पर हमारा काम करते गांड फट रही है ,जैसे कि सरकार राजधानी से हमारा चक और इनका जेब ही चेक कर रही है ।साहब बार-बार कहा कि किसी भी तरह से हम लोगों का चक यहां से हटाओ....अब कितना कहें कि सुबह-शाम आप खेत की ओर घूम नहीं सकते ।हमारे ही खेत में दिसा-मैदान करना ,इसी में साग-पात करना ,इसी में घास छिलना और रोको तो गाली-गलौज ,मार-पीट ,पर ये सब कहके क्या होगा ,काम जब होना ही नहीं है ।तुम अपना कानून अपने गां... में रखो ,हम अपना चक अपने गां... में रखते हैं ।पैसा रहेगा ,तो तुम नहीं करोगे ,कोई और करेगा ,तुम नहीं तुम्हारा साहेब करेगा ,वह तुम्हीं से कराएगा ,और तूम जीसर ,यससर कहके करोगे .........
(रसूलपुर डायरी 1)
Sunday, 21 September 2014
(घूस के रसशास्त्री)
घूस के रसशास्त्री पूरे दिन बुलाते -बतियाते रहे बाबा तुलसीदास से
कभी जुबान से कभी हाथ से कभी लतियाते रहे फुटबाल की तरह
राग-भैरवी 'प्रविसि नगर ...' से होते हुए बार-बार राग-दरबारी में खतम हो जाती
कभी उन्हें भय के बिना प्रीत होते हुए नहीं दिखता
कभी-कभी कुर्सियों में धँस के , कभी टेबुल पर पैर चढ़ा के
कभी गुटखा और तम्बाकू को ओंठों और मंसूड़े के बीच रखते हुए
बार-बार ढ़ोल-गँवार को बुलाते
वाह रे तुलसी बाबा सब मौका के लिए लिख गए
घूस के रसशास्त्री भरत को नहीं जानते थे
भरत भी इनको नहीं जानते थे
इसीलिए दोनों के साधारणीकरण अलग रास्ते जाते थे
दोनों के उद्दीपक अलग थे
संचारी आदि भी........
कभी जुबान से कभी हाथ से कभी लतियाते रहे फुटबाल की तरह
राग-भैरवी 'प्रविसि नगर ...' से होते हुए बार-बार राग-दरबारी में खतम हो जाती
कभी उन्हें भय के बिना प्रीत होते हुए नहीं दिखता
कभी-कभी कुर्सियों में धँस के , कभी टेबुल पर पैर चढ़ा के
कभी गुटखा और तम्बाकू को ओंठों और मंसूड़े के बीच रखते हुए
बार-बार ढ़ोल-गँवार को बुलाते
वाह रे तुलसी बाबा सब मौका के लिए लिख गए
घूस के रसशास्त्री भरत को नहीं जानते थे
भरत भी इनको नहीं जानते थे
इसीलिए दोनों के साधारणीकरण अलग रास्ते जाते थे
दोनों के उद्दीपक अलग थे
संचारी आदि भी........
Sunday, 31 August 2014
महान इतिहासकार विपिन चंद्र
विपिन चंद्र की उपलब्धियां ऐतिहासिक थी ।उन्होंने आधुनिक भारतीय इतिहास को औपनिवेशिक ,राष्ट्रवादी ,गांधीवादी एवं मार्क्सवादी अतिवादों से दूर किया ।उन्होंने 1857 के विद्रोह को राष्ट्रवादी आंदोलन एवं सैनिक विद्रोह के बीच के उचित धरातल पर देखा ।भारतीय अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन को मार्क्सवादी एवं औपनिवेिशिक व्याख्या से दूर करते हुए वस्तुनिष्ठ राष्ट्रवादी नजर से देखा ।नरमवादी कांग्रेसियों की उपलब्धियों को सही परिपेक्ष्य में देखा ।इनके राष्ट्रवादी सोच के आर्थिक आधार पर अपनी थीसिस पूरी की ।उग्रवादी कांग्रेसियों एवं हिंसक राष्ट्रवादियों की सीमाओं को जनआंदोलन एवं ब्रिटिश सत्ता के मूल स्वरूप पर ध्यान रखकर विचार किया ।गांधीवादी राष्ट्रीय आंदोलन के संपूर्ण वैचारिक आधार को टटोलते हुए जन आंदोलन की गांधीवादी सोच एवं रणनीति को टटोला ।उन्होंने सांप्रदायिकता के मध्यवर्गीय आधार को परखते हुए उसके चरणों को रेखांकित किया ।सांप्रदायिकता एवं देशविभाजन के पीछे की राजनीति एवं जनाधार को व्यक्तिवादी व्याख्या से परहेज करते हुए पूरे राष्ट्र की मनोवैज्ञानिक मीमांसा किया ।
(अपने आकाशी गुरू को श्रद्धांजलि)
(अपने आकाशी गुरू को श्रद्धांजलि)
Sunday, 6 April 2014
हम जहां रहते हैं
भोर में टहलते हुए सड़क पर प्राय: किसी का कफ ,पानका पीक या चबाया गुटखा दिख जाता है ,तब द्विअक्षरी गाली से काम नहीं चलता है और पंचाक्षरी तक जाना पड़ता है ।यही हाल हिंदी साहित्य ,पत्रकारिता और विश्वविद्यालयों में प्राय:देखने को मिलता है ,कोई किसी का भाई है ,दामाद है ,बेटा है ,चेला है ,और उनका सबसे बड़ा एसाइनमेंट यही है ।अब इन आलियाओं ,कपूरों और धवनों के सामने आपको उखाड़ने के लिए क्या बचता है ?
Saturday, 29 March 2014
(सांप्रदायिकता बहुआयामी ,जटिल एवं बहुस्तरीय होता है ।
चना श्रेष्ठ होता है गेहूं से ,गेहूं के पत्ते चने के पत्ते से ज्यादा सजीला होता है ,गेहूं देश के बारे में ज्यादा सोचता है ,गेहूं पूरबैया में ज्यादा जोर से नाचता है ।चना का फूल ज्यादा कामुक होता है ,चना लतर कर देश का ज्यादा जमीन छेकता है ,चना की नीयत गेहूं के प्रति खराब़ है ।चना गेहूं को बरबाद करना चाहता है ।गेहूं अपनी लंबाई से चने के परागन को रोकता है ,गेहूं चने की ओर आने वाले हवा ,पानी ,गीत सबको रोकता है ।खेत ज्यादा अच्छे होते यदि केवल चना ही होता ।ये दुनिया ज्यादा प्यारी होती ,यदि केवल चने की खेती की जाती ,आखिर प्रोटीन ही तो सब कुछ है ।देश का ज्यादा से ज्यादा संसाधन केवल गेहूं के लिए खर्च हो रहा है ,सारी बिजली ,सारा खाद ,श्रमिक वर्ग ,थ्रेशिंग ,ट्रैक्टर सब गेहूं की पूजा में व्यस्त ।
(रवि भूषण पाठक)
(रवि भूषण पाठक)
Friday, 21 March 2014
संपादक का परिवारवाद
समास-8 के प्रकाशक ,लेखक और संपादक पर जरा ध्यान दीजिए ।
संपादक-उदयन वाजपेेयी,प्रकाशक-अशोक वाजपेयी
तीन सौ बीस पृष्ठ के साठ पृष्ठ में संपादकीय और वार्तालाप मिलाकर उदयन वाजपेयी हैं ।पांच पृष्ठ और लेकर एक आलेख में भी है ।पांच पृष्ठ में प्रकाशक महोदय की कविता पर ध्रुव शुक्ल का आलेख है ।चौदह पृष्ठ किसी आस्तीक वाजपेयी के लिए है ,जिनके घर का पता संपादकीय कार्यालय का पता है ।मतलबसाहित्य ,कला और सभ्यता पर एकाग्र की घोषणा के साथ इस अनियतकालीन पत्रिका का एक चौथाई हिस्सा अपने घर-परिवार से संबंधित है ।ये सामग्री चाहे जितनी भी अनिवार्य रही हो ,प्रकाशक और संपादक को अपने विवेक का इस्तेमाल तो करना ही चाहिए ।और आस्तीक जी आपकी कविता चाहे जितनी भी कमाल की हो ,घर में छपने से बचिए ।
संपादक-उदयन वाजपेेयी,प्रकाशक-अशोक वाजपेयी
तीन सौ बीस पृष्ठ के साठ पृष्ठ में संपादकीय और वार्तालाप मिलाकर उदयन वाजपेयी हैं ।पांच पृष्ठ और लेकर एक आलेख में भी है ।पांच पृष्ठ में प्रकाशक महोदय की कविता पर ध्रुव शुक्ल का आलेख है ।चौदह पृष्ठ किसी आस्तीक वाजपेयी के लिए है ,जिनके घर का पता संपादकीय कार्यालय का पता है ।मतलबसाहित्य ,कला और सभ्यता पर एकाग्र की घोषणा के साथ इस अनियतकालीन पत्रिका का एक चौथाई हिस्सा अपने घर-परिवार से संबंधित है ।ये सामग्री चाहे जितनी भी अनिवार्य रही हो ,प्रकाशक और संपादक को अपने विवेक का इस्तेमाल तो करना ही चाहिए ।और आस्तीक जी आपकी कविता चाहे जितनी भी कमाल की हो ,घर में छपने से बचिए ।
Wednesday, 12 March 2014
कबीर संजय की कहानी 'मकड़ी के जाले '
कबीर संजय की कहानी 'मकड़ी के जाले' नया ज्ञानोदय के फरवरी अंक में प्रकाशित हुई है ।कहानी नई कहानी के बहुप्रचारित 'नएपन' से आगे आकर प्रारंभ होती है ।पहली कक्षा में पढ़ रहा अंची के हवाले से लेखक गांव के दुआरा ,बरामदा,कमरा ,नीम से जुड़े भूगोल का मुआयना करता है ,तथा बहुत ही बारीकी से अंची के दिमाग में प्रवेश करता है ।चींटे के जैविक चक्र,आवास को बालमनोविज्ञान के चश्मे से कहानी में शामिल करते हुए लेखक अभिव्यक्ति के नए स्वर्ग की ओर प्रस्थान करता है ।करौंदे का पेड़ ,घोंसला ,मकड़ी का जाला केवल अंची के लिए ही नया बन के नहीं आता है ,एक पाठक को भी ऐसे सहज सामान्य चीजों को देखने का नया एंगल मिलता है ।अंची के सर में तेल लगाने ,उसे नहाने एवं टिफिन तैयार करने के विवरण में इतनी सहजता है ,और एक-एक चरण पर इतना गहन ध्यान कि कहानियों में रूपक और प्रतीक की बात बेमानी लगने लगती है ।अंची का एक बड़ा भाई भी है जो अपने पिता को एक औरत के साथ सोए देखकर घर से भाग गया है ,इस सोने वाले प्रसंग को कबीर विस्तार नहीं देते हैं ,विमल चंद्र पांडेय की एक कहानी जो 'अनहद' में प्रकाशित हुई है ,लगभग ऐसे ही प्रसंग में बेडरूम के चित्कारों से भरी है ।कबीर का संयम बहुत ही कलात्मक है ।इस कहानी में नन्दू लौटता है ,और पिता उसके भागने के कारणों से अनजान पिटाई करते हैं ।नंदू क्रोध और प्रतिशोध से अपना ओठ भींचता है ।अंची भी ओंठ को भींचते हुए चींटी ,ललमुनिया और कौवा के प्राकृतिक आवास पर आक्रमण करता है ।नाराज कौवे अंची पर आक्रमण करते हैं तथा उसके हाथ से पेड़ की डाली छूट जाती है ।कबीर संजय की इस कहानी के द्वारा हम ग्रामीण बाल मनोविज्ञान की एक अछूती दुनिया से परिचित होते हैं ।निरंतर क्रूर हो रही दुनिया और परिवार के पास अंची और नंदू के लिए कुछ भी नही है ।परिवार और विद्यालय यहां पर क्रोध ,हिंसा और प्रतिशोध सिखाने के साधन मात्र हैं ।अंची जो मकड़ी के जाले को जिज्ञासा से देखता है , और उसमें फँसता ही चला जाता है ............
(रवि भूषण पाठक)
(रवि भूषण पाठक)
Thursday, 13 February 2014
।दलाली जिंदाबाद !
किसानी बकबास है ,बनियौटी चोखा ,निवेशक की बजाय ब्रोकिंग में चमक थी ,और जो था फायदा ही ,निवेश केवल मुंह ,मुखौटा एवं भंगिमा का ही था ।देह धुनती थी रंडियां ,मजा मारते थे भड़ुए ।लेखक की बजाय प्रकाशक बनना मुफीद था ,नए लेखक यहां आराम से फँसते थे ।यह कोई छोटा-खोटा धंधा नहीं था ,दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश जो अपने आपको सबसे बड़ा लोकतंत्र और सबसे महान वामपंथी कहते थे , को भी ये पता था कि दलाली कोई साधारण चीज नहीं है ,इसीलिए वे हथियार बनाते भी थे ,और दलाली भी खुद ही करते थे ।यह महायुग था ,जिसमें सबसे ज्यादा चमक तृतीयक क्षेत्र के पास ही था ।दलाली जिंदाबाद !
दलाली कर रहे हैं न भैया ,एकदम करिए ,परंतु आकाश की ऊंचाई से या फिर धरती की गुरूता से एकदम ही प्रभावित नहीं होइए ,होइए भी तो दिखे नहीं ,और दिख भी जाए तो उसका फायदा हो ।मौका मिले तो ये भी कहिए कि धरती की गुरूत्वाकर्षण शक्ति को आप कम या ज्यादा कर सकते हैं ,या फिर आकाश को खींच के नीचा या फिर मुक्का मार के ऊपर कर सकते हैं यदि नहीं कर पाए तो ये बताइए कि आपकी नामर्दी जनहित में है ।
दलाली कर रहे हैं न भैया ,एकदम करिए ,परंतु आकाश की ऊंचाई से या फिर धरती की गुरूता से एकदम ही प्रभावित नहीं होइए ,होइए भी तो दिखे नहीं ,और दिख भी जाए तो उसका फायदा हो ।मौका मिले तो ये भी कहिए कि धरती की गुरूत्वाकर्षण शक्ति को आप कम या ज्यादा कर सकते हैं ,या फिर आकाश को खींच के नीचा या फिर मुक्का मार के ऊपर कर सकते हैं यदि नहीं कर पाए तो ये बताइए कि आपकी नामर्दी जनहित में है ।
Saturday, 8 February 2014
(मऊ से पटना वाया फेफना,बक्सर
सरकारों ने भले ही मऊ से पटना जाने के लिए वाया बलिया और वाया भटनी का रूट बनाया ,सजाया हो ,जनता इस रूट से नहीं चलती ।यहां के लोग फेफना में उतरकर ऑटो एवं जीप से बक्सर पहुंचते हैं ,फिर बक्सर से रेल के माध्यम से पटना पहुंचते हैं ।व्यापारियों ,किसानों ,कर्मचारियों ,तस्करों का यही रूट है ।यही रूट ज्यादा लोकप्रिय और सुरक्षित भी है ।बक्सर के टूटे पुल से निर्बाध यात्रा जारी है ,पुल का मुख्य हिस्सा कई भागों में बँटा दिखता है ,और एक हिस्से से दूसरे पर जाते वक्त दोनों हिस्से हिलते हैं ,आवाज करते हैं तथा डराते हैं ।लोगों ने बताया कि कई महीना पहले ही पुल को सरकारी तौर पर बंद कर दिया गया है ,परंतु भारी और हल्के वाहन पहले की ही तरह चल रहे हैं ।कुछ लोग डरे भी हैं कि कहीं सही में रूट बंद हो गया तो बलिया से पटना की यह यात्रा कुछ ज्यादा घंटों की मांग करेगी ।शायद उत्तर प्रदेश और बिहार के सरकारों के लिए यह उच्च प्राथमिकता का विषय नहीं रहा हो ,परंतु यहां के लोगों के लिए यह रोटी-बेटी का प्रश्न है ।
(मऊ से पटना वाया फेफना,बक्सर)
(मऊ से पटना वाया फेफना,बक्सर)
Wednesday, 18 December 2013
साहित्य के पिचकू
मुझको अपनी बात कहने तो दीजिए ,मुझे डराइए मत ,मुझे उनका कद,वजन,प्रतिष्ठा ,प्रभाव से परिचय मत कराइए ,थोड़ा बहुत हम भी जानते हैं ,निस्संदेह वे प्रभावशाली लोग हैं ,उनकी एक टिप्पणी से हम जैसे लोगों का जीवन(लेखन नहीं) आरामदेह हो सकता है ।उनका एक संकेत ,सिफारिशी चिट्ठी हमारा भाग्योदय कर सकता है ,परंतु जब हम इस लाभ-लोभ की ओर झुकने की बजाय अपेक्षाकृत ईमानदार रूख अपनाते हैं ,तो आप समर्थन की बजाय हमें धमकाते हैं ,और हिंदी के उन महापुरूषों के कुकृत्यों पर ईमानदारी पूर्वक चर्चा करने की बजाय उनके पहले के रिकार्ड पर बात करना पसंद करते हैं ।
मुझे जानकारी है कि आप में से बहुतों के एकाधिक किताबें छप चुकी है , आप में से कुछेक पुरस्कृत भी चुके हैं ,आप में से कई इस पुरस्कार और सम्मान के वाकई हकदार हैं ,परंतु इसका मतलब ये नहीं है कि रास्तों का विकल्प समाप्त हो गया है । हमें उनसे लड़ते-झगड़ते आगे बढ़ने दीजिए ,पाद-सेवन ,अर्चन-पूजन की बजाय नए रास्तों को सामने आने दीजिए ,ऐसे राहियों को चना-चबेना भले न दीजिए ,थोड़ा आंख तो मूंद सकते हैं । व्यभिचारियों के बिस्तर बनने से खुद को बचाईए ।हम समझते हैं आपकी आदत हो चुकी है ,परंतु कभी-कभी परहेज भी दवा होती है ।
हम किसको कोसें ,सरसो पैदा करने वाले किसान को ,तेल पेरने वाले तेली को ,बोतल,रैपर,पिचकू,स्प्रे में उपलब्ध कराने वाले बनिये को या आपके उस एप्रोच को ।आपके पूज्य को भी शायद यह इतना बुरा लगे ,जितना कि आपको लगता है ।
मुझे जानकारी है कि आप में से बहुतों के एकाधिक किताबें छप चुकी है , आप में से कुछेक पुरस्कृत भी चुके हैं ,आप में से कई इस पुरस्कार और सम्मान के वाकई हकदार हैं ,परंतु इसका मतलब ये नहीं है कि रास्तों का विकल्प समाप्त हो गया है । हमें उनसे लड़ते-झगड़ते आगे बढ़ने दीजिए ,पाद-सेवन ,अर्चन-पूजन की बजाय नए रास्तों को सामने आने दीजिए ,ऐसे राहियों को चना-चबेना भले न दीजिए ,थोड़ा आंख तो मूंद सकते हैं । व्यभिचारियों के बिस्तर बनने से खुद को बचाईए ।हम समझते हैं आपकी आदत हो चुकी है ,परंतु कभी-कभी परहेज भी दवा होती है ।
हम किसको कोसें ,सरसो पैदा करने वाले किसान को ,तेल पेरने वाले तेली को ,बोतल,रैपर,पिचकू,स्प्रे में उपलब्ध कराने वाले बनिये को या आपके उस एप्रोच को ।आपके पूज्य को भी शायद यह इतना बुरा लगे ,जितना कि आपको लगता है ।
Sunday, 15 December 2013
नागार्जुन और त्रिलोचन पर अष्टभुजा शुक्ल
त्रिलोचन की अवधी कविता संग्रह 'अमोला' पर लिखते हुए अष्टभुजा शुक्ल का ध्यान बरबस ही नागार्जुन पर जाता है ,तथा वे दोनों मित्र कवियों की तुलना करने लगते हैं ।'आलोचना' के पचासवें अंक में प्रकाशित एक लेख'बरवै में बिरवा(अमोला)' से एक अंश आभार सहित---
''कविद्वय -नागार्जुन और त्रिलोचन न तो लोकान्ध हैं और न ही लोक-विक्रेता बल्कि दोनों लोक-सम्बद्ध और लोक-प्रतिबद्ध हैं। इसी प्रतिबद्धता और सम्बद्धता की कीमत पर कभी-कभी दोनों प्रतिरोध को भी किनारे रख देते हैं पर उसका वाणिज्यिक इस्तेमाल नहीं करते ।दोनों लोक की आधुनिकता का साथ देते हुए और आरोपित आधुनिकता को नकारते हुए प्रगतिशील मूल्यों का निरन्तर प्रतिपादन करने वाले कवि हैं ......नागार्जुन की कारयित्री ऊर्ध्वाधार है तो त्रिलोचन की क्षैतिज ।नागार्जुन की हँसी में गूंज है तो त्रिलोचन में खनक ।नागार्जुन का व्यंग्य फट्ठा-पीठ है तो त्रिलोचन का कैंचीदार ।नागार्जुन में विक्षोभ और प्रखरता है तो त्रिलोचन में गहरी टीस और नुकीला कटाक्ष ।पहले की कविता की खूबी ज्यादातर असंयम में है तो दूसरे की ज्यादातर संयम में ।पहला करारी चोट करने वाला कवि है जबकि दूसरा करारी चोट सहने वाला ।
नागार्जुन में हिन्दी जाति का साहस एवं स्वाभिमान है तो त्रिलोचन में उसकी ऋजुता और निरहंकार । एक के प्रतिकार में जनता की सामूहिक चेतना है तो दूसरे की सहनशीलता में तिर्यक् अवज्ञा ।प्रतिकार एवं सहनशीलता- दोनों ही हिन्दी जाति,जीवन और कविता के स्वभाव हैं ।नागार्जुन प्रकृत्या काव्यानुशासन तोड़ने वाले कवि हैं जबकि त्रिलोचन प्राय: उसकी मर्यादा में रहने वाले ।इस लिहाज से एक ही अनुभूति ,अभिव्यक्ति की निजता और काव्यशैली अलग प्रकार की प्रतीत होती है तो दूसरे की उससे सर्वथा भिन्न ।बल्कि इन दोनों की काव्य-शैलियां निजी पृथगर्थता और सामूहिक एकार्थता का ऐसा सम्पूरक निर्मित करती हैं जिनमें हिन्दी कविता का पूर्वकृत एवं नवीकृत आवाजों के अनुवाद अपने-अपने आश्चर्यों के साथ झंकृत होते हैं ।दोनों की भूमिज संवेदना के उभयनिष्ठ तन्तु जहां उन्हें कविता के सामान्य धरातल पर एक साथ खड़ा करते हैं वहीं उनके सरोकार भारतीय जीवन-बोध के घनिष्ठ सम्पर्क में हैं ।दोनों के विश्वबोध की प्राथमिक ,द्वितीयक या तृतीयक मूल मिट्टी की देसजता और जनपदीयता में गहरे पैठी हुई है जहां उनके मूलगोप जीवन के खनिज संचित करते रहते हैं ।दोनों की कविता का मर्म और साधारण प्रतिज्ञा जनजीवन के मौलिक अनुताप उल्लास तक ही असमंजस प्रतिरोध संघर्ष और राग-विराग में घटित होती है ।ध्यान देने की बात यह भी है कि नागार्जुन मिथिलांचल के हैं तो त्रिलोचन अवध क्षेत्र के ।अपनी इन्हीं प्रतिबद्धताओं के चलते एक ने मैथिली में 'पत्रहीन नग्न गाछ' की रचना की तो दूसरे ने अवधी में 'अमोला' की ।''
नागार्जुन में हिन्दी जाति का साहस एवं स्वाभिमान है तो त्रिलोचन में उसकी ऋजुता और निरहंकार । एक के प्रतिकार में जनता की सामूहिक चेतना है तो दूसरे की सहनशीलता में तिर्यक् अवज्ञा ।प्रतिकार एवं सहनशीलता- दोनों ही हिन्दी जाति,जीवन और कविता के स्वभाव हैं ।नागार्जुन प्रकृत्या काव्यानुशासन तोड़ने वाले कवि हैं जबकि त्रिलोचन प्राय: उसकी मर्यादा में रहने वाले ।इस लिहाज से एक ही अनुभूति ,अभिव्यक्ति की निजता और काव्यशैली अलग प्रकार की प्रतीत होती है तो दूसरे की उससे सर्वथा भिन्न ।बल्कि इन दोनों की काव्य-शैलियां निजी पृथगर्थता और सामूहिक एकार्थता का ऐसा सम्पूरक निर्मित करती हैं जिनमें हिन्दी कविता का पूर्वकृत एवं नवीकृत आवाजों के अनुवाद अपने-अपने आश्चर्यों के साथ झंकृत होते हैं ।दोनों की भूमिज संवेदना के उभयनिष्ठ तन्तु जहां उन्हें कविता के सामान्य धरातल पर एक साथ खड़ा करते हैं वहीं उनके सरोकार भारतीय जीवन-बोध के घनिष्ठ सम्पर्क में हैं ।दोनों के विश्वबोध की प्राथमिक ,द्वितीयक या तृतीयक मूल मिट्टी की देसजता और जनपदीयता में गहरे पैठी हुई है जहां उनके मूलगोप जीवन के खनिज संचित करते रहते हैं ।दोनों की कविता का मर्म और साधारण प्रतिज्ञा जनजीवन के मौलिक अनुताप उल्लास तक ही असमंजस प्रतिरोध संघर्ष और राग-विराग में घटित होती है ।ध्यान देने की बात यह भी है कि नागार्जुन मिथिलांचल के हैं तो त्रिलोचन अवध क्षेत्र के ।अपनी इन्हीं प्रतिबद्धताओं के चलते एक ने मैथिली में 'पत्रहीन नग्न गाछ' की रचना की तो दूसरे ने अवधी में 'अमोला' की ।''
(साभार 'आलोचना' ,जुलाई-सितम्बर ,2013)
Sunday, 8 December 2013
पुरानी पत्रिका से: मल्लिकार्जुन मंसूर(आजकल ,सितंबर 2011)
‘पुरानी पत्रिकाओं से’ की दूसरी किश्त में ‘आजकल’ का
सितंबर 2011 इस मायने में विशिष्ट है कि मल्लिकार्जुन मंसूर को जन्म शताब्दी
वर्ष के अवसर पर याद करती है ,साथ ही यह पं0 भीमसेन जोशी एवं गिर्दा के महाप्रस्थान
को भी समेटती है ,परंतु अशोक वाजपेयी की कविता एवं यतींद्र मिश्र की कविता एवं स्मृतिलेख
के कारण यह अंक संग्रहणीय है ।
यतींद्र मिश्र अपने प्रिय गायक को याद करते हुए कहते हैं--
‘यह कहने में मुझे तनिक भी झिझक नहीं कि अपने समकालीनों एवं परवर्ती गायको ,फनकारों....का संगीत जितना श्रद्धास्पद ,अद्भुत,मनोग्राही और महान था-उसमें थोड़ी अतिरिक्त आस्था ,रहस्य ,मनोग्रह्यता और महानता का योग कराने के बाद बनने वाला संगीत ही मल्लिकार्जुन मंसूर का संगीत हो सकता था ।पंडित जी के गायन के लिए कम से कम कोई साधारण उत्प्रेक्षा ,उपमा या रूपक तलाशना भी उनका एक स्तर पर अपमान करना है ।‘
मल्लिकार्जुन मंसूर पर अशोक वाजपेयी की कुछ कविताएं
मल्लिकार्जुन मंसूर
(1)
काल के खुरदरे आंगन में
समय के लंबे गूंजते गलियारों में
वे गाते हैं
अपने होने के जीवट का अनथक गान
वे चहलकदमी करते हुए
किसी प्राचीन कथा के
बिसरा दिए गए नायक से
पूछ आते हैं उसका हालचाल
वे बीड़ी सुलगाए हुए
देखते हैं
अपने सामने झिलमिल
बनते-मिटते संसार का दृश्य
देवताओं और गंधर्वों के चेहरे
उन्हें ठीक से दीख नहीं पड़ते
अपनी शैव चट्टान पर बैठकर
वे गाते हैं
अपने सुरों से
उतारते हुए आरती संसार की -
वे एक जलप्रपात की तरह
गिरते रहते हैं-
स्वरों की हरियाली
और राग की चांदनी में
अजस्र-
वे सींचते हैं
वे जतन से आस लगाते हैं
वे खिलने से निश्छल प्रसन्न होते हैं
वे समूचे संसार को एक फूल की तरह चुनकर
कालदेवता के पास
फिर प्रफुल्लता पर लौटने के लिए
रख आते हैं-
वे बूढ़े ईश्वर की तरह सयाने-पवित्र
एक बच्चे की फुरती से
आते हैं-
ऊंगली पकड़
हमें अनश्वरता के पड़ोस में ले जाते हैं
(2)
अपनी रफ्तार से चलते हुए
बहुत बाद में
आते हैं
मल्लिकार्जुन मंसूर
और समय से आगे निकल जाते हैं
उलझनों-भरे घावों-खरोचों से लथपथ
टुच्चे होते जाते समय से
आगे
उनके पीछे आता है
गिड़गिड़ाता हुआ समय दरिद्र और अपंग
भीख मांगता हाथ फैलाए समय-
हांफता हुआ
मल्लिकार्जुन मंसूर
अपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में
हलका -सा झुककर
रखते हैं
कल के कंधे पर पर अपना हाथ
ठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ी
चल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्याशित
पड़ाव की ओर
अपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथ
सिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछ
गुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसार
ईश्वर आ रहा होता
घूमने इसी रास्ते
तो पहचान न पाता कि वह स्वयं है
या मल्लिकार्जुन मंसूर
(3)
राग के अदृश्य घर का दरवाजा खोलकर
अकस्मात् वे बाहर आते हैं
बूढ़े सरल-सयाने
राग की भूलभुलैया में
न जाने कहां
वे बिला जाते हैं
और फिर एक हैरान बच्चे की तरह
न जाने कहां से निकल आ जाते हैं
वे फूल की तरह
पवित्र जल की तरह
राग को रखते हैं
करते हैं आराधना
होने के आश्चर्य और रहस्य की ,
वे ख़याल में डूबते हैं
वचन में उतरते हैं
वे गाते हैं
जो कुछ बहुत प्राचीन हममें जागता है
गूंजता है ऐसे जैसे कि
सब कुछ सुरों से ही उपजता है
सुरों में ही निमजता है
सुरों में ही निवसता और मरता है ।
(अशोक वाजपेयी)
आकाश कुसुम
झरता है
सूर्य के आकाश से
चकित और उल्लसित
पारिजात की पगडण्डी
बनती जाती है
राग की विनम्र धरती
पीताभा में अपनी
घर हो
मन्दिर का कोई कोना हो
दीप्त हो उठता है वहां
सुन्दर का सपना
जैसे वह सच का सहोदर हो
गाकर
संसार के जिस भेद को
सुर और लय की अठखेली से
कुसुमित करते हैं वे
वह फूल
सूर्य के आकाश से झरता है ।
(यतीन्द्र मिश्र)
साभार 'आजकल' ,अशोक वाजपेयी ,यतीन्द्र मिश्र
Friday, 6 December 2013
आधुनिक हिंदी साहित्य पर केदारनाथ सिंह
‘पुरानी
पत्रिकाओं से’
स्तंभ की पहली किश्त में ‘प्रगतिशील
वसुधा’
के अक्तूबर-दिसम्बर 2009 अंक में केदारनाथ सिंह से सुधीर रंजन की बातचित को याद
किया जा रहा है ।अनौपचारिकता से भरी यह बातचित न केवल लंबाई में बड़ी है ,बल्कि
हिंदी साहित्य के लंबे सफर की विविधरंगी यादों से भरपूर है ।बातचित में सुधीर
रंजन के
प्रश्न उनके अध्ययन एवं चिंतन की गहराई को स्पष्ट करते हैं ,जिसे केदारनाथ जी
ने भी कई बार सराहा है ।बातचित प्रारंभ से ही आधुनिक हिंदी साहित्य पर केंद्रित
है ,दोनों लोगों ने लेखकों के निजी जीवन पर कम समय खर्च किया है ,सारा संकेंद्रण
हिंदी साहित्य के प्रस्थानविन्दु को स्पष्ट करने में है ।इस प्रस्थान-विन्दु की खोज में महेश नारायण ,मैथिली शरण गुप्त और निराला पर उत्तेजक चर्चा होती है ।अतुकांत कविता की प्रासंगिकता ,मैथिली और भोजपुरी की तुलना के साथ ही समकालीन कविता के महारथियों पर भी उल्लेखनीय चर्चा होती है ।
सुधीर रंजन याद दिलाते हैं कि निराला और त्रिलोचन ने अपने आलोचनात्मक लेख में मैथिली शरण गुप्त को काफी महत्व दिया है ।केदारनाथ जी खड़ी बोली हिंदी को बनाने में गुप्त जी के महत्व को स्वीकारते हुए भी यह कहते हैं कि ‘भारत भारती’ एक युग का पीस है ,बड़ी कविता नहीं ।बड़ी कविता माने जो बहुत लम्बे समय तक मनुष्य को संचारित करती रहे ।‘ आगे वे नामवर जी को उद्धृत करते हुए कहते है ‘पंचायती कविता है वो ।ये करो ,वो करो ,ये हटाओ ,वो जोड़ो ।ककुल मिलाकर एक रूप बना उसका ।हाली और क़ैफी के ‘मुसद्दस’ के जवाब में लिखी हुई कविता है ।‘
आगे केदारनाथ जी द्विवेदी युग एवं छायावाद के छंद पर विचार करते हैं तथा यह भी जोड़ते हैं कि ‘आज हिंदी में जो गद्य के लय में कविता लिखी जा रही है ,वो मात्रिक छन्द से बचने के लिए लिखी चली आ रही है ।‘सुधीर जी इस तथ्य की दुर्लभता को सिद्ध करते हुए फिर दोहराते हैं कि ‘मात्रिक से बचने के लिए गद्य में कविता ‘ ।सुधीर जी यह भी कहते हैं कि उर्दू की तुलना में हिंदी गद्य नया भी था और काव्यभाषा की निर्भरता भी उस पर बनी रही ,इसीलिए स्वभावत: ‘भारत भारती ‘ निबंधात्मक है ।
सुधीर रंजन ऐतिहासिक प्रस्थान बिन्दु की बात करते हुए महेश नारायण की ‘स्वप्न’ कविता उल्लेख करते हैं ,केदारनाथ जी पहले कविता को उर्दू मानते हैं ,परंतु सुधीर जी के बल देने पर स्वीकार करते हैं –वो कविता बहुत ही मीनिंगफुल है और एक प्रस्थान बिन्दु बन सकती है ।हमारे पूरे काव्य विकास को ,काव्यभाषा के विकास को ,और काव्यभाषा के लय और छन्द के विकास के संदर्भ में उस कविता को बहुत ही सिग्नीफिकेण्ट मैं मानता हूं ।‘
सुधीर रंजन आगे बिहार में ब्रजभाषा की अकेंद्रीयता पर बल देते हुए यह भी स्पष्ट करते हैं कि महेश नारायण अंग्रेजी के आदमी थे ,इसीलिए उनके यहां प्रयोग संभव हुआ ।सुधीर जी आगे बहुमुखी प्रतिभाशाली के रूप में श्रीधर पाठक का उल्लेख करते हैं ।दोनों व्यक्ति संध्या वर्णन वाली कविता को अद्भुत मानते हैं ,साथ ही दोनों व्यक्ति आयरिश कवि गोल्डस्मिथ की तीन कविताओं के अनुवाद को हिंदी भाषा और कविता के विकास में महत्वपूर्ण मानते हैं ।सुधीर रंजन बलपूर्वक प्रसाद के ‘ प्रेम पथिक’ और राम नरेश त्रिपाठी के ‘पथिक’ की पृष्ठभूमि में श्रीधर पाठक के ‘श्रान्त पथिक’ को रखते हैं ।यही नहीं सुधीर रंजन यह भी मानते हैं कि ‘कामायनी’ का बीज ‘प्रेम पथिक’ में पड़ चुका था ।केदारनाथ जी भी इस बात को दमदार मानते हैं ।
आगे केदारनाथ जी त्रिलोचन के सॉनेटकार रूप को सामने लाने का श्रेय अज्ञेय को देते हैं तथा रेणु के विषय में एक महत्वपूर्ण टिप्प्णी करते हैं-‘हमारे जेहन में आजादी के बाद का सबसे बड़ा गद्यकार है ।भाषा की गतिविधियों से ,गलत प्रयोगों से बड़ी भाषा पैदा की जा सकती है ।इसका उदाहरण है रेणु का गद्य ।सुधीर रंजन जी भी विटिंग्स्टाइन को उद्धृत करते हुए कहते हैं –भाषा की अशुद्धि में ताक़त छुपी होती है ।सुधीर रंजन रेणु को याद करते हुए कहते हैं कि रेणु वैसे लेखक हैं जहां गद्य और कविता का भेद मिट जाता है ,केदारनाथ जी इसी संदर्भ में बाणभट्ट को याद करते हैं ।केदारनाथ जी आगे यह भी कहते हैं कि ‘जो परम्परा चली आ रही थी लम्बे समय से हिन्दी गद्य की ,उससे अलग हटकर रेणु थे ।बांग्ला ,नेपाली ,मैथिली- उस सबसे मिलकर भाषा बनी थी ।वह आदमी क्रियेट कर रहा था ,जो उसका अपना कमाल था ।‘केदारनाथ जी नलिन विलोचन शर्मा के विषय में भी स्पष्ट टिप्पणी करते हैं ‘उनसे प्रबुद्ध आदमी हिन्दी में- पूरे पश्चिम और भारतीय साहित्य को लेकर इतना प्रबुद्ध कौन था ‘यहीं नहीं केदारनाथ जी नामवर जी के उलट नलिन जी की कविताओं को विचारनीय मानते हैं ।
केदारनाथ जी प्रयोगवाद को समय सीमा में बांधे जाने का विरोध करते हुए इसे निराला तक ले जाते हैं ,तथा सुधीर रंजन के साथ सहमति जताते हैं कि यह हिंदी कविता का ‘बहुत बड़ा डिपार्चर ‘ था ।केदारनाथ जी पुन: कहते हैं –‘ निराला में यह कोशिश थी ।वो छायावाद की खिड़कियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे ।मैं हमेशा कोशिश को भाषा में देखता हूं पहले। क्योंकि पहले वो भाषा में तब आयेगी ,जब आपके भीतर बेचैनी हो ...।
केदारनाथ जी महादेवी की कविताओं के विषय में स्पष्ट कहते हैं कि ‘बहुत बड़ा रेंज उनका नहीं हैं ...लेकिन बड़ी ठनी हुई ,कसी हुई ।‘ इसके साथ ही पंत के साथ तुलना करते हुए यह भी स्पष्ट करते हैं ‘उनके यहां टिकाऊ कविताएं ज्यादा हैं ,सुमित्रानन्दन पन्त की तुलना में ।‘
साहित्य की गांवों में ग्राह्यता के प्रश्न को स्पष्ट करते हुए केदारनाथ जी कहते हैं ‘मैथिलीशरण गुप्त अन्तिम हिन्दी कवि हैं ,जो गांव तक पहुंचे थे ।.....थोड़ा-सा संशोधन करूं तो दिनकर अपने गांव तक पहुंचे हैं ।लेकिन व्यापक गांव तक नहीं पहुच्ा सके ।वो अपने उस इलाके में पहुंचे ‘
केदारनाथ जी नागार्जुन ,राजकमल और इन दोनों की मातृभाषा पर भी खुलकर कहते हैं- राजकमल अकविता का ही नहीं था ,मैथिली का भी था.....नागार्जुन की बहुत सारी कविताएं मूलत: मैथिली में है ।ये लोग अपनी भाषा में जितना परफेक्ट थे ,हिन्दी में नहीं थे ।......ये दोनों अपनी भाषा के कवि पहले हैं ।....ये बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय था उनका ।काश ,मैं मैथिली-भाषी होता।उन दोनों की जो ताकत थी ,उनकी भाषा से आई थी ।भोजपुरी की संभावना को स्वीकार करते हुए भी केदारनाथ जी यह निर्णय देते हैं कि मैथिली की समृद्ध परंपरा उसे मूल्यवान बनाती है ।
अज्ञेय जी और नामवर सिंह के संबंधों को याद करते हुए अज्ञेय जी के द्वारा रिल्के के अनुवाद की चर्चा होती है तथा केदारनाथ जी एक महत्वपूर्ण बात करते हैं कि ‘अनुवाद हम हमेशा अपने समय के लिए करते हैं ,और अपने समय के लिए करेंगे तो अपनी तरह करेंगे ।‘
राजेश जोशी और अरूण कमल पर केदारनाथ जी कहते हैं-‘ राजेश में एक टिपिकल भोपाल का कवि है ।भोपाल कुछ कविताओं में बोलता है .....हर अच्छे कवि की अपनी एक निजी ज़मीन होनी चाहिए.....अरूण का एक अलग रंग है ।उनके यहां बहुत सारे शब्द ऐसे हैं ,जो बोलचाल से एकदम ठेठ बिहार के ,अपनी भाषा के आते हैं ।काफी हैं ऐसे ।वहां वह बहुत जेनुइन लगता है ।आलोक धन्वा में भी उनको अलग रंग दिखता है ,वे उनको महत्वपूर्ण भी मानते हैं ,परंतु ‘ शायद वह अपनी कविता को लेकर किन्हीं कारणों से एक वृत्त में फँसा हुआ है ।उसका विकास और ज्यादा होना चाहिए था ।‘
ज्ञानेन्द्रपति की परवर्ती भाषा पर वे
ऐतराज जताते हैं ,क्योंकि यह थोड़ी विच्छृंखलित सी है और उसमें ‘एक अतिरिक्त साहित्यिक
कोशिश’
दिखती है ।इसके साथ ही केदारनाथ जी बाद वाले कवियों में उदय प्रकाश ,बद्रीनारायण
,विनोद कुमार शुक्ल और विष्णु खरे को भी महत्वपूर्ण मानते हैं ।
(साभार 'प्रगतिशील वसुधा' ,केदारनाथ सिंह ,सुधीर रंजन)
(साभार 'प्रगतिशील वसुधा' ,केदारनाथ सिंह ,सुधीर रंजन)
Sunday, 17 November 2013
Thursday, 31 October 2013
काशी और कुटिलता : व्योमकेश दरवेश
काशी में विद्वता और कुटिल दबंगई का अद्भुत मेल दिखलाई पड़ता है ।कुटिलता
,कूटनीति ,ओछापन ,स्वार्थ आदि का समावेश विद्वता में हो जाता है । काशी
में प्रतिभा के साथ परदुखकातरता ,स्वाभिमान और अनंत तेजस्विता का भी मेल
है जो कबीर ,तुलसी ,प्रसाद और भारतेंदु ,प्रेमचंद आदि में दिखलाई पड़ता है ।
काशी में प्राय: उत्तर भारत ,विशेषत: हिंदी क्षेत्र के सभी तीर्थ स्थलों
पर परान्नभोजी ,पाखंडी पंडों की भी संस्कृति है ,जो विदग्ध ,चालू
,बुद्धिमान और अवसरवादी कुटिलता की मूर्ति होते हैं । काशी के वातावरण में
इस पंडा संस्कृति का भी प्रकट प्रभाव है । वह किसी जाति-सम्प्रदाय
,मुहल्ला तक सीमित नहीं है ।वह ब्रह्म की तरह सर्वत्र व्याप्त है ।पता
नहीं कब किसमें झलक मारने लगे ।
(विश्वनाथ त्रिपाठी'व्योमकेश दरवेश ' में )
(विश्वनाथ त्रिपाठी'व्योमकेश दरवेश ' में )
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