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Sunday 9 December 2012

मैं एक कवि था

गुरूजी सही कहते थे कि बचुवा पहले खूब पढ़ ले तब लिखना


और हम इतना जल्दियाए थे कि कहते थे बस्‍स गुरू जी बस्‍स

और एक दिन एक कवि का शीर्षक मैच कर गया तो

 एक ससुरा इतना जोर से डांटा कि जैसे उनकी बछिया चुरा ली हो हमने

और इसी तरह एक दिन किसी कविता की गाली भी

तो लगा ऐसे जैसे सारी गालियां का कॉपीराइट उन्‍हीं के पास हो

हरेक डांट-फटकार ,गाली-गलौज में याद तो आते हैं गुरू जी

पर जितना कठिन है गलती मानना उससे भी कठिन महाभूतों का साक्षात्‍कार

सो गुरू जी क्षमा करिएगा कविता का विकास ऐसे ही लिखा था

पटना में दिल्‍ली में इंदौर में और आगे भी और आप जहां हैं वहां भी

और कविताओं की संख्‍या उतनी तेजी से बढ़ रही है जितनी तेजी से छोटका गिनती सीख रहा है

और पत्‍नी भी मुंह चमकाकर हाथ नचाकर विद्वान मानने लगी है

सो गुरू जी सही सही बताइएगा क्‍या गुरूआइन भी इसी तरह हाथ नचाकर आपको सराहती थी
जब दुनिया के सारे संज्ञा-सर्वनाम ,क्रिया और विशेषण घिस चुके थे
बिक चुका था मैगजीन और चौराहों का हरेक कोना
हम भी पुराने आइडिया को पूरी बेशरमी से मौलिक कह संपादक को भेजते
और संपादक भी उसी तेजी से आभार प्रकट कर चुप्‍पी मार देता
दरअसल अब कविता को अस्‍वीकृत नहीं किया जाता था
और कविता लौटाना भी पुराना फैशन था
इसी सुविधा ने मुझे कवि बनाए रखा सालों साल
और मैं भी एक कवि था
मेरे भी कुछ छंद थे ,विषय था
कुछ मेरे भी पाठक थे ,श्रोता भी थे
मंच ,गुट और कंठ को सुरीला बनाता
गोलमिर्च ,अदरख खाता
मैं एक कवि था

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