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Saturday, 4 June 2011

रात सवा ग्‍यारह का ट्रेन

रात सवा ग्‍यारह की ट्रेन
तडके चार बजे उतारती है मुजप्‍फर पुर
मात्र छह घंटे में पत्‍नी और बच्‍चों से मिलने की संभावना
जितनी ही गुदगुदाती है
उतना ही दुतकारता है
अहं का विवेक
क्‍या वह फोन नहीं कर सकती है
परास्‍त करता है तर्क कि
कल ही तो मॉ को बोले हो कि अभी घर नहीं आऐंगे
पहाड की तरह दिखने लगते हैं विभाग के अधिकारी
पिछले महीने ही तो छुटटी लिए हो
निरूत्‍तर कर देता है
सास ससुर की चालाक प्रश्‍नावली
दीवाल घडी की निस्‍संगता व मोबाइल फोन की चुप्‍पी से खतम होता है
एक और युद्ध
बैग थका है पहले ही घर जाने की कल्‍पना से
उसका खुला हुआ मुंह अपलक
हमको भी डरा रहा है ।
तीन सौ किलोमीटर की दूरी बढ रही है
गणितीय सूत्रों की परवाह किए बिना
अप्रारम्‍भ यात्राओं की कहानियां बढ रही है ।

Friday, 20 May 2011

हे नए कवि

हे नए कवि सबको साधे रहो
क्‍या प्रगति क्‍या प्रयोग
बस आलोचक को नाथे रहो
लिख कम बोल कम
गुरूजन सिर माथे रहो
छपो दिखो गुणो बंधु
बस संपादक को बांधे रहो

Tuesday, 17 May 2011

स्‍थगित था कविता लेखन


(जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री के साहित्यिक अवदान पर प्रेम भारद्वाज के द्वारा की गयी अविवेकपूर्ण टिप्‍पणी को समर्पित)
स्‍थगित था कविता लेखन
भ्रष्‍टमंडल खेल भी
उठबा न सका लेखनी
ए राजा भी नहीं
न ही मनमोहिनी चुप्‍पी
भट़टा परसौल की घटना को
समझ कर मायावी राजनीतिक हथकंडा
खामोश रही लेखनी

कि
अचानक महाप्रयाण पर चले गए
जानकी वल्‍लभ जी
आचार्य जी
शास्‍त्रीजी
अचानक नामवर आलोचक के अनुचरों को
याद आ गए लीद ,कूडा जैसे शब्‍द
महान गुरूओं से परंपरा स्‍वरूप
लिए गए हैं ये शब्‍द
क्रितघ्‍नता इतनी कि गुरूओं को
क्रितज्ञता ज्ञापन तक नहीं
नाम कमाना चाहते हैं ये
नाथूराम गोडसे की तरह
पर अफसोस
कायर इतने कि
सामने से फायर झोंकने की जगह
उचित समझते हैं
सज्‍जन पुरूष के दरवाजे पर
लीद फेंकना
और आज का तथाकथित
मेरे जैसा समाज सुधारक
उठा लेता है
झाडू की जगह कलम ।

Sunday, 15 May 2011

संपादकीय विवेक:संदर्भ पाखी मासिक मई 2011

एक संपादक की चिंता बहुत कुछ आलोचकीय चिंता है ,पर यह उन मायनों में अलग है कि उसको निष्‍कर्ष नहीं देना है ,बस सामने रख देना है ।बहुत कुछ होटल के बैरों की तरह जो बस पूरी स्‍वच्‍छता के साथ खाना पडोस देता है ।आपने खाना दिया भी नही और गाहक की संतुष्टि व बिल की चिंता आपको सताने लगे तब तो आप होटल मालिक खूब बने ।पाखी के संपादक मई 2011 के संपादकीय में काफी जल्‍दी में हैं ।उनको एक साथ ही जानकी बल्‍लभ शास्‍त्री,गोपाल सिंह नेपाली और आरसी प्रसाद सिंह पर निष्‍कर्ष देना है ।
( मगर जब मैंने उनको पढा तो निराशा हुयी ।जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री का लिखा ज्‍यादातर एक अर्थ में कूडा ही है ।शास्‍त्री जी छायावाद से निकल नहीं पाए जबकि वहां उनकी जगह नहीं थी ।यही हाल गोपाल सिंह नेपाली और आरसी प्रसाद सिंह का भी है जिनके साहित्‍य में हमें कुछ खास मिलता नहीं है ।अनुकरण बहुत आगे तक नहीं ले जाती है, न ही वो आपको आपका स्‍थान दिलाती है। परिवर्तन ही रचनाकार को सही पहचान दिलाता है ।इतिहास में दर्ज भी कराता है ।)
इससे पूर्व वाराणसी में पाखी के ही एक समारोह में नामवर सिंह ने पंत जी के लेखन में से अधिकांश को कूडा कहा ।लगता है कि प्रेम भारद्वाज ने अपने गुरू से संपादकीय क्षमता में मात्र कूडा शब्‍द ही जोडा है ।नामवर सिंह के उक्‍त बयान से भी काफी बवाल मचा पर पाखी की टी आर पी बढ चुकी थी ।लेकिन मात्र उत्‍तेजक बयानों से कब तक साहित्‍य की गाडी बढेगी ।
इतिहास में नाम दर्ज कराने के लिए व्‍याकुल इस संपादक से मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि केवल सडक और खेत ही नही होती ,बल्कि सडक और खेत के बीच में भी कुछ जमीन होती है ,उस जमीन को सरकार अपना कहती है और किसान अपना ।जाहिर है कि साहित्‍य और समाज में भी यह उभयनिष्‍ठ चिंताएं एवं पहचान होती है ।जब हम लंबाई मापक यंत्रों की सहायता से विभाजन करने व निष्‍कर्ष निकालने पहुंचते हैं तो हमें प्राय: निराशा होती है ,परंतु दोष तो मेरे उपागम का है ।
छायावाद में केवल चार व प्रगतिवाद में केवल तीन कवि ही नहीं हैं न ही उत्‍तर छायावाद का मतलब केवल दिनकर और बच्‍चन से है।ये महान धाराएं थी तथा इसमें सैकडों कवि योग दे रहे थे ।अत: दो या तीन को स्‍वीकार कर शेष को नकारना किस प्रकार की काबिलियत है ।साहित्‍य में कूछ खास खोजने के लिए टार्च भी खास होना चाहिए ।बने बनाए सांचे से एक ही तरह की मूर्ति निकलती है ।नई मूर्ति चाहिए तो सांचे को तो परिवर्तित करिए ।
साहित्‍य में संहार शैली का कोई स्‍थान नहीं है ।भले ही महान आलोचकों ने अपने अप्रिय साहित्‍यकारों को खारिज करने के लिए इसका उपयोग किया हो ।राम विलास शर्मा के द्वारा जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री व नामवर सिंह के द्वारा नकेनवादियों ,राम स्‍वरूप चर्तुवेदी के द्वारा प्रगतिवादियों के नकार ने साहित्‍य का कहीं से भी भला नहीं किया ।प्रेम भारद्वाज जी पुरखों को सम्‍मान देना सीखिए ।

Saturday, 19 March 2011

बेटा बैनीआहपीनाला

हम निछन्‍द उस्‍सर बलुआहा
रसगंगाधर बन तू निराला
दिखे दिन कर दुपहरिया के
नही मरीचिका न छल सपना
सींच रहा अपनी मरूभूमि
किसकी साकी कौन सा प्‍याला
भले बाप को रंग का लाला
बेटा बैनीआहपीनाला






Wednesday, 16 March 2011

बैद्यनाथ मिश्र यात्री अर्थात नागार्जुन

नागार्जुन बहुआयामी हैं ।जितने क्‍लासिक,उतने ही भदेस ।रीतिवाद के धुरविरोधी,परंतु कविता कहने की रीति के प्रति पूरी तरह से सजग ।यहां तक कि उनकी कविता में रीतिवाद का भी संकेत है ,अर्थात उनकी कई कविता उस लक्ष्‍य को संकेतित करती है कि कविता कैसे कही या लिखी जाए ।जन्‍म से मैथिल परंतु समूचे ब्रह्माण्‍ड के अनुभव से तादात्‍म्‍य स्‍थापित करते । मिथिला और ग्राम तरौनी के प्रति प्रेम सिंध,श्रीलंका ,तिब्‍बत के प्रति प्रेम को कम नहीं करता है ।अष्‍टभुजा शुक्‍ल उन्‍हें छन्‍दोमय कहते हैं ,वे नागार्जुन को छन्‍दबद्ध या मुक्‍तछंद में बांटने की कोशिश को महत्‍व नहीं देते ।

नामवर सिंह ने भी नागार्जुन के विषय चयन की विविधता को आश्‍चर्यसहित स्‍वीकार किया है । केदार,शमशेर जैसे अपने समकालीनों के साथ ही कालिदास,विद्यापति,निराला,रवीन्‍द्रनाथ जैसे स्‍थापित स्‍तंभों के साथ बाबा एक ही लय में संवाद करते हैं ।इसी प्रकार जवाहर लाल ,माओ ,जेपी ,इन्दिरा जैसे राजनीतिक व्‍यक्तित्‍व से भी काव्‍यात्‍मक आलाप करने में वे देरी नहीं करते ।यही नही बाल ठाकरे जैसे विवादास्‍पद व्‍यक्ति को ऐसी तैसी करने के लिए भी वे कविता का ही सहारा लेते हैं ।यही नही भोजपुर के क्रांतिकारी आयाम को खुलकर स्‍वीकार करते हुए सामंतवादियों के द्वारा हरिजनों के जलाने को भी कविता का विषय बनाते हैं । वर्तमान के प्रति उनका यह अनुराग उनके काव्‍यशिल्‍प ही नही उनकी कविता को परखने वाले औजारों को भी प्रभावित करती है ।केदार नाथ सिंह ने अपने पुस्‍तक समय के शब्‍द में इसे ही खतरनाक ढंग से कवि होने का साहस कहा है ।

विद्वानों ने बताया है कि ये कविताएं अपनी तात्‍कालिकता के बावजूद स्‍थायी महत्‍व को धारण करती है ।केवल मार्क्‍्सवाद ही नहीं लोक और शास्‍त्र का प्रगाढ अनुभव भी नागार्जुन के अदभुत कवि व्‍यक्तित्‍व से मिलकर तात्‍कालिकता को सार्वभौम रसायन में परिवर्तित करती है ।संवेदना की जटिल व बहुस्‍तरीय परत इन कविताओं को अखबारी होने से बचाती है ।

कबीर के बाद वे संभवत: पहले कवि हैं,जिनके यहां जीवन व कविता एकरूप हो गया हो,शायद निराला से भी ज्‍यादा ।उनके कविता की प्रतिज्ञा उनके जीवन की प्रतिज्ञा से उद्भूत हुई है ,और उनकी कविता उनके जीवन की ही तरह ज्‍यादा प्रतिज्ञा करने में विश्‍वास नहीं करती ।इसीलिए वे कट्टर मार्क्‍सवादी होते हुए भी जीवन की बाधाओं के प्रति ही प्रतिश्रुत हैं न कि किसी भी प्रकार के वाद के प्रति ।

आधुनिक काल के वे विरले लेखक हैं जिन्‍होंने हिंदी के साथ ही मैथिली,बांग्‍ला और अन्‍य भाषाओं में गंभीरता से लेखन किया हो ।वे इन तमाम भाषाओं को जानने वाले के प्रिय कवि हैं तथा उनकी कविताओं पर इन सब लोगों का अधिकार है ।आज फेसबुक पर कुछ लोगों के द्वारा इस बात पर बल दिया गया कि चूंकि बाबा को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मैथिली रचना पर मिली ,अत: अकादमी द्वारा बाबा के सम्‍मान में आयोजित समारोह में मात्र मैथिली भाषा और साहित्‍य के विद्वानों को ही बुलाना चाहिए ।मेरे विचार में यह उचित नही है । बाबा का लेखन ही इसका सबसे बडा प्रमाण है ।लेकिन बाबा की जिन्‍दगी उनकी कविता की ही तरह तमाम चित्‍ताकर्षक चित्रों से भरी है ,इसका कोई एक पाठ संभव नही है ।




रवि भूषण पाठ‍क

Monday, 14 March 2011

नामवर सिंह भारतीय आलोचना के केंद्र में हैं,विभिन्‍न विवादों के बावजूद उनके किताबों,लेखों व भाषणों ने सर्जनात्‍मक उत्‍तेजना पैदा किया है ।उनके कहे गए एक एक शब्‍द के पक्ष व विपक्ष में आपको हथियारबंद आलोचकों का समुदाय मिल जाएगा ।उनकी केन्‍द्रीयता को स्‍वीकार करते हुए एक मैथिली में हास्‍य कविता लिखी गई है ,जिसमें एक हिंदी आलोचक उनको मिल रहे सम्‍मान से क्षुब्‍ध है ।यह कविता होली के अवसर पर मैथिली पाक्षिक विदेह के 78 वें अंक में प्रकाशित हुई है ।
ई नामवर बहुत सताबइ
ई नामवरबा बहुत सताबइ
कखनो टीवी,कबहु रेडियो
ब्‍लॉग,न्‍यूज पर आबइ
तुरते मम्‍मट,तुरत लोंजाइनस
मुक्तिबोध बताबइ । ई नामवरबा 0000
कविता नाटक उपन्‍यास पर
अजबे गजब सुनाबइ
नागार्जुन अपभ्रंश हजारी
सबहक सत्‍व दिखाबइ
लिख मारलक दू चारि किताब बस
बाजि बाजि घोलटाबइ । ई नामवरबा 0000
आब रमत नहि लिखत पढत मे
बात से बात निकालइ
बाज बाज वौआ दिन तोहर
शणियो सुघड,मंगलबो गाबइ । ई नामवरबा 0000
की खाइ छें,कोन पानि पिबइ छें
घाट घाट के वानि बजइ छें
हमरो दे किछु जंतर मंतर
बाजी कम ,गुण अधिक सुनाबइ ।
ई नामवरबा बहुत सताबइ ।
ई नामवरबा बहुत सताबइ ।

Saturday, 19 February 2011

फिल्‍म दबंग का उत्‍तर आधुनिक संदर्भ


यहॉ इतिहास का अंत नही है ,बल्कि नैतिकता का अंत है ।यह अंत कोई दुर्घटना का परिणाम नहीं ,सुनियोजित भी नही ,बल्कि हमारे युग के ही एक क्षण की परछाई है(प्रतिबिम्‍ब नही) ।यह चुलबुल पांडे नामक पुलिस इंस्‍पेक्‍टर की कहानी है ।ऐसा मनबढ् इंस्‍पेक्‍टर जो रिश्‍वतखोरी को दबंगई से अपनाता है ।रिश्‍वत के प्रति उसके मन में कोई दुविधा नही है ,वह घूसखोरी के रकम को अपने पराक्रम से इकट्ठा करता है व अपने पूजनीया माता के पास जमा करता है ।यह पैसा जब उसका भाई मार लेता है ,तो पहली बार क्रोध ,क्षोभ उसके चेहरे पर दिखता है ।वह भी अपने छोटे भाई के मंडप पर अपनी शादी कर हिसाब बराबर कर लेता है ।यह इंस्‍पेक्‍टर एक निम्‍न वर्ग की लडकी पर रीझता है ,तथा अपनी पुलिसिया हरकतों से उसे प्राप्‍त करता है । यह ईसवी सन2011 का प्रेम है ,यह खालिस भारतीय मानकों का प्रेम नही है ।चुलबुल पांडे की प्रेमिका भी ऐसा ही वरण करती है ,वह अपने पिता को पत्‍थर से बेहोश कर प्रेमी के संघर्ष को देखना पसंद करती है ।चुलबुल के भाई का प्रेम भी तात्विक रूप से वही है ।साथ साथ घूमने,सिनेमा देखने ,चिपक के बैठने का प्रेम ।वह इस क्षण को विवाह के रूप में स्‍थायी बनाना चाहता है । यह फिल्‍म भारतीय पारिवारिक संबंधों के विघटन का बयान करती है ।इंस्‍पेक्‍टर अपने माता के दूसरे पति को कहने के बावजूद प्रणाम नही करता है ।उसकी प्रेमिका पिता के मरने के कूछ ही घंटे बाद प्रेमी के साथ सामान्‍य हो जाती है ।एक दारोगा कस्‍तूरी लाल अपने होने वाले दामाद के राजनीतिक फायदे के लिए आपराधिक साजिश में शामिल होता है ।छेदी सिंह नामका गुंडा उसका आदर्श दामाद है ।भावी दामाद चुलबुल पांडे अपने ससुर को थाना में बन्‍द कर देता है ,तथा बाद में आत्‍महत्‍या के लिए उकसाता है ।उसे एक गरीब वर्ग की लडकी को हासिल करने के लिए दरोगपनी करने में शर्म नही आती है ।कहानी का ये आयाम हास्‍य नही उत्‍पन्‍न करती ,बल्कि गंभीरता से कुछ लोगों के हरकत को सामने लाती है ।नैतिकता व ईमानदारी से मुक्‍त चुलबुल पांडे की ये कहानी इन्‍हीं अर्थों में उत्‍तरआधुनिक है । पचास व साठ के भारतीय फिल्‍मों के नायक भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम व भारतीय आदर्शो को ढोते थे ,सत्‍तर व अस्‍सी के दशक में भारतीय महानता व भारतीय आदर्शवाद का मिथक सभी क्षेत्रों में टूटा ।अमिताभ भारतीय निराशा के एक सफल प्रतिनिधि बने ,उनके क्रोध ,प्रतिशोध में युवामन की झांकी देखी गयी ,ईसवी सन 2011 के सलमान नए नायक हैं ,अपने प्रतिनायक की ही तरह ।उनके यहां सत्‍य व असत्‍य का परदा और झीना हो गया है ।दिलीप कुमार को आप फिल्‍मों में मॉ के लिए सब कुछ करता देख सकते थे,अमिताभ ने फिल्‍मों में बिना मॉ के जीना सीखा ,इस सलमान को मॉ शब्‍द सुन के 'तेरी मॉ का ' याद आता है ।

फिल्‍मों का यह वैचारिक युगान्‍तर फिल्‍म में किसी लेखक या निर्देशक का सुनियोजित कार्यक्रम नही है ,क्‍योंकि फिल्‍म के शेष भाग,गाना,लटके झटके ,हीरो विलेन ,मॉ बाप ,भाई भाई ,प्रेमी प्रेमिका के वही घिसे पिटे तरीके अपनाए गए हैं ।फिल्‍म में पुलिस डकैत,तस्‍कर,खूनी के पीछे नहीं पडी है ,वह घूस का पैसा खाते ,गाना गाते ,नाचते हुए अपने दारोगा के लिए लडकी पटाते हुए मस्‍त मस्‍त है ।यह पुलिस पैसों के लिए डकैतों को जाने देती है तथा प्रोमोशन के लिए अपने ही हाथ में गोली मारती है ।ऐसे ही सिपाही की पत्‍नी का उस तथाकथित वीरता का पुरस्‍कार व पैसा ले कर चहकना वीभत्‍स रस पैदा करती है ।यह कई मायनों में विचित्र फिल्‍म है यहां प्रेम से श्रंगार रस पैदा नहीं होता ,मौत से करूण व पूजा से भक्ति भाव का दूर दूर तक कोई रिश्‍ता नही है ।
जाहिर है कि हमारे जीवन में भी तो नायक बदल चुके हैं ।गांधी ,भगत,सुभाष के बाद जेपी ,लोहिया और अब तो इंदिरा व ज्‍योति बसु का भी जमाना बीत गया है ।अब हमारे खास तरह व भंगिमा वाले नेता हैं ।वो ईसीलिए ईमानदार हैं कि अदालत ने उन्‍हें दोषी नही ठहराया है ,ठहरा दिया तो अदालती अपील की लंबी चेन उन्‍हें राहत पहुंचाती है ।हमारा नायक चुलबुल पांडे भी वीर सांघवी की तरह टाटा व राडिया के लिए ही जीता है ।उसकी सारी क्षुद्रता व औदात्‍य उसी महान वर्ग को समर्पित है

Tuesday, 15 February 2011

देश एक नदी का नाम है

देश एक नदी का नाम है
दांत,पंजे व विषैले पूंछो वाले
बहते हैं जहां जानवर व भाषा एक साथ
चीखचित्‍कार पर चकित होने की मनाही है भाई
सौ वरस पहले की बात है
प्रकट हुई खडीबोली
इतिहास के दांत
राज के पंजों के साथ
दबोची गई थी अवधी,ब्रजभाषा जैसी कई
चित्‍कार पर प्रसन्‍न थे
भाषाविद,समाजशास्‍त्री व देशप्रेमी
किसी ने भी पूछी नही
अवधी की ईच्‍छा
सब प्रसन्‍न हो
देख रहे थे खडी बोली के नाखून
अभी भी तो नजर है
मैथिली,राजस्‍थानी पर
नदी के साथ ही
मेरा भी एक मैला आंचल है
बाप जिन्‍दा हैं
बिज्‍जावई भाषा के साथ
देवभाषा उनकी मंत्रों में ही जिंदा है
वे सस्‍नेह सुन रहे हैं
पोते का ईटिंग सुगर नो पापा
पत्‍नी मेरी बैठी है
विशाल डैने के साथ
बच्‍चा अब पढेगा
ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्‍टार

Friday, 11 February 2011

हिंदी पेंगुइन


पेंगुइन हिंदी का मतलब ये तो नही है मित्र
क्‍या पेंगुइन हिंदी जानती है
या हिंदी के लिए कोई पेंगुइन है
पेंगुइन और हिंदी गुत्‍थम गुत्‍था कोई चीज है
फेसबुक पर पेंगुइन हिंदी नाम का कोई मेरा मित्र है
जो दिल्‍ली से है व अभी भी दिल्‍ली में है
मतलब कि पेंगुइन‍ हिंदी व दिल्‍ली की है
व अभी अभी झूठ बोलना सीखा है
इस नवसिखुए झूठक्‍कर को
इस दुनिया में मुझसे ज्‍यादा मित्र हैं
माफ करना भाइयों
जबकि दुनिया में उल्‍लू,बाज व गिद्ध की मॉग है
हमने चयन किया है
पेंगुइन की
यह चिरश्रांत आ रहा है
धीरे धीरे धीरे
हिंदी ,भोजपुरी ,मगही
ब्रज ,मैथिली, पंजाबी की तरफ
उसका चलना उडना
व तैरना बात एक ही है
व हिंदी का होना
व नही होना भी बरोबर है

Thursday, 3 February 2011

मम्‍मट के शहर में शक्ति कपूर

किशोर नाभि के एक बीते नीचे के
अनिवार्य भदरोये से ज्‍यादा नही हो मित्र
साहित्‍य,कला,फिल्‍म के मेरे नवोदित साथी
वो उतना ही ताकतवर व खतरनाक है
जितना कि प्रौढ जांघों के बीच की मुद्राएं
जबकि यह साबित हो चुका है
कि शमशेर ज्‍यादा काबिल थे
बेबकूफी मेरी मिलाती है मुझे
धुमिल व राजकमल से
जांघ व जीभ के चालू मुहावरे दिखते हैं मोहक

मुझ असभ्‍य को

जबकि कविता मांगती है तमीज

व मैं उतना ही झुकता चला जा रहा हूं जांघ की तरफ
आचार्य जगन्‍नाथ ने किया ही क्‍या है

अब तो शक्ति कपूर भी बस गए हैं

मम्‍मट के शहर में
व सिखा रहे नवोदिताओं को साधारणीकरण

फिल्‍म,रस व नाडा में अंतर ही कितना है
दिल्‍ली व पटना के उस्‍ताद
जब बोलेंगे कविता के संकट पर
उनका ध्‍यान क्‍या नही जाएगा उन थीसिस पर
जो उनके चौथेपन में भी बना
पुरूषार्थ का साधन
आखिर मैं कहना क्‍या चाहता हूं
शिलाजीत की शक्ति अमोघ है
व कविता छनभंगुर है
कविता का तनाव,गुरूत्‍व ,प्रत्‍यास्‍थता
व सुघटयता भौतिकी का विषय नही























Sunday, 16 January 2011

उंगलियों का गुण धर्म

फेसबुक की दुनिया में कोई माईबाप नही है   

यहां दोस्‍त हैं या नहीं हैं   
या फिर दोस्‍तों के दोस्‍त हैं   

हमारे कई दोस्‍त हमें महिला समझ  

या फिर कवि,पत्रकार,बुदिधमान समझ बहुत स्‍नेह देते हैं  

जो भी हो,यह स्‍नेह मुझे बहुत प्रिय है   

फेसबुक के मेरे अग्रजगण साहित्‍य,कला,पत्रकारिता,व्‍यवसाय के मंजे खिलाडी हैं    
इनको पता है कब किसको क्‍या कहना है   
कब किससे कुछ कहना है सटना है   

यहां उंगलियों से पसन्‍द किए जाते हैं   
 उंगली से ही निबाही जाती है        

उंगलियों से ही दिल ,देश पर नजर रखते हैं  
खता इन्‍हीं की है,क्‍यों सर कलाम होगा  
ज्‍यादा से ज्‍यादा उंगली तमाम होगा    

बदल गया है उंगलियों का गुणधर्म  
देश अब माल हो गया है   
देश उंगलीमाल हो गया है   






Wednesday, 5 January 2011

द बर्थ

अर्धनारीश्‍वर संपादक के गल चुके 

गर्भाशय से ही ब्‍लाग जन्‍मा

  लाश के पेट के उपर प्रतीकों का गटठर  छाती की तरह उठा था
 हाथ की उंगलियों से कम था बारहमासा
 फुसफुसाता मुंह उसका अस्‍तव्‍यस्‍त भाषा की तरह अस्‍पष्‍ट था
 नथूने में उसके कमसिन कवयित्रियों के याद का गंध था
 जिसकी कविताएं प्रतिमाह छप रही थी
झिलमिलाते आंख के सामने था
लौटाई गई कविताओं के टटके बिम्‍ब
ऐसी ही कहानियों के दर्द 
संपादक के कान में गर्म तेल की तरह घुस रहे थे
 प्रकाशन और पुरस्‍कार की शताधिक अंर्तकथाएं
  डॉक्‍यूमेंटरी फिल्‍म की तरह सादी और उबाउ लग रही थी
  संपादक आज देह त्‍याग रहा था
  उसके पोर पोर से नया कुछ उग रहा था









Monday, 3 January 2011

सुनो विनायक सेन सुनो

नववर्ष व शनिवार का दिन
मैं भी पहुंचा दूमहली हनुमान जी के पास
वैसे तो मेरे गांव में कई हनुमान जी हैं
एक पोखरी के पास
एक पीपल के नीचे
बभनटोली के पास एक
व चमरटोली के पास एक था
कई मूर्तियां और आ गई है
जगह भी छेक ली गई है
परन्‍तु दूमहले हनुमान की कीर्ति ही कुछ और है
इसके पहले महल पर लूले,लंगडे,भीखमंगे थे लाईन लगाए
वे हनुमान जी से ज्‍यादा लडडू को खोज रहे थे
दूसरे महल पर ज्‍यादा शांति थी
यहां चारा,हवाला,कफन,संचार जैसे अनिवार्य सेवा से जुडे घोटालेवाज भक्ति में मगन थे
हनुमान जी के मुंह पर पर्दा था
कोई पुजारी ही यह हटा सकता था
अचानक हवा से हो गए हनुमान बेपरदा
उनके नथूने क्रोध से फूले हुए थे
किसी महान कष्‍ट से मुंह बन्‍द था उनका
विशाल गदा से झुक रहा था उनका कंधा
हनुमान को देखकर भी घोटालेबाज जमे रहे
कुछ नहीं बिगडने का दम्‍भ उसके चेहरे पर था
हनुमान जी चाहकर भी कुछ नहीं कर रहे थे

शायद वे डरे थे अपने पुजारी से 

या उस ठेकेदार से जो व्‍यवस्‍था करता है उनके भोग का
अब बताओ विनायक सेन
तुम्‍हारे रिहाई का अर्जी किसे दूं
जल्‍द ही जबावी चिटठी भेजो
हां चिटठी में सूरज तारे की बात मत करना

सरकार को पता है कि सूरज में एटम बम होता है
व बम से सब कुछ हिल जाता है 

शेष सब ठीक है 




Wednesday, 29 December 2010

सम्‍पादक का अंत

ओ नि‍रंकुश स्‍वेच्‍छाचारी मनमौजी संपादक
राजतंत्र के समाप्‍त होने के बाद
झेल रहा तुझे दो सौ साल से
तेरा ही वाद, आंदोलन
तेरी कवि‍ता तेरा जीवन
तेरी ही आंख से देखता
वि‍रक्‍ति व समर्पण
तेरे ही यति,छंद,गीत
क्‍या वसंत क्‍या शीत
स्‍वार्थ का मि‍तकथन
हि‍त का अति‍रेक
कहां था इसमें
आलोचना का वि‍वेक ।
जि‍सको चाहा
छाप ली
इसी तरह लौटाई
जूही की कली ।
वादों आंदोलनों की महाशती
से वि‍चरता
मैं आ पहुंचा वाद के अंत तक
तुमने यह भी बताया कि‍
वि‍चारधारा व इति‍हास का भी अंत हो चुका है
तुने यह नहीं बताया कि‍ वि‍द्वता का भी अंत हो चुका है
खतम हो चुका है वह छन्‍नी
मर चुका है संपादक
संपादक के गल चुके गर्भ से ही
ब्‍लाग का जन्‍म हुआ ।




Wednesday, 8 December 2010

hindi sahitya: विदेह तो नहीं हो न

hindi sahitya: विदेह तो नहीं हो न: "यह कविता 9जुलाई 2008 को मेरे ग्राम करियन,समस्‍तीपुर में आयोजित मेरे पुत्रों चिरंजीवी सुन्‍दरम व शोभनम के मुंडन संस्‍कार के लिए वितरित आमंत्..."

विदेह तो नहीं हो न

यह कविता 9जुलाई 2008 को मेरे ग्राम करियन,समस्‍तीपुर में आयोजित मेरे पुत्रों चिरंजीवी सुन्‍दरम व शोभनम के मुंडन संस्‍कार के लिए वितरित आमंत्रण पत्र पर छपी थी ।