नीरज और शक़ील ,साहिर ,जिगर के फिल्मी गीतों एवं गैरफिल्मी साहित्यिक कार्य में एक ख़ास अंतर है । नीरज फिल्मी गीतों में ही अपनी रौ में होते हैं । 'वो हम न थे ' , 'ऐ भाई ' , ' फूलों के रंग से ' ,' दिल एक शायर है ' , 'आज की रात बड़ी' या फिर 'स्वप्न झरे फूल से ' जैसे गीत ही उनकी प्रतिनिधि कृति है । इन गीतों की सफलता को वे अच्छी तरह से भुु नाते हैं , मंच पर भी ,साहित्यिक जगत में भी । मंच पर उनकी सफलता अप्रतिम ,असंदिग्ध है ,परंतु यही कारनामा वे साहित्यिक पत्रिकाओं ,मुख्यधारा की स्वीकृतियों में नहीं कर पाए । इस अस्वीकृति को वे पचा भी नहीं पाए ।उनके लेखन का एक चौथाई तो इस अस्वीकृति को लेकर दर्द ही है । इस दर्द को उनका छायावादी संस्कार एक शिल्प तो दे देता है ,परंतु वे कविताएं अभूतपूर्व ,अद्वितीय नहीं है ।वे एक खास साहित्यिक धारा की धुुॅुँधली अनुकृति के रूप में दिखती है ।शक़ील और साहिर के साथ दूसरी चीज है ।वे दोनों जगह सार्थक भी हैं ,सफल भी । फिल्मी गीतों में कहीं-कहीं वे बाजार के दबाव में आते भी हैं ,पर मुख्यधारा की उनकी शायरी की सृजनात्मकता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है ।
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Thursday, 22 August 2019
Thursday, 8 December 2016
हजारी प्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारी
प्रसाद द्विवेदी
सांस्कृतिक निरंतरता और अखंडता के बोध
के साथ पदार्पण ।अनुसंधानपरक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर
समीक्षा कार्य कार्य ।नवीन मानवतावाद और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के कारण उनका
पांडित्य सर्वस्वीकार्य ।संस्कृत साहित्य ,रवीन्द्र साहित्य तथा लोकोन्मुख
आधुनिक बोध से एक नए तरह का आलोचना ।
दृष्टि--
दृष्टि--
1स्व्च्छन्दतावादी एवं ऐतिहासिक
समीक्षा शैली जो क्रमश: मानवतावादी एवं समाजवादी मूल्यों को स्वीकारने से पुष्ट
होती चली गयी है ।
2 हिन्दी साहित्य को ‘भारतीय चिन्ता का स्वाभाविक विकास’ माना , ‘हतदर्प पराजित जाति की सम्पत्ति’ नहीं ।
3व्याख्यात्मक आलोचना पर्याप्त नहीं
,आलोचना का मूल्यांकन आवश्यक ।इसके लिए संस्कृत के लक्षणग्रंथ पर्याप्त नहीं ।
4साहित्य का चरम लक्ष्य – ‘मनुष्य’ ।
5 यथार्थ का मतलब प्रकृतवादी असीमित यथार्थ नहीं , कला माध्यमों के विशिष्ट प्रयत्नों एवं चयनों का महत्व स्वीकारा ।
5 यथार्थ का मतलब प्रकृतवादी असीमित यथार्थ नहीं , कला माध्यमों के विशिष्ट प्रयत्नों एवं चयनों का महत्व स्वीकारा ।
6 जीवन और साहित्य राजनीति ,अर्थनीति
,आधुनिक विज्ञान के बिना मात्र वाक्विलास ।
7 कविता भी ‘स्वर्गीय कुसुम’ नहीं ।यह केवल कौशल नहीं ।
8 लोकभाषा ही वास्तविक और सच्ची भाषा
।इसकी शैली सहज ,आडम्बररहित एवं प्रसन्न ।इसी में शक्ति और प्रभाव ।
8 छन्द को रसानुभव का सहायक माना ,जो
वाणी में आवेश की गति आ जाने से भावावेग के प्रकाशन में सुविधा करती है ।
9 शब्दों को कवि के देश-काल से जोड़ना ।
9 शब्दों को कवि के देश-काल से जोड़ना ।
10आदिकालीन साहित्य के विरोधाभासों की
काव्य-रूढि़यों एवं कथानक-रूढि़यों के माध्यम से व्याख्या ।
11 साहित्य को वृहत सांस्कृतिक आयामों
से जोड़ा ।साहित्य के साथ ही उस युग की समस्त साधनाओं- नृत्य ,कला ,इतिहास
,विज्ञान आदि की बात भी करते हैं ।
योगदान/ व्यावहारिक समीक्षा
1’सूर-साहित्य’ को भक्तिशास्त्र और समाजशास्त्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आकलित किया
।कृष्ण के व्यक्तित्व में समाहित विभिन्न धर्म साधनाओं के मार्मिक तत्वों की
व्याख्या ।राधा को ‘लिरिकल’ पात्र माना ,तथा
सूर-सागर को गीति काव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ।
2 कबीर के काल,समाज एवं व्यक्तित्व के
विभिन्न गांठों को अपने ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गांठों से खोला ।कबीर को मूलत:
भक्त माना ,तथा उनकी छन्द योजना ,उक्ति-वैचित्र्य और अलंकार-विधान के स्वाभाविक
और अयत्नसाधित रूप का उद्घाटन किया ।कबीर काव्य के विभिन्न शब्दों को कवि के
देश-काल से जोड़ा ।
3 ‘जायसी’ ,कृष्ण काव्य के श्रोत एवं स्वरूप , ‘केशव’ ,’रीतिकाव्य’ तथा ‘बिहारी’ के संबंध में चिंतन ने शुक्ल जी के चिंतन को पुष्ट किया ।
4 नन्ददुलारे वाजपेयी के विपरीत ‘तुलसीदास’ ,’राम की शक्तिपूजा’ और ‘सरोज स्मृति’ को निराला का श्रेष्ठ रचना कहा ।
3 ‘जायसी’ ,कृष्ण काव्य के श्रोत एवं स्वरूप , ‘केशव’ ,’रीतिकाव्य’ तथा ‘बिहारी’ के संबंध में चिंतन ने शुक्ल जी के चिंतन को पुष्ट किया ।
4 नन्ददुलारे वाजपेयी के विपरीत ‘तुलसीदास’ ,’राम की शक्तिपूजा’ और ‘सरोज स्मृति’ को निराला का श्रेष्ठ रचना कहा ।
5 प्रेमचन्द को महान प्रगतिशील लेखक के
रूप में याद किया ।
6आधुनिकता की सबसे पहले व्याख्या ।अनासक्त भाव से देखना और व्यक्ति से अधिक दृश्य(परिवेश) को मानना आधुनिकता की बुनियादी शर्त ।उन्होंने आधुनिकता की व्याख्या में परलोक के स्थान पर इहलोक और व्यष्टि के स्थान पर समष्टि को महत्वपूर्ण माना।
7 अपने निबंधों एवं समीक्षा आलेखों में आलोचनात्मक शब्दों ----कृती-तत्वान्वेषी ,विनिवेशन ,अन्यथाकरण ,अन्वयन ,भावानुप्रवेश ,यथालिखिताभाव आदि के द्वारा हिंदी आलोचना को समृद्ध किया ।
6आधुनिकता की सबसे पहले व्याख्या ।अनासक्त भाव से देखना और व्यक्ति से अधिक दृश्य(परिवेश) को मानना आधुनिकता की बुनियादी शर्त ।उन्होंने आधुनिकता की व्याख्या में परलोक के स्थान पर इहलोक और व्यष्टि के स्थान पर समष्टि को महत्वपूर्ण माना।
7 अपने निबंधों एवं समीक्षा आलेखों में आलोचनात्मक शब्दों ----कृती-तत्वान्वेषी ,विनिवेशन ,अन्यथाकरण ,अन्वयन ,भावानुप्रवेश ,यथालिखिताभाव आदि के द्वारा हिंदी आलोचना को समृद्ध किया ।
सीमा--
1मनुष्यता को रस और साहित्य का पर्याय मान लिया ।इससे साहित्य और असाहित्य के बीच कोई विभाजक रेखा खींचना संभव नहीं हो पाता ।
2राम स्वरूप चतुर्वेदी का मानना है कि अपने युग के साहित्य के प्रति उनकी समझदारी और साझेदारी सीमित रही है ।
(रवि भूषण पाठक)
1मनुष्यता को रस और साहित्य का पर्याय मान लिया ।इससे साहित्य और असाहित्य के बीच कोई विभाजक रेखा खींचना संभव नहीं हो पाता ।
2राम स्वरूप चतुर्वेदी का मानना है कि अपने युग के साहित्य के प्रति उनकी समझदारी और साझेदारी सीमित रही है ।
(रवि भूषण पाठक)
Tuesday, 6 December 2016
डॉ0 नगेन्द्र
डॉ0 नगेन्द्र
वाजपेयी जी के साथ ये भी समन्वयकारी
आलोचक माने जाते हैं ।सौंदर्यमूलक स्वच्छन्दतावादी और रसवादी आलोचक ।सैद्धांतिक
मनोविज्ञान के साथ ही युगीय मनोविज्ञान का सहारा । राम स्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों
में वे क्रमश: काव्य से शास्त्र की ओर उन्मुख होते गए हैं ।
साहित्य ,रस और आनन्द
1 साहित्य आत्मीय अभिव्यक्ति है ।
2 साहित्य का मूल्य साहित्यकार के आत्म
की महत्ता और अभिव्यक्ति की पूर्णता और सच्चाई पर आधारित है ।
3 जीवन के अन्य अभिव्यक्तियों की तरह
इसका भी एक विशेष स्वरूप ,शैली ।इसको ग्रहण करने के लिए विशेष संस्कार की आवश्यकता
।इसके अधिकारी इस कला के विशेषज्ञ ही हो सकते हैं ,सामान्य जन नहीं ।ये केवल उसका
रस ग्रहण कर सकते हैं ।
4साहित्य वैयक्तिक चेतना है ,सामूहिक
नहीं ।
5रस ही साहित्य का चरम मान ।अन्य मान
एकांगी या असाहित्यिक ।
6 रस आनंद का पर्याय ,प्लेजर ,लज्जत या
विनोद का नहीं ।आनंद और कल्याण परस्पर विरोधी नहीं ,परंतु सापेक्षत: आनंद का ही
मूल्य ज्यादा ।
7 कवियों की अनुभूति का ही साधारणीकरण
होता है ,उसी के पास वह क्षमता कि अपनी अनुभूति को सामान्य की अनुभूति बना सके ।
8 नई कविता एवं व्यंग्य में भी रस की
स्थिति होती है ।
9 काव्य का प्रयोजन आनन्द ही है
।समष्ठिगत ‘लोककल्याण’ और व्यष्टिगत ‘चेतना का परिष्कार’ उसके ही रूप ।
10 अलंकार अभिव्यक्ति के अभिन्न अंग
,परंतु साधन ही ,साध्य नहीं ।इनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं ।ये अंग से अंगी होकर
अराजक बनते हैं ।
11 भाषा और कला का अभिन्न संबंध ।भाषा
की समृद्धि जीवन से ।भाषा का वैयक्तिक प्रयोग साधारणीकरण में बाधक ।
12 छंद को कविता का अनिवार्य और आंतरिक
अंग माना ।
13साहित्य को विशुद्ध रागात्मक माना
,बुद्धिवादी या नीतिवादी नहीं ।आलोचक का स्वधर्म ‘निश्छल आत्माभिव्यक्ति’ है ।आलोचना को अपनी आलोचना दृष्टि आलोच्य से ही प्राप्त करना चाहिए ।
13 शैली वैज्ञानिक आलोचना में मात्र
भाषिक विज्ञान के विश्लेषण को आलोचना नहीं माना ।शैली की व्याप्ति साहित्य से
सभी रूप तक नहीं ।यह कला का पर्याय नहीं ।
14 उन्होंने रमणीयार्थ को ही काव्य का साध्य माना ,तथा मूल्यों की चिंता किए बिना कहा कि काव्यानंद में ही मूल्य पर्यवसित हो जाते हैं ।
सैद्धांतिक योगदान----
14 उन्होंने रमणीयार्थ को ही काव्य का साध्य माना ,तथा मूल्यों की चिंता किए बिना कहा कि काव्यानंद में ही मूल्य पर्यवसित हो जाते हैं ।
सैद्धांतिक योगदान----
1शुक्ल जी के साधारणीकरण संबंधी सिद्धांत का खंडन ।शुक्ल जी आलंबनत्व धर्म का साधारणीकरण मानते हैं ,उनके हिसाब से पाठक का तादात्म्य आश्रय के भावों से ।शुक्ल जी रस की मध्यकोटि स्वीकार करते हैं ।शुक्ल जी का रस का एकाधिक कोटि मानना दोषपूर्ण । आलंबनत्व धर्म में अनुभाव आदि का अंर्तभाव नहीं हो पाता ।संस्कृत आचार्य ने स्थायी भाव ,आश्रय आदि सबका साधारणीकरण माना है ।
2 रीति संप्रदाय पर विचार करते हुए वामन
का विरोध करते हैं तथा आंशिक रूप से काव्य-शैली के भौगोलिक आधार को मानते हैं
।रीति-शैली में बहुत अंतर नहीं मानते ।
3कुंतक की तरह वक्रता-व्यापार को काव्य
के मूल में अनिवार्य मानते हैं ।उन्हीं की तरह कवि-व्यापार को महत्व देते हैं ।
योगदान---
योगदान---
1 छायावाद की उत्पत्ति एवं स्वरूप की
लौकिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या ।
2 काव्यशास्त्र के विभिन्न आयामों का तुलनात्मक गहन अध्ययन ।इससे व्यावहारिक आलोचना में गहराई ।
3 ‘सुमित्रानंदन पंत’ , ‘साकेत :एक अध्ययन’ , ‘देव और उनकी कविता’ , ‘आधुनिक हिंदी नाटक’ में व्यावहारिक आलोचना के विभिन्न आयाम ।
4 सौंदर्यानुभूति को लेखक की जीवनी से जोड़ा ।जीवन-यात्रा के विभिन्न मोड़ों ,बॉंधों को मनोवैज्ञानिक आयाम दिया तथा साहित्य से संबंध स्थापित किया ।इस दृष्टि से पंत ,मैथिलीशरण ,देव ,दिनकर एवं सियारामशरण गुप्त पर लेखन महत्वपूर्ण है ।जीवनी के प्रयोग ने आलोचना को समृद्ध किया ।
5 एक ही तरह की वस्तुओं के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पार्थक्य को पकड़ लेने की अचूक दृष्टि । रूपानुभूति के भिन्न-भिन्न शेड्स का सूक्ष्मता से विश्लेषण ।
6’नयी समीक्षा:नये संदर्भ’ में पश्चिम में विकसित समीक्षा की नवीन प्रवृत्तियों का अध्ययन ।चिंतन के विभिन्न सूत्रों को पहचानने का प्रयास ।नयी समीक्षा के केंद्र में इलियट और रिचर्डस को रखा ।
सीमा--
1विभिन्न परिभाषाओं के आधार भिन्न। अत:
सिद्धांतों में एकता नहीं असंगति ।
2 प्रयोगवाद को अनगढ़ और भदेस के अनावश्यक आग्रह का दोषी माना ,इसके आधार और स्वरूप को स्पष्ट नहीं कर सके ।
2 प्रयोगवाद को अनगढ़ और भदेस के अनावश्यक आग्रह का दोषी माना ,इसके आधार और स्वरूप को स्पष्ट नहीं कर सके ।
3 शेखर एक जीवनी और त्यागपत्र का विश्लेषण
व्यक्तित्व और कर्तृत्व में सामंजस्य के आधार पर ,अपनी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अज्ञेय पर पैनी
नजर रखते हैं,परंतु प्रसाद के नाटकों का सफल मूल्यांकन नहीं कर सके ।
4छायावादोत्तर हिंदी कविता में ‘नयी कविता’ की तुलना में ‘राष्ट्रीय सांस्कृतिक कविता ‘ तथा ‘उत्तर छायावादी कविता’ को अधिक महत्व दिया ,परंतु उसे स्थापित नहीं कर सके ।
(रवि भूषण पाठक)
4छायावादोत्तर हिंदी कविता में ‘नयी कविता’ की तुलना में ‘राष्ट्रीय सांस्कृतिक कविता ‘ तथा ‘उत्तर छायावादी कविता’ को अधिक महत्व दिया ,परंतु उसे स्थापित नहीं कर सके ।
(रवि भूषण पाठक)
Monday, 5 December 2016
नन्द दुलारे वाजपेयी
शुक्लोत्तर आलोचक---आचार्य नन्द
दुलारे वाजपेयी
छायावादी आलोचक वाजपेयी जी के लिए छायावादी ,स्वच्छंदतावादी ,सौष्ठववादी ,रसवादी ,अध्यात्मवादी संज्ञा और विशेषण का प्रयोग किया गया है ।वे किसी एक धारा में रूकते नहीं ,यह जहां तक उनकी विशेषता है ,वहीं सीमा भी ,क्योंकि विभिन्न धाराओं में भ्रमण करते हुए वे बहुत सारा असंगत तथ्यों एवं विचारों को एकत्र कर लेते हैं ।नन्द किशोर नवल ने उनकी आलोचना में ‘विरोध’ के स्थान पर ‘समन्वय’ और ‘विवादी’ स्वरों के स्थान पर ‘संवादी’ स्वरों का उल्लेख किया है ।उनमें भौतिकवाद के साथ भाववाद और अध्यात्मवाद के साथ मार्क्सवाद का समन्वय दिखता है ।नवल जी उनको समन्वयवादी आलोचक मानते हैं ।बच्चन सिंह ने उनकी आलोचनात्मक मान में भावात्मक निष्पत्ति और रूपात्मक सौंदर्य को शामिल किया है ।इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं –‘आधुनिक साहित्य ‘ ,’नया साहित्य:नए प्रश्न’ ,’जयशंकर प्रसाद’ ,’कवि निराला’ ,’हिंदी साहित्य :बीसवीं शताब्दी’ ,’राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबन्ध’ ,’प्रकीर्णिका’ ।
योगदान-
छायावादी आलोचक वाजपेयी जी के लिए छायावादी ,स्वच्छंदतावादी ,सौष्ठववादी ,रसवादी ,अध्यात्मवादी संज्ञा और विशेषण का प्रयोग किया गया है ।वे किसी एक धारा में रूकते नहीं ,यह जहां तक उनकी विशेषता है ,वहीं सीमा भी ,क्योंकि विभिन्न धाराओं में भ्रमण करते हुए वे बहुत सारा असंगत तथ्यों एवं विचारों को एकत्र कर लेते हैं ।नन्द किशोर नवल ने उनकी आलोचना में ‘विरोध’ के स्थान पर ‘समन्वय’ और ‘विवादी’ स्वरों के स्थान पर ‘संवादी’ स्वरों का उल्लेख किया है ।उनमें भौतिकवाद के साथ भाववाद और अध्यात्मवाद के साथ मार्क्सवाद का समन्वय दिखता है ।नवल जी उनको समन्वयवादी आलोचक मानते हैं ।बच्चन सिंह ने उनकी आलोचनात्मक मान में भावात्मक निष्पत्ति और रूपात्मक सौंदर्य को शामिल किया है ।इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं –‘आधुनिक साहित्य ‘ ,’नया साहित्य:नए प्रश्न’ ,’जयशंकर प्रसाद’ ,’कवि निराला’ ,’हिंदी साहित्य :बीसवीं शताब्दी’ ,’राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबन्ध’ ,’प्रकीर्णिका’ ।
योगदान-
1 भक्ति कवियों और छायावादी कवियों के
मूल्यांकन में आचार्य शुक्ल की सीमा का जोरदार उद्घाटन ।
2 छायावादी नूतन कल्पना छवि ,भाव और भाषा-रूपों पर पहली बार सकारात्मक दृष्टि
।छायावाद का अपना जीवन-दर्शन ,अपनी
भाव-सम्पत्ति ।यह द्विवेदीकालीन परिपाटीबद्धता ,नीतिमत्ता और स्थूलता के
विरूद्ध नवोन्मेष है ।इसमें अनुभूति ,दर्शन और शैली का अद्भूत सामंजस्य है ।यह
राष्ट्रीय चेतना के स्वरों से परिपूर्ण है ।
3 निराला की आलोचना करते हुए बुद्धि तत्व
और अभिधात्मक काव्य-शैली को आधार बनाया ।
4 जैनेन्द्र के सीमित दृष्टिकोण ,वैविध्यहीनता
,काल्पनिकता और ह्रासोन्मुखी मूल्यों पर प्रहार । ‘शेखर एक जीवनी’ की मार्मिकता को स्वीकारा ,परंतु सामाजिक दृष्टि से इसे
निम्नतर रचना बताया ।अश्क के उपन्यास संसार को सजीव ,परंतु प्राणियों को
निर्जीव कहा ।
5 छायावाद पूर्व खड़ी बोली काव्य का दाय
और कविता में आधुनिक युग के प्रवर्तन का श्रेय मैथिली शरण गुप्त को दिया ।रत्नकार
की कविता को युग का अनिवार्य काव्य नहीं माना ।‘साकेत’ में सूक्ष्म कवित्व को स्वीकारा ।‘साकेत’ को आरंभिक कृति तथा ‘कामायनी’ को ‘प्रतिनिधि काव्यग्रंथ’ कहा ।
6 प्रसाद के नाटकों की ऐतिहासिकता ,काव्यात्मकता का उद्घाटन ।‘चन्द्रगुप्त’ की तुलना में ‘स्कन्दगुप्त’ की संरचनात्मक अन्विति एवं रंगमंचीयता पर बल ।
दृष्टि-
6 प्रसाद के नाटकों की ऐतिहासिकता ,काव्यात्मकता का उद्घाटन ।‘चन्द्रगुप्त’ की तुलना में ‘स्कन्दगुप्त’ की संरचनात्मक अन्विति एवं रंगमंचीयता पर बल ।
दृष्टि-
1 काव्य में मूलत: सौन्दर्यानुसन्धान
,इसे जीवन-चेतना से जोड़ा ।
2कथा साहित्य और नाटक में जीवन –चेतना और सामाजिक प्रभाव तथा उनके परिदृश्य का आकलन ।प्रसाद को स्वच्छंदतावादी
और लक्ष्मी नारायण मिश्र को पुनरूत्थानवादी कहा ।
3 ‘रसवाद’ को स्वीकार करते हुए भी इसे बहुत उपयोगी नहीं माना ,क्योंकि यह निम्न कोटि
के कवियों को संरक्षण देता है ।
4 प्रारंभ में मानते हैं कि साहित्यकार को समाज की चिंता करने की जरूरत नहीं ,’शिव’ शब्द को व्यर्थ माना ,जहां सत्य और सुंदर होगा ,वहां शिव होगा ही ।
4 प्रारंभ में मानते हैं कि साहित्यकार को समाज की चिंता करने की जरूरत नहीं ,’शिव’ शब्द को व्यर्थ माना ,जहां सत्य और सुंदर होगा ,वहां शिव होगा ही ।
5 प्रगीत और प्रबंध की तुलना करते हुए ‘प्रगीत’ को ऐसा शिल्प माना ,जिसमें कवि की भावना की पूर्ण अभिव्यक्ति
संभव है ।
6 शुद्ध कविता की खोज करना चाहा ,तथा
आलोचना में सिद्धांतविहीनता का पक्ष लिया ।
7 आलोचना में सात प्रतिमानों को वरीयता क्रम दिया ,जिसमें कवि की अंर्तवृत्ति को सर्वोपरि माना ,तथा अंत में कवि के सामाजिक संदेश को रखा ।
सीमा-
7 आलोचना में सात प्रतिमानों को वरीयता क्रम दिया ,जिसमें कवि की अंर्तवृत्ति को सर्वोपरि माना ,तथा अंत में कवि के सामाजिक संदेश को रखा ।
सीमा-
1 विभिन्न मतवादों ,विचारों ,आग्रहों का
समन्वय करना चाहा ।
सैद्धांतिक दृढ़ता का अभाव ।
2प्रेमचन्द के पात्र वर्गगत ,जातिगत हैं
,व्यक्तिगत नहीं ,यह माना । वे भावात्मक एवं समसामयिक कहानी लिखते हैं । ‘गोदान’ को राष्ट्रीय एवं महाकाव्यात्मक मानने का विरोध किया ।
(रवि भूषण पाठक)
(रवि भूषण पाठक)
Wednesday, 30 November 2016
समकालीनकविता
मुक्तिबोध के बाद की पुरस्कृत हिंदी कविता प्रचलित साहित्यिक संस्कारों और रूढि़यों के ओसारे में पलकर बड़ी हुई है ।इसका 'नकार' पूर्ववर्तियों का अनुकरण भर है ।इसकी 'क्रांति' पहले के आंदोलनों की तुकबंदी भर है ।इसका 'जन' बस अहसास दिलाता है कि यह उस 'हिंदी' की कविता है ,जिसमें निराला ,नागार्जुन ,मुक्तिबोध जैसे कवि हुए हैं ।पुरस्कृत कविता और आलोचना की जुगलबंदी लोकप्रिय तो है ,परंतु कविता और आलोचना के असाधारणता की खोज मर गई है ।वह कविता ही क्या जो विवाद पैदा न करे !वह कविता ही क्या जो अस्वीकार एवं असफल माने जाने की चुनौती को स्वीकार न करे !वह कविता ही क्या जो आलोचना की नई पौध को जन्म न दे !
Saturday, 5 September 2015
(हे हिंदी के आलोचक ,नए आलोचक ,आलोचकगण....)
आप आलोचक हैं ,जादूगर नहीं कि किसी को ऊपर उठा सकते हैं किसी को नीचे ,किसी को हवा में गुम कर सकते हैं ,और जो है नहीं उसको साबित कर सकते हैं ,और यदि ऐसा कर सकते हैं तब आप जादूगर ही हैं ,आलोचक नहीं ।
(हे हिंदी के आलोचक ,नए आलोचक ,आलोचकगण....)
Wednesday, 7 January 2015
धर्म की गंंध
मेरे आस-पास धर्म की गंंध होती तो मैं नथूनों में भर-भर के उसे थाहने का प्रयास करता ,उसको असली नाम से बुलाने का प्रयास करता , कुछ बदलने का प्रयास करता ,कुछ उसको भी बदलता ,नहीं बदलता तो खुद को ही बदल लेता ।यदि संभव होता तो घंटे में तीन बार अपना धर्म बदलता या फिर उसकी पथरीले मंसूड़ों को खुरदरे जीभ से सहला-सहलाकर चिकना बना देता ।
Saturday, 22 November 2014
हाकिम आपकी क्षुद्रता को भगवान दूर करें..
हाकिम आपकी क्षुद्रता को भगवान दूर करें....आपके जातिगत अहंकार को भगवान शिव पी जाएं ,भगवान शिव आपकी शारीरिक श्रेष्ठता -भाव का भी शमन करें ।वायुदेव आपकी क्षेत्रीय दुर्भावना को उड़ा दें , आपके लोभ पर इंद्रदेव का वज्र गिरे ,आपकी कामुकता गलकर बर्फ हो जाए ।आपके झूठको भगवान गणेश अच्छा शिल्प दें ,माता सरस्वती आपके आडम्बर को विश्वसनीय बनाएं......
Wednesday, 19 November 2014
चंद्रकान्त देवताले और आधुनिक कविता की शक्ति
चंद्रकांत देवताले की एक कविता में से -
मैं वेश्याओं की इज्ज़त कर सकता हूं
पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
भड़क उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
और जख्मों ,भाषा और उनके गूंगेपन को
अच्छी तरह समझता हूं
उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
जिनसे भद्र लोग जिन्दगी और कविता की नाप-जोख करते हैं
पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
भड़क उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
और जख्मों ,भाषा और उनके गूंगेपन को
अच्छी तरह समझता हूं
उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
जिनसे भद्र लोग जिन्दगी और कविता की नाप-जोख करते हैं
चन्द्रकांत देवताले की यह कविता आधुनिकतावाद के सुसभ्य केंचुलों को फाड़ते हुए आधुनिक कविता के नए उपकरणों को स्थापित करती है ।यहां छंदमुक्त कविता अपने सर्वाधिक शक्तिशाली रूप में मौजूद है ।
Thursday, 2 October 2014
(रसूलपुर डायरी 1)
छह साल से हम लोग लगे हुए थे ......पंडित जाति का था अधिकारी .....जब भी मिलते पैर छू लेते ,हमारे दादा भी 'पांउ लागी' तो कहते ही थे.............हम सारे लोग एक ही चीज की मांग कर रहे थे कि हमारा चक पासियों के बीच से हटाइए....दूसरी चकबंदी थी ,और यही मौका था कि हम लोग किसी दूसरे क्षेत्र में अपना चक बनबा लें .......साहब खरचा-बरचा की बात तो हमने खुल के कहा .........पर हरदम ईमानदारी का झौंस देता था...........अब जब चक बन रहा है तो नियम-कानून पाद रहा है .......कहते हैं कि लेलो पचास-साठ हजार तुम भी खुश ,हम भी खुश ,पर हमारा काम करते गांड फट रही है ,जैसे कि सरकार राजधानी से हमारा चक और इनका जेब ही चेक कर रही है ।साहब बार-बार कहा कि किसी भी तरह से हम लोगों का चक यहां से हटाओ....अब कितना कहें कि सुबह-शाम आप खेत की ओर घूम नहीं सकते ।हमारे ही खेत में दिसा-मैदान करना ,इसी में साग-पात करना ,इसी में घास छिलना और रोको तो गाली-गलौज ,मार-पीट ,पर ये सब कहके क्या होगा ,काम जब होना ही नहीं है ।तुम अपना कानून अपने गां... में रखो ,हम अपना चक अपने गां... में रखते हैं ।पैसा रहेगा ,तो तुम नहीं करोगे ,कोई और करेगा ,तुम नहीं तुम्हारा साहेब करेगा ,वह तुम्हीं से कराएगा ,और तूम जीसर ,यससर कहके करोगे .........
(रसूलपुर डायरी 1)
Sunday, 21 September 2014
(घूस के रसशास्त्री)
घूस के रसशास्त्री पूरे दिन बुलाते -बतियाते रहे बाबा तुलसीदास से
कभी जुबान से कभी हाथ से कभी लतियाते रहे फुटबाल की तरह
राग-भैरवी 'प्रविसि नगर ...' से होते हुए बार-बार राग-दरबारी में खतम हो जाती
कभी उन्हें भय के बिना प्रीत होते हुए नहीं दिखता
कभी-कभी कुर्सियों में धँस के , कभी टेबुल पर पैर चढ़ा के
कभी गुटखा और तम्बाकू को ओंठों और मंसूड़े के बीच रखते हुए
बार-बार ढ़ोल-गँवार को बुलाते
वाह रे तुलसी बाबा सब मौका के लिए लिख गए
घूस के रसशास्त्री भरत को नहीं जानते थे
भरत भी इनको नहीं जानते थे
इसीलिए दोनों के साधारणीकरण अलग रास्ते जाते थे
दोनों के उद्दीपक अलग थे
संचारी आदि भी........
कभी जुबान से कभी हाथ से कभी लतियाते रहे फुटबाल की तरह
राग-भैरवी 'प्रविसि नगर ...' से होते हुए बार-बार राग-दरबारी में खतम हो जाती
कभी उन्हें भय के बिना प्रीत होते हुए नहीं दिखता
कभी-कभी कुर्सियों में धँस के , कभी टेबुल पर पैर चढ़ा के
कभी गुटखा और तम्बाकू को ओंठों और मंसूड़े के बीच रखते हुए
बार-बार ढ़ोल-गँवार को बुलाते
वाह रे तुलसी बाबा सब मौका के लिए लिख गए
घूस के रसशास्त्री भरत को नहीं जानते थे
भरत भी इनको नहीं जानते थे
इसीलिए दोनों के साधारणीकरण अलग रास्ते जाते थे
दोनों के उद्दीपक अलग थे
संचारी आदि भी........
Sunday, 31 August 2014
महान इतिहासकार विपिन चंद्र
विपिन चंद्र की उपलब्धियां ऐतिहासिक थी ।उन्होंने आधुनिक भारतीय इतिहास को औपनिवेशिक ,राष्ट्रवादी ,गांधीवादी एवं मार्क्सवादी अतिवादों से दूर किया ।उन्होंने 1857 के विद्रोह को राष्ट्रवादी आंदोलन एवं सैनिक विद्रोह के बीच के उचित धरातल पर देखा ।भारतीय अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन को मार्क्सवादी एवं औपनिवेिशिक व्याख्या से दूर करते हुए वस्तुनिष्ठ राष्ट्रवादी नजर से देखा ।नरमवादी कांग्रेसियों की उपलब्धियों को सही परिपेक्ष्य में देखा ।इनके राष्ट्रवादी सोच के आर्थिक आधार पर अपनी थीसिस पूरी की ।उग्रवादी कांग्रेसियों एवं हिंसक राष्ट्रवादियों की सीमाओं को जनआंदोलन एवं ब्रिटिश सत्ता के मूल स्वरूप पर ध्यान रखकर विचार किया ।गांधीवादी राष्ट्रीय आंदोलन के संपूर्ण वैचारिक आधार को टटोलते हुए जन आंदोलन की गांधीवादी सोच एवं रणनीति को टटोला ।उन्होंने सांप्रदायिकता के मध्यवर्गीय आधार को परखते हुए उसके चरणों को रेखांकित किया ।सांप्रदायिकता एवं देशविभाजन के पीछे की राजनीति एवं जनाधार को व्यक्तिवादी व्याख्या से परहेज करते हुए पूरे राष्ट्र की मनोवैज्ञानिक मीमांसा किया ।
(अपने आकाशी गुरू को श्रद्धांजलि)
(अपने आकाशी गुरू को श्रद्धांजलि)
Sunday, 6 April 2014
हम जहां रहते हैं
भोर में टहलते हुए सड़क पर प्राय: किसी का कफ ,पानका पीक या चबाया गुटखा दिख जाता है ,तब द्विअक्षरी गाली से काम नहीं चलता है और पंचाक्षरी तक जाना पड़ता है ।यही हाल हिंदी साहित्य ,पत्रकारिता और विश्वविद्यालयों में प्राय:देखने को मिलता है ,कोई किसी का भाई है ,दामाद है ,बेटा है ,चेला है ,और उनका सबसे बड़ा एसाइनमेंट यही है ।अब इन आलियाओं ,कपूरों और धवनों के सामने आपको उखाड़ने के लिए क्या बचता है ?
Saturday, 29 March 2014
(सांप्रदायिकता बहुआयामी ,जटिल एवं बहुस्तरीय होता है ।
चना श्रेष्ठ होता है गेहूं से ,गेहूं के पत्ते चने के पत्ते से ज्यादा सजीला होता है ,गेहूं देश के बारे में ज्यादा सोचता है ,गेहूं पूरबैया में ज्यादा जोर से नाचता है ।चना का फूल ज्यादा कामुक होता है ,चना लतर कर देश का ज्यादा जमीन छेकता है ,चना की नीयत गेहूं के प्रति खराब़ है ।चना गेहूं को बरबाद करना चाहता है ।गेहूं अपनी लंबाई से चने के परागन को रोकता है ,गेहूं चने की ओर आने वाले हवा ,पानी ,गीत सबको रोकता है ।खेत ज्यादा अच्छे होते यदि केवल चना ही होता ।ये दुनिया ज्यादा प्यारी होती ,यदि केवल चने की खेती की जाती ,आखिर प्रोटीन ही तो सब कुछ है ।देश का ज्यादा से ज्यादा संसाधन केवल गेहूं के लिए खर्च हो रहा है ,सारी बिजली ,सारा खाद ,श्रमिक वर्ग ,थ्रेशिंग ,ट्रैक्टर सब गेहूं की पूजा में व्यस्त ।
(रवि भूषण पाठक)
(रवि भूषण पाठक)
Friday, 21 March 2014
संपादक का परिवारवाद
समास-8 के प्रकाशक ,लेखक और संपादक पर जरा ध्यान दीजिए ।
संपादक-उदयन वाजपेेयी,प्रकाशक-अशोक वाजपेयी
तीन सौ बीस पृष्ठ के साठ पृष्ठ में संपादकीय और वार्तालाप मिलाकर उदयन वाजपेयी हैं ।पांच पृष्ठ और लेकर एक आलेख में भी है ।पांच पृष्ठ में प्रकाशक महोदय की कविता पर ध्रुव शुक्ल का आलेख है ।चौदह पृष्ठ किसी आस्तीक वाजपेयी के लिए है ,जिनके घर का पता संपादकीय कार्यालय का पता है ।मतलबसाहित्य ,कला और सभ्यता पर एकाग्र की घोषणा के साथ इस अनियतकालीन पत्रिका का एक चौथाई हिस्सा अपने घर-परिवार से संबंधित है ।ये सामग्री चाहे जितनी भी अनिवार्य रही हो ,प्रकाशक और संपादक को अपने विवेक का इस्तेमाल तो करना ही चाहिए ।और आस्तीक जी आपकी कविता चाहे जितनी भी कमाल की हो ,घर में छपने से बचिए ।
संपादक-उदयन वाजपेेयी,प्रकाशक-अशोक वाजपेयी
तीन सौ बीस पृष्ठ के साठ पृष्ठ में संपादकीय और वार्तालाप मिलाकर उदयन वाजपेयी हैं ।पांच पृष्ठ और लेकर एक आलेख में भी है ।पांच पृष्ठ में प्रकाशक महोदय की कविता पर ध्रुव शुक्ल का आलेख है ।चौदह पृष्ठ किसी आस्तीक वाजपेयी के लिए है ,जिनके घर का पता संपादकीय कार्यालय का पता है ।मतलबसाहित्य ,कला और सभ्यता पर एकाग्र की घोषणा के साथ इस अनियतकालीन पत्रिका का एक चौथाई हिस्सा अपने घर-परिवार से संबंधित है ।ये सामग्री चाहे जितनी भी अनिवार्य रही हो ,प्रकाशक और संपादक को अपने विवेक का इस्तेमाल तो करना ही चाहिए ।और आस्तीक जी आपकी कविता चाहे जितनी भी कमाल की हो ,घर में छपने से बचिए ।
Wednesday, 12 March 2014
कबीर संजय की कहानी 'मकड़ी के जाले '
कबीर संजय की कहानी 'मकड़ी के जाले' नया ज्ञानोदय के फरवरी अंक में प्रकाशित हुई है ।कहानी नई कहानी के बहुप्रचारित 'नएपन' से आगे आकर प्रारंभ होती है ।पहली कक्षा में पढ़ रहा अंची के हवाले से लेखक गांव के दुआरा ,बरामदा,कमरा ,नीम से जुड़े भूगोल का मुआयना करता है ,तथा बहुत ही बारीकी से अंची के दिमाग में प्रवेश करता है ।चींटे के जैविक चक्र,आवास को बालमनोविज्ञान के चश्मे से कहानी में शामिल करते हुए लेखक अभिव्यक्ति के नए स्वर्ग की ओर प्रस्थान करता है ।करौंदे का पेड़ ,घोंसला ,मकड़ी का जाला केवल अंची के लिए ही नया बन के नहीं आता है ,एक पाठक को भी ऐसे सहज सामान्य चीजों को देखने का नया एंगल मिलता है ।अंची के सर में तेल लगाने ,उसे नहाने एवं टिफिन तैयार करने के विवरण में इतनी सहजता है ,और एक-एक चरण पर इतना गहन ध्यान कि कहानियों में रूपक और प्रतीक की बात बेमानी लगने लगती है ।अंची का एक बड़ा भाई भी है जो अपने पिता को एक औरत के साथ सोए देखकर घर से भाग गया है ,इस सोने वाले प्रसंग को कबीर विस्तार नहीं देते हैं ,विमल चंद्र पांडेय की एक कहानी जो 'अनहद' में प्रकाशित हुई है ,लगभग ऐसे ही प्रसंग में बेडरूम के चित्कारों से भरी है ।कबीर का संयम बहुत ही कलात्मक है ।इस कहानी में नन्दू लौटता है ,और पिता उसके भागने के कारणों से अनजान पिटाई करते हैं ।नंदू क्रोध और प्रतिशोध से अपना ओठ भींचता है ।अंची भी ओंठ को भींचते हुए चींटी ,ललमुनिया और कौवा के प्राकृतिक आवास पर आक्रमण करता है ।नाराज कौवे अंची पर आक्रमण करते हैं तथा उसके हाथ से पेड़ की डाली छूट जाती है ।कबीर संजय की इस कहानी के द्वारा हम ग्रामीण बाल मनोविज्ञान की एक अछूती दुनिया से परिचित होते हैं ।निरंतर क्रूर हो रही दुनिया और परिवार के पास अंची और नंदू के लिए कुछ भी नही है ।परिवार और विद्यालय यहां पर क्रोध ,हिंसा और प्रतिशोध सिखाने के साधन मात्र हैं ।अंची जो मकड़ी के जाले को जिज्ञासा से देखता है , और उसमें फँसता ही चला जाता है ............
(रवि भूषण पाठक)
(रवि भूषण पाठक)
Thursday, 13 February 2014
।दलाली जिंदाबाद !
किसानी बकबास है ,बनियौटी चोखा ,निवेशक की बजाय ब्रोकिंग में चमक थी ,और जो था फायदा ही ,निवेश केवल मुंह ,मुखौटा एवं भंगिमा का ही था ।देह धुनती थी रंडियां ,मजा मारते थे भड़ुए ।लेखक की बजाय प्रकाशक बनना मुफीद था ,नए लेखक यहां आराम से फँसते थे ।यह कोई छोटा-खोटा धंधा नहीं था ,दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश जो अपने आपको सबसे बड़ा लोकतंत्र और सबसे महान वामपंथी कहते थे , को भी ये पता था कि दलाली कोई साधारण चीज नहीं है ,इसीलिए वे हथियार बनाते भी थे ,और दलाली भी खुद ही करते थे ।यह महायुग था ,जिसमें सबसे ज्यादा चमक तृतीयक क्षेत्र के पास ही था ।दलाली जिंदाबाद !
दलाली कर रहे हैं न भैया ,एकदम करिए ,परंतु आकाश की ऊंचाई से या फिर धरती की गुरूता से एकदम ही प्रभावित नहीं होइए ,होइए भी तो दिखे नहीं ,और दिख भी जाए तो उसका फायदा हो ।मौका मिले तो ये भी कहिए कि धरती की गुरूत्वाकर्षण शक्ति को आप कम या ज्यादा कर सकते हैं ,या फिर आकाश को खींच के नीचा या फिर मुक्का मार के ऊपर कर सकते हैं यदि नहीं कर पाए तो ये बताइए कि आपकी नामर्दी जनहित में है ।
दलाली कर रहे हैं न भैया ,एकदम करिए ,परंतु आकाश की ऊंचाई से या फिर धरती की गुरूता से एकदम ही प्रभावित नहीं होइए ,होइए भी तो दिखे नहीं ,और दिख भी जाए तो उसका फायदा हो ।मौका मिले तो ये भी कहिए कि धरती की गुरूत्वाकर्षण शक्ति को आप कम या ज्यादा कर सकते हैं ,या फिर आकाश को खींच के नीचा या फिर मुक्का मार के ऊपर कर सकते हैं यदि नहीं कर पाए तो ये बताइए कि आपकी नामर्दी जनहित में है ।
Saturday, 8 February 2014
(मऊ से पटना वाया फेफना,बक्सर
सरकारों ने भले ही मऊ से पटना जाने के लिए वाया बलिया और वाया भटनी का रूट बनाया ,सजाया हो ,जनता इस रूट से नहीं चलती ।यहां के लोग फेफना में उतरकर ऑटो एवं जीप से बक्सर पहुंचते हैं ,फिर बक्सर से रेल के माध्यम से पटना पहुंचते हैं ।व्यापारियों ,किसानों ,कर्मचारियों ,तस्करों का यही रूट है ।यही रूट ज्यादा लोकप्रिय और सुरक्षित भी है ।बक्सर के टूटे पुल से निर्बाध यात्रा जारी है ,पुल का मुख्य हिस्सा कई भागों में बँटा दिखता है ,और एक हिस्से से दूसरे पर जाते वक्त दोनों हिस्से हिलते हैं ,आवाज करते हैं तथा डराते हैं ।लोगों ने बताया कि कई महीना पहले ही पुल को सरकारी तौर पर बंद कर दिया गया है ,परंतु भारी और हल्के वाहन पहले की ही तरह चल रहे हैं ।कुछ लोग डरे भी हैं कि कहीं सही में रूट बंद हो गया तो बलिया से पटना की यह यात्रा कुछ ज्यादा घंटों की मांग करेगी ।शायद उत्तर प्रदेश और बिहार के सरकारों के लिए यह उच्च प्राथमिकता का विषय नहीं रहा हो ,परंतु यहां के लोगों के लिए यह रोटी-बेटी का प्रश्न है ।
(मऊ से पटना वाया फेफना,बक्सर)
(मऊ से पटना वाया फेफना,बक्सर)
Wednesday, 18 December 2013
साहित्य के पिचकू
मुझको अपनी बात कहने तो दीजिए ,मुझे डराइए मत ,मुझे उनका कद,वजन,प्रतिष्ठा ,प्रभाव से परिचय मत कराइए ,थोड़ा बहुत हम भी जानते हैं ,निस्संदेह वे प्रभावशाली लोग हैं ,उनकी एक टिप्पणी से हम जैसे लोगों का जीवन(लेखन नहीं) आरामदेह हो सकता है ।उनका एक संकेत ,सिफारिशी चिट्ठी हमारा भाग्योदय कर सकता है ,परंतु जब हम इस लाभ-लोभ की ओर झुकने की बजाय अपेक्षाकृत ईमानदार रूख अपनाते हैं ,तो आप समर्थन की बजाय हमें धमकाते हैं ,और हिंदी के उन महापुरूषों के कुकृत्यों पर ईमानदारी पूर्वक चर्चा करने की बजाय उनके पहले के रिकार्ड पर बात करना पसंद करते हैं ।
मुझे जानकारी है कि आप में से बहुतों के एकाधिक किताबें छप चुकी है , आप में से कुछेक पुरस्कृत भी चुके हैं ,आप में से कई इस पुरस्कार और सम्मान के वाकई हकदार हैं ,परंतु इसका मतलब ये नहीं है कि रास्तों का विकल्प समाप्त हो गया है । हमें उनसे लड़ते-झगड़ते आगे बढ़ने दीजिए ,पाद-सेवन ,अर्चन-पूजन की बजाय नए रास्तों को सामने आने दीजिए ,ऐसे राहियों को चना-चबेना भले न दीजिए ,थोड़ा आंख तो मूंद सकते हैं । व्यभिचारियों के बिस्तर बनने से खुद को बचाईए ।हम समझते हैं आपकी आदत हो चुकी है ,परंतु कभी-कभी परहेज भी दवा होती है ।
हम किसको कोसें ,सरसो पैदा करने वाले किसान को ,तेल पेरने वाले तेली को ,बोतल,रैपर,पिचकू,स्प्रे में उपलब्ध कराने वाले बनिये को या आपके उस एप्रोच को ।आपके पूज्य को भी शायद यह इतना बुरा लगे ,जितना कि आपको लगता है ।
मुझे जानकारी है कि आप में से बहुतों के एकाधिक किताबें छप चुकी है , आप में से कुछेक पुरस्कृत भी चुके हैं ,आप में से कई इस पुरस्कार और सम्मान के वाकई हकदार हैं ,परंतु इसका मतलब ये नहीं है कि रास्तों का विकल्प समाप्त हो गया है । हमें उनसे लड़ते-झगड़ते आगे बढ़ने दीजिए ,पाद-सेवन ,अर्चन-पूजन की बजाय नए रास्तों को सामने आने दीजिए ,ऐसे राहियों को चना-चबेना भले न दीजिए ,थोड़ा आंख तो मूंद सकते हैं । व्यभिचारियों के बिस्तर बनने से खुद को बचाईए ।हम समझते हैं आपकी आदत हो चुकी है ,परंतु कभी-कभी परहेज भी दवा होती है ।
हम किसको कोसें ,सरसो पैदा करने वाले किसान को ,तेल पेरने वाले तेली को ,बोतल,रैपर,पिचकू,स्प्रे में उपलब्ध कराने वाले बनिये को या आपके उस एप्रोच को ।आपके पूज्य को भी शायद यह इतना बुरा लगे ,जितना कि आपको लगता है ।
Sunday, 15 December 2013
नागार्जुन और त्रिलोचन पर अष्टभुजा शुक्ल
त्रिलोचन की अवधी कविता संग्रह 'अमोला' पर लिखते हुए अष्टभुजा शुक्ल का ध्यान बरबस ही नागार्जुन पर जाता है ,तथा वे दोनों मित्र कवियों की तुलना करने लगते हैं ।'आलोचना' के पचासवें अंक में प्रकाशित एक लेख'बरवै में बिरवा(अमोला)' से एक अंश आभार सहित---
''कविद्वय -नागार्जुन और त्रिलोचन न तो लोकान्ध हैं और न ही लोक-विक्रेता बल्कि दोनों लोक-सम्बद्ध और लोक-प्रतिबद्ध हैं। इसी प्रतिबद्धता और सम्बद्धता की कीमत पर कभी-कभी दोनों प्रतिरोध को भी किनारे रख देते हैं पर उसका वाणिज्यिक इस्तेमाल नहीं करते ।दोनों लोक की आधुनिकता का साथ देते हुए और आरोपित आधुनिकता को नकारते हुए प्रगतिशील मूल्यों का निरन्तर प्रतिपादन करने वाले कवि हैं ......नागार्जुन की कारयित्री ऊर्ध्वाधार है तो त्रिलोचन की क्षैतिज ।नागार्जुन की हँसी में गूंज है तो त्रिलोचन में खनक ।नागार्जुन का व्यंग्य फट्ठा-पीठ है तो त्रिलोचन का कैंचीदार ।नागार्जुन में विक्षोभ और प्रखरता है तो त्रिलोचन में गहरी टीस और नुकीला कटाक्ष ।पहले की कविता की खूबी ज्यादातर असंयम में है तो दूसरे की ज्यादातर संयम में ।पहला करारी चोट करने वाला कवि है जबकि दूसरा करारी चोट सहने वाला ।
नागार्जुन में हिन्दी जाति का साहस एवं स्वाभिमान है तो त्रिलोचन में उसकी ऋजुता और निरहंकार । एक के प्रतिकार में जनता की सामूहिक चेतना है तो दूसरे की सहनशीलता में तिर्यक् अवज्ञा ।प्रतिकार एवं सहनशीलता- दोनों ही हिन्दी जाति,जीवन और कविता के स्वभाव हैं ।नागार्जुन प्रकृत्या काव्यानुशासन तोड़ने वाले कवि हैं जबकि त्रिलोचन प्राय: उसकी मर्यादा में रहने वाले ।इस लिहाज से एक ही अनुभूति ,अभिव्यक्ति की निजता और काव्यशैली अलग प्रकार की प्रतीत होती है तो दूसरे की उससे सर्वथा भिन्न ।बल्कि इन दोनों की काव्य-शैलियां निजी पृथगर्थता और सामूहिक एकार्थता का ऐसा सम्पूरक निर्मित करती हैं जिनमें हिन्दी कविता का पूर्वकृत एवं नवीकृत आवाजों के अनुवाद अपने-अपने आश्चर्यों के साथ झंकृत होते हैं ।दोनों की भूमिज संवेदना के उभयनिष्ठ तन्तु जहां उन्हें कविता के सामान्य धरातल पर एक साथ खड़ा करते हैं वहीं उनके सरोकार भारतीय जीवन-बोध के घनिष्ठ सम्पर्क में हैं ।दोनों के विश्वबोध की प्राथमिक ,द्वितीयक या तृतीयक मूल मिट्टी की देसजता और जनपदीयता में गहरे पैठी हुई है जहां उनके मूलगोप जीवन के खनिज संचित करते रहते हैं ।दोनों की कविता का मर्म और साधारण प्रतिज्ञा जनजीवन के मौलिक अनुताप उल्लास तक ही असमंजस प्रतिरोध संघर्ष और राग-विराग में घटित होती है ।ध्यान देने की बात यह भी है कि नागार्जुन मिथिलांचल के हैं तो त्रिलोचन अवध क्षेत्र के ।अपनी इन्हीं प्रतिबद्धताओं के चलते एक ने मैथिली में 'पत्रहीन नग्न गाछ' की रचना की तो दूसरे ने अवधी में 'अमोला' की ।''
नागार्जुन में हिन्दी जाति का साहस एवं स्वाभिमान है तो त्रिलोचन में उसकी ऋजुता और निरहंकार । एक के प्रतिकार में जनता की सामूहिक चेतना है तो दूसरे की सहनशीलता में तिर्यक् अवज्ञा ।प्रतिकार एवं सहनशीलता- दोनों ही हिन्दी जाति,जीवन और कविता के स्वभाव हैं ।नागार्जुन प्रकृत्या काव्यानुशासन तोड़ने वाले कवि हैं जबकि त्रिलोचन प्राय: उसकी मर्यादा में रहने वाले ।इस लिहाज से एक ही अनुभूति ,अभिव्यक्ति की निजता और काव्यशैली अलग प्रकार की प्रतीत होती है तो दूसरे की उससे सर्वथा भिन्न ।बल्कि इन दोनों की काव्य-शैलियां निजी पृथगर्थता और सामूहिक एकार्थता का ऐसा सम्पूरक निर्मित करती हैं जिनमें हिन्दी कविता का पूर्वकृत एवं नवीकृत आवाजों के अनुवाद अपने-अपने आश्चर्यों के साथ झंकृत होते हैं ।दोनों की भूमिज संवेदना के उभयनिष्ठ तन्तु जहां उन्हें कविता के सामान्य धरातल पर एक साथ खड़ा करते हैं वहीं उनके सरोकार भारतीय जीवन-बोध के घनिष्ठ सम्पर्क में हैं ।दोनों के विश्वबोध की प्राथमिक ,द्वितीयक या तृतीयक मूल मिट्टी की देसजता और जनपदीयता में गहरे पैठी हुई है जहां उनके मूलगोप जीवन के खनिज संचित करते रहते हैं ।दोनों की कविता का मर्म और साधारण प्रतिज्ञा जनजीवन के मौलिक अनुताप उल्लास तक ही असमंजस प्रतिरोध संघर्ष और राग-विराग में घटित होती है ।ध्यान देने की बात यह भी है कि नागार्जुन मिथिलांचल के हैं तो त्रिलोचन अवध क्षेत्र के ।अपनी इन्हीं प्रतिबद्धताओं के चलते एक ने मैथिली में 'पत्रहीन नग्न गाछ' की रचना की तो दूसरे ने अवधी में 'अमोला' की ।''
(साभार 'आलोचना' ,जुलाई-सितम्बर ,2013)
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