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Sunday 8 December 2013

पुरानी पत्रिका से: मल्लिकार्जुन मंसूर(आजकल ,सितंबर 2011)

पुरानी पत्रिकाओं से की दूसरी किश्‍त में आजकल का सितंबर 2011 इस मायने में विशिष्‍ट है कि मल्लिकार्जुन मंसूर को जन्‍म शताब्‍दी वर्ष के अवसर पर याद करती है ,साथ ही यह पं0 भीमसेन जोशी एवं गिर्दा के महाप्रस्‍थान को भी समेटती है ,परंतु अशोक वाजपेयी की कविता एवं यतींद्र मिश्र की कविता एवं स्‍मृतिलेख के कारण यह अंक संग्रहणीय है ।

                    यतींद्र मिश्र अपने प्रिय गायक को याद करते हुए कहते हैं--

यह कहने में मुझे तनिक भी झिझक नहीं कि अपने समकालीनों एवं परवर्ती गायको ,फनकारों....का संगीत जितना श्रद्धास्‍पद ,अद्भुत,मनोग्राही और महान था-उसमें थोड़ी अतिरिक्‍त आस्‍था ,रहस्‍य ,मनोग्रह्यता और महानता का योग कराने के बाद बनने वाला संगीत ही मल्लिकार्जुन मंसूर का संगीत हो सकता था ।पंडित जी के गायन के लिए कम से कम कोई साधारण उत्‍प्रेक्षा ,उपमा या रूपक तलाशना भी उनका एक स्‍तर पर अपमान करना है ।



मल्लिकार्जुन मंसूर पर अशोक वाजपेयी की कुछ कविताएं


मल्लिकार्जुन मंसूर


(1)
काल के खुरदरे आंगन में
समय के लंबे गूंजते गलियारों में
वे गाते हैं
अपने होने के जीवट का अनथक गान

वे चहलकदमी करते हुए
किसी प्राचीन कथा के
बिसरा दिए गए नायक से
पूछ आते हैं उसका हालचाल

वे बीड़ी सुलगाए हुए
देखते हैं
अपने सामने झिलमिल
बनते-मिटते संसार का दृश्‍य

देवताओं और गंधर्वों के चेहरे
उन्‍हें ठीक से दीख नहीं पड़ते
अपनी शैव चट्टान पर बैठकर
वे गाते हैं
अपने सुरों से
उतारते हुए आरती संसार की -

वे एक जलप्रपात की तरह
गिरते रहते हैं-
स्‍वरों की हरियाली
और राग की चांदनी में
अजस्र-

वे सींचते हैं
वे जतन से आस लगाते हैं
वे खिलने से निश्‍छल प्रसन्‍न होते हैं
वे समूचे संसार को एक फूल की तरह चुनकर
कालदेवता के पास
फिर प्रफुल्‍लता पर लौटने के लिए
रख आते हैं-

वे बूढ़े ईश्‍वर की तरह सयाने-पवित्र
एक बच्‍चे की फुरती से
आते हैं-
ऊंगली पकड़
हमें अनश्‍वरता के पड़ोस में ले जाते हैं

(2)

अपनी रफ्तार से चलते हुए
बहुत बाद में
आते हैं
मल्लिकार्जुन मंसूर
और समय से आगे निकल जाते हैं

उलझनों-भरे घावों-खरोचों से लथपथ
टुच्‍चे होते जाते समय से
आगे
उनके पीछे आता है
गिड़गिड़ाता हुआ समय दरिद्र और अपंग
भीख मांगता हाथ फैलाए समय-
हांफता हुआ

मल्लिकार्जुन मंसूर
अपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे में
हलका -सा झुककर
रखते हैं
कल के कंधे पर पर अपना हाथ
ठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ी
चल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्‍याशित
पड़ाव की ओर

अपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथ
सिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछ
गुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसार

ईश्‍वर आ रहा होता
घूमने इसी रास्‍ते
तो पहचान न पाता कि वह स्‍वयं है
या मल्लिकार्जुन मंसूर


(3)

राग के अदृश्‍य घर का दरवाजा खोलकर
अकस्‍मात् वे बाहर आते हैं
बूढ़े सरल-सयाने

राग की भूलभुलैया में
न जाने कहां
वे बिला जाते हैं
और फिर एक हैरान बच्‍चे की तरह
न जाने कहां से निकल आ जाते हैं
वे फूल की तरह
पवित्र जल की तरह
राग को रखते हैं
करते हैं आराधना
होने के आश्‍चर्य और रहस्‍य की ,
वे ख़याल में डूबते हैं
वचन में उतरते हैं

वे गाते हैं
जो कुछ बहुत प्राचीन हममें जागता है
गूंजता है ऐसे जैसे कि
सब कुछ सुरों से ही उपजता है
सुरों में ही निमजता है
सुरों में ही निवसता और मरता है ।

(अशोक वाजपेयी)


आकाश कुसुम
झरता है
सूर्य के आकाश से
चकित और उल्‍लसित

पारिजात की पगडण्‍डी
बनती जाती है
राग की विनम्र धरती
पीताभा में अपनी

घर हो
मन्दिर का कोई कोना हो
दीप्‍त हो उठता है वहां
सुन्‍दर का सपना
जैसे वह सच का सहोदर हो

गाकर
संसार के जिस भेद को
सुर और लय की अठखेली से
कुसुमित करते हैं वे
वह फूल
सूर्य के आकाश से झरता है ।

(यतीन्‍द्र मिश्र)

साभार  'आजकल' ,अशोक वाजपेयी ,यतीन्‍द्र मिश्र

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