हम निछन्द उस्सर बलुआहारसगंगाधर बन तू निराला
दिखे दिन कर दुपहरिया के
नही मरीचिका न छल सपना
सींच रहा अपनी मरूभूमि
किसकी साकी कौन सा प्याला
भले बाप को रंग का लाला
बेटा बैनीआहपीनाला
नागार्जुन बहुआयामी हैं ।जितने क्लासिक,उतने ही भदेस ।रीतिवाद के धुरविरोधी,परंतु कविता कहने की रीति के प्रति पूरी तरह से सजग ।यहां तक कि उनकी कविता में रीतिवाद का भी संकेत है ,अर्थात उनकी कई कविता उस लक्ष्य को संकेतित करती है कि कविता कैसे कही या लिखी जाए ।जन्म से मैथिल परंतु समूचे ब्रह्माण्ड के अनुभव से तादात्म्य स्थापित करते । मिथिला और ग्राम तरौनी के प्रति प्रेम सिंध,श्रीलंका ,तिब्बत के प्रति प्रेम को कम नहीं करता है ।अष्टभुजा शुक्ल उन्हें छन्दोमय कहते हैं ,वे नागार्जुन को छन्दबद्ध या मुक्तछंद में बांटने की कोशिश को महत्व नहीं देते ।
नामवर सिंह ने भी नागार्जुन के विषय चयन की विविधता को आश्चर्यसहित स्वीकार किया है । केदार,शमशेर जैसे अपने समकालीनों के साथ ही कालिदास,विद्यापति,निराला,रवीन्द्रनाथ जैसे स्थापित स्तंभों के साथ बाबा एक ही लय में संवाद करते हैं ।इसी प्रकार जवाहर लाल ,माओ ,जेपी ,इन्दिरा जैसे राजनीतिक व्यक्तित्व से भी काव्यात्मक आलाप करने में वे देरी नहीं करते ।यही नही बाल ठाकरे जैसे विवादास्पद व्यक्ति को ऐसी तैसी करने के लिए भी वे कविता का ही सहारा लेते हैं ।यही नही भोजपुर के क्रांतिकारी आयाम को खुलकर स्वीकार करते हुए सामंतवादियों के द्वारा हरिजनों के जलाने को भी कविता का विषय बनाते हैं । वर्तमान के प्रति उनका यह अनुराग उनके काव्यशिल्प ही नही उनकी कविता को परखने वाले औजारों को भी प्रभावित करती है ।केदार नाथ सिंह ने अपने पुस्तक समय के शब्द में इसे ही खतरनाक ढंग से कवि होने का साहस कहा है ।
विद्वानों ने बताया है कि ये कविताएं अपनी तात्कालिकता के बावजूद स्थायी महत्व को धारण करती है ।केवल मार्क््सवाद ही नहीं लोक और शास्त्र का प्रगाढ अनुभव भी नागार्जुन के अदभुत कवि व्यक्तित्व से मिलकर तात्कालिकता को सार्वभौम रसायन में परिवर्तित करती है ।संवेदना की जटिल व बहुस्तरीय परत इन कविताओं को अखबारी होने से बचाती है ।
कबीर के बाद वे संभवत: पहले कवि हैं,जिनके यहां जीवन व कविता एकरूप हो गया हो,शायद निराला से भी ज्यादा ।उनके कविता की प्रतिज्ञा उनके जीवन की प्रतिज्ञा से उद्भूत हुई है ,और उनकी कविता उनके जीवन की ही तरह ज्यादा प्रतिज्ञा करने में विश्वास नहीं करती ।इसीलिए वे कट्टर मार्क्सवादी होते हुए भी जीवन की बाधाओं के प्रति ही प्रतिश्रुत हैं न कि किसी भी प्रकार के वाद के प्रति ।
आधुनिक काल के वे विरले लेखक हैं जिन्होंने हिंदी के साथ ही मैथिली,बांग्ला और अन्य भाषाओं में गंभीरता से लेखन किया हो ।वे इन तमाम भाषाओं को जानने वाले के प्रिय कवि हैं तथा उनकी कविताओं पर इन सब लोगों का अधिकार है ।आज फेसबुक पर कुछ लोगों के द्वारा इस बात पर बल दिया गया कि चूंकि बाबा को साहित्य अकादमी पुरस्कार मैथिली रचना पर मिली ,अत: अकादमी द्वारा बाबा के सम्मान में आयोजित समारोह में मात्र मैथिली भाषा और साहित्य के विद्वानों को ही बुलाना चाहिए ।मेरे विचार में यह उचित नही है । बाबा का लेखन ही इसका सबसे बडा प्रमाण है ।लेकिन बाबा की जिन्दगी उनकी कविता की ही तरह तमाम चित्ताकर्षक चित्रों से भरी है ,इसका कोई एक पाठ संभव नही है ।
नामवर सिंह भारतीय आलोचना के केंद्र में हैं,विभिन्न विवादों के बावजूद उनके किताबों,लेखों व भाषणों ने सर्जनात्मक उत्तेजना पैदा किया है ।उनके कहे गए एक एक शब्द के पक्ष व विपक्ष में आपको हथियारबंद आलोचकों का समुदाय मिल जाएगा ।उनकी केन्द्रीयता को स्वीकार करते हुए एक मैथिली में हास्य कविता लिखी गई है ,जिसमें एक हिंदी आलोचक उनको मिल रहे सम्मान से क्षुब्ध है ।यह कविता होली के अवसर पर मैथिली पाक्षिक विदेह के 78 वें अंक में प्रकाशित हुई है ।यहॉ इतिहास का अंत नही है ,बल्कि नैतिकता का अंत है ।यह अंत कोई दुर्घटना का परिणाम नहीं ,सुनियोजित भी नही ,बल्कि हमारे युग के ही एक क्षण की परछाई है(प्रतिबिम्ब नही) ।यह चुलबुल पांडे नामक पुलिस इंस्पेक्टर की कहानी है ।ऐसा मनबढ् इंस्पेक्टर जो रिश्वतखोरी को दबंगई से अपनाता है ।रिश्वत के प्रति उसके मन में कोई दुविधा नही है ,वह घूसखोरी के रकम को अपने पराक्रम से इकट्ठा करता है व अपने पूजनीया माता के पास जमा करता है ।यह पैसा जब उसका भाई मार लेता है ,तो पहली बार क्रोध ,क्षोभ उसके चेहरे पर दिखता है ।वह भी अपने छोटे भाई के मंडप पर अपनी शादी कर हिसाब बराबर कर लेता है ।यह इंस्पेक्टर एक निम्न वर्ग की लडकी पर रीझता है ,तथा अपनी पुलिसिया हरकतों से उसे प्राप्त करता है । यह ईसवी सन2011 का प्रेम है ,यह खालिस भारतीय मानकों का प्रेम नही है ।चुलबुल पांडे की प्रेमिका भी ऐसा ही वरण करती है ,वह अपने पिता को पत्थर से बेहोश कर प्रेमी के संघर्ष को देखना पसंद करती है ।चुलबुल के भाई का प्रेम भी तात्विक रूप से वही है ।साथ साथ घूमने,सिनेमा देखने ,चिपक के बैठने का प्रेम ।वह इस क्षण को विवाह के रूप में स्थायी बनाना चाहता है । यह फिल्म भारतीय पारिवारिक संबंधों के विघटन का बयान करती है ।इंस्पेक्टर अपने माता के दूसरे पति को कहने के बावजूद प्रणाम नही करता है ।उसकी प्रेमिका पिता के मरने के कूछ ही घंटे बाद प्रेमी के साथ सामान्य हो जाती है ।एक दारोगा कस्तूरी लाल अपने होने वाले दामाद के राजनीतिक फायदे के लिए आपराधिक साजिश में शामिल होता है ।छेदी सिंह नामका गुंडा उसका आदर्श दामाद है ।भावी दामाद चुलबुल पांडे अपने ससुर को थाना में बन्द कर देता है ,तथा बाद में आत्महत्या के लिए उकसाता है ।उसे एक गरीब वर्ग की लडकी को हासिल करने के लिए दरोगपनी करने में शर्म नही आती है ।कहानी का ये आयाम हास्य नही उत्पन्न करती ,बल्कि गंभीरता से कुछ लोगों के हरकत को सामने लाती है ।नैतिकता व ईमानदारी से मुक्त चुलबुल पांडे की ये कहानी इन्हीं अर्थों में उत्तरआधुनिक है । पचास व साठ के भारतीय फिल्मों के नायक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम व भारतीय आदर्शो को ढोते थे ,सत्तर व अस्सी के दशक में भारतीय महानता व भारतीय आदर्शवाद का मिथक सभी क्षेत्रों में टूटा ।अमिताभ भारतीय निराशा के एक सफल प्रतिनिधि बने ,उनके क्रोध ,प्रतिशोध में युवामन की झांकी देखी गयी ,ईसवी सन 2011 के सलमान नए नायक हैं ,अपने प्रतिनायक की ही तरह ।उनके यहां सत्य व असत्य का परदा और झीना हो गया है ।दिलीप कुमार को आप फिल्मों में मॉ के लिए सब कुछ करता देख सकते थे,अमिताभ ने फिल्मों में बिना मॉ के जीना सीखा ,इस सलमान को मॉ शब्द सुन के 'तेरी मॉ का ' याद आता है ।
फिल्मों का यह वैचारिक युगान्तर फिल्म में किसी लेखक या निर्देशक का सुनियोजित कार्यक्रम नही है ,क्योंकि फिल्म के शेष भाग,गाना,लटके झटके ,हीरो विलेन ,मॉ बाप ,भाई भाई ,प्रेमी प्रेमिका के वही घिसे पिटे तरीके अपनाए गए हैं ।फिल्म में पुलिस डकैत,तस्कर,खूनी के पीछे नहीं पडी है ,वह घूस का पैसा खाते ,गाना गाते ,नाचते हुए अपने दारोगा के लिए लडकी पटाते हुए मस्त मस्त है ।यह पुलिस पैसों के लिए डकैतों को जाने देती है तथा प्रोमोशन के लिए अपने ही हाथ में गोली मारती है ।ऐसे ही सिपाही की पत्नी का उस तथाकथित वीरता का पुरस्कार व पैसा ले कर चहकना वीभत्स रस पैदा करती है ।यह कई मायनों में विचित्र फिल्म है यहां प्रेम से श्रंगार रस पैदा नहीं होता ,मौत से करूण व पूजा से भक्ति भाव का दूर दूर तक कोई रिश्ता नही है ।
जाहिर है कि हमारे जीवन में भी तो नायक बदल चुके हैं ।गांधी ,भगत,सुभाष के बाद जेपी ,लोहिया और अब तो इंदिरा व ज्योति बसु का भी जमाना बीत गया है ।अब हमारे खास तरह व भंगिमा वाले नेता हैं ।वो ईसीलिए ईमानदार हैं कि अदालत ने उन्हें दोषी नही ठहराया है ,ठहरा दिया तो अदालती अपील की लंबी चेन उन्हें राहत पहुंचाती है ।हमारा नायक चुलबुल पांडे भी वीर सांघवी की तरह टाटा व राडिया के लिए ही जीता है ।उसकी सारी क्षुद्रता व औदात्य उसी महान वर्ग को समर्पित है
पेंगुइन हिंदी का मतलब ये तो नही है मित्र
क्या पेंगुइन हिंदी जानती है
या हिंदी के लिए कोई पेंगुइन है
पेंगुइन और हिंदी गुत्थम गुत्था कोई चीज है
फेसबुक पर पेंगुइन हिंदी नाम का कोई मेरा मित्र है
जो दिल्ली से है व अभी भी दिल्ली में है
मतलब कि पेंगुइन हिंदी व दिल्ली की है
व अभी अभी झूठ बोलना सीखा है
इस नवसिखुए झूठक्कर को
इस दुनिया में मुझसे ज्यादा मित्र हैं
माफ करना भाइयों
जबकि दुनिया में उल्लू,बाज व गिद्ध की मॉग है
हमने चयन किया है
पेंगुइन की
यह चिरश्रांत आ रहा है
धीरे धीरे धीरे
हिंदी ,भोजपुरी ,मगही
ब्रज ,मैथिली, पंजाबी की तरफ
उसका चलना उडना
व तैरना बात एक ही है
व हिंदी का होना
व नही होना भी बरोबर है
मुझ असभ्य को
जबकि कविता मांगती है तमीज
व मैं उतना ही झुकता चला जा रहा हूं जांघ की तरफ
आचार्य जगन्नाथ ने किया ही क्या है
अब तो शक्ति कपूर भी बस गए हैं
मम्मट के शहर में
व सिखा रहे नवोदिताओं को साधारणीकरण
फिल्म,रस व नाडा में अंतर ही कितना है
दिल्ली व पटना के उस्ताद
जब बोलेंगे कविता के संकट पर
उनका ध्यान क्या नही जाएगा उन थीसिस पर
जो उनके चौथेपन में भी बना
पुरूषार्थ का साधन
आखिर मैं कहना क्या चाहता हूं
शिलाजीत की शक्ति अमोघ है
व कविता छनभंगुर है
कविता का तनाव,गुरूत्व ,प्रत्यास्थता
व सुघटयता भौतिकी का विषय नही
फेसबुक की दुनिया में कोई माईबाप नही है
हमारे कई दोस्त हमें महिला समझ
या फिर कवि,पत्रकार,बुदिधमान समझ बहुत स्नेह देते हैं
जो भी हो,यह स्नेह मुझे बहुत प्रिय है
फेसबुक के मेरे अग्रजगण साहित्य,कला,पत्रकारिता,व्यवसाय के मंजे खिलाडी हैं
इनको पता है कब किसको क्या कहना है
कब किससे कुछ कहना है सटना है
यहां उंगलियों से पसन्द किए जाते हैं
उंगली से ही निबाही जाती है
उंगलियों से ही दिल ,देश पर नजर रखते हैं
खता इन्हीं की है,क्यों सर कलाम होगा
ज्यादा से ज्यादा उंगली तमाम होगा
बदल गया है उंगलियों का गुणधर्म
देश अब माल हो गया है
देश उंगलीमाल हो गया है
शायद वे डरे थे अपने पुजारी से
या उस ठेकेदार से जो व्यवस्था करता है उनके भोग का
अब बताओ विनायक सेन
तुम्हारे रिहाई का अर्जी किसे दूं
जल्द ही जबावी चिटठी भेजो
हां चिटठी में सूरज तारे की बात मत करना
सरकार को पता है कि सूरज में एटम बम होता है
व बम से सब कुछ हिल जाता है
शेष सब ठीक है