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Thursday, 14 March, 2013

(जहां हम रहते हैं)

तभी बरहमदेव के अंदर वाले बरहमदेव ने टोका ‘ ये क्‍या बरहमदेव ,अपना पुराना दिन भूल गये क्‍या ,भूल गए जब साहेब के सामने कुर्सी पर बैठने की क्‍या सजा मिली ,भूल गए उन साहेबों को जिन्‍हें सलाम करते-करते हाथ ,बाजू ,बांह दर्द करते थे ,वे भी जो हाथ से नमस्‍कार करना नहीं पसंद करते थे ,या तो साष्‍टांग या फिर पैर छूकर ‘ भूल गए उन साहेबों को जो कभी भी परिवार को साथ लेके नहीं रहे ,परिवार ईलाहाबाद ,लखनऊ खुद किसी पिछड़े ईलाके में नौकरी करते रहे ,जहां भी रहे भोजन-साजन और रात-बितावन के लिए नया नया परिवार बनाते रहे ,और ये परिवार ये तो गरीब काश्‍तकार के बहू-बेटी थे या फिर निचले स्‍टाफ की पत्नियां ‘

और बरहमदेव चाहते थे कि सबकुछ भूल जाए ,तभी दिख गए मनोहर सरोज सी0ओ0 रहे थे और विभाग के सबसे सज्‍जन अधिकारी माने जाते थे ,पर राजेशबा की औरत को रखे थे ,और यह कोई जोर-जबरदस्‍ती नहीं हुई थी ।पांच हजार देकर राजेश का ट्रांसफर करा दिया ,और फिर इतनी नौटंकी पेली कि राजेशबा उनकी बात में आ गया ,और परिवार को वहीं छोड़कर रायबरेली चला गया । और लोग बताते हैं कि वह बीस दिन महीना दिन पर आता और सी0ओ0 साहब परिवार की सारी आवश्‍यकता पर ध्‍यान दिए रहते .........स्‍साला जाति का भी था ,और हरदम पार्टी की भी बात करता था ।ध्‍यान स्‍साला का कहीं रहता था ,पर देखते ही अंबेडकर और फूले का नाम रटने लगता था ।

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